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Tue, Oct 6, 2026Updated 7:42 AM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 साल बाद पत्नी की हत्या के आरोपी पति को किया बरी, ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर तत्काल रिहाई के दिए आदेश

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के मामले में पिछले 13 वर्षों से आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे एक पति को बड़ी राहत देते हुए उसे दोषमुक्त करार दिया है। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत यानी ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को रद्द करते हुए आरोपी पति की आजीवन कारावास की सजा को खत्म कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि उक्त आरोपी किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है, तो उसे जेल से तत्काल रिहा किया जाए। इस फैसले के बाद 13 साल से जेल की सलाखों के पीछे जीवन बिता रहा व्यक्ति अब जेल से बाहर आ सकेगा।

वन्दे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा मामला पत्नी की हत्या से जुड़ा हुआ था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पति को दोषी मानते हुए उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ आरोपी पति ने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया था और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपील दायर की थी। हाईकोर्ट में इस मामले पर विस्तृत सुनवाई हुई, जिसमें दोनों पक्षों की दलीलों और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया गया।

सुनवाई पूरी होने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी पति के खिलाफ हत्या का मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त और ठोस कानूनी आधार मौजूद नहीं थे। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए उसकी आजीवन कारावास की सजा को रद्द करने का निर्णय लिया।

अदालत ने अपने आदेश में जेल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है या उसके खिलाफ कोई और कानूनी कार्यवाही लंबित नहीं है, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए। यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार एक मामले में बरी होने के बाद भी यदि आरोपी किसी अन्य मामले में फरार या वांछित चल रहा होता है, तो उसकी रिहाई पर रोक लग सकती है। लेकिन हाईकोर्ट ने यह शर्त लगाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अगर ऐसा कोई अन्य मामला नहीं है, तो 13 साल से सजा काट रहे इस व्यक्ति को बिना किसी देरी के आजाद किया जाना चाहिए।

यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली में अपीलीय अधिकारों के महत्व को भी रेखांकित करता है। जब कोई व्यक्ति निचली अदालत के फैसले से असंतुष्ट होता है या उसे लगता है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ है, तो वह उच्च न्यायालय में अपील करने का संवैधानिक अधिकार रखता है। इस मामले में भी आरोपी पति ने इसी अधिकार का उपयोग किया और 13 साल तक जेल में रहने के बाद अंततः उसे उच्च न्यायालय से न्याय मिल सका। ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करना यह दर्शाता है कि उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों का पुनर्मूल्यांकन किया और पाया कि निचली अदालत का निर्णय कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता है।

उल्लेखनीय है कि पत्नी की हत्या जैसे गंभीर मामलों में अक्सर परिवार के सदस्यों, विशेषकर पति पर शक की सुई सबसे पहले जाती है। ऐसे मामलों में पुलिस और अभियोजन पक्ष के सामने यह चुनौती होती है कि वे ठोस सबूतों के आधार पर आरोप को साबित करें। यदि साक्ष्यों में कमी रह जाती है या परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) एक मजबूत कड़ी बनाने में विफल रहते हैं, तो लाभ हमेशा आरोपी को दिया जाता है, जो आपराधिक न्यायशास्त्र का एक मूलभूत सिद्धांत है। राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला इसी सिद्धांत पर आधारित प्रतीत होता है, जिसमें संदेह का लाभ आरोपी को देते हुए उसे बरी किया गया है।

13 वर्षों का समय किसी भी व्यक्ति के जीवन में बहुत लंबा होता है। इस दौरान आरोपी पति ने जेल की चारदीवारी के भीतर न केवल अपनी आजादी खोई, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जीवन से भी वंचित रहा। हत्या जैसे संगीन अपराध के आरोप में जेल जाने वाले व्यक्ति को समाज में भारी बदनामी का सामना भी करना पड़ता है। हालांकि, हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले ने उसे कानूनी रूप से निर्दोष साबित कर दिया है। अब जब अदालत ने तत्काल रिहाई के आदेश दे दिए हैं, तो जेल प्रशासन को हाईकोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद औपचारिकताएं पूरी करके उसे छोड़ना होगा।

राजस्थान हाईकोर्ट के इस निर्णय से न्यायिक प्रक्रिया में आम जनता के विश्वास को भी बल मिला है। यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि यदि कोई व्यक्ति अन्यायपूर्ण सजा काट रहा है, तो उच्च न्यायालय के माध्यम से उसे न्याय मिल सकता है। फिलहाल, ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द किए जाने के बाद आरोपी पति के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है और जेल प्रशासन से उम्मीद की जा रही है कि वह हाईकोर्ट के आदेशों का तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करेगा।