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Mon, Oct 5, 2026Updated 8:45 PM IST
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रायपुर: कारोबारी को 44 दिन तक डिजिटल अरेस्ट में रखा, फर्जी CBI-IPS अफसर बनकर ठगों ने लूटे 8.50 लाख

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रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में साइबर अपराधियों ने एक बार फिर अपनी ठगी का जाल बिछाया है और इस बार उन्होंने एक बेहद ही शातिर तरीके को अपनाते हुए एक बुजुर्ग कारोबारी को निशाना बनाया है। खमतराई थाना क्षेत्र के उरकुरा स्थित बजरंग नगर में रहने वाले 64 वर्षीय किराना दुकानदार के साथ हुई इस साइबर ठगी की घटना ने पुलिस महकमे में भी हड़कंप मचा दिया है। ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का अधिकारी बताते हुए पीड़ित कारोबारी को लगातार 44 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी स्थिति में रखा। इस दौरान उसे 6.80 करोड़ रुपये की मनी-लॉन्ड्रिंग यानी धन शोधन के मामले में फंसाने का डर दिखाया गया और अंततः उससे 8.50 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। यह मामला साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे नए और भयावह तरीकों को उजागर करता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति उरकुरा के बजरंग नगर का निवासी है और वह किराना की दुकान चलाता है। 64 वर्षीय इस कारोबारी के पास कुछ समय पहले एक अज्ञात कॉल आई थी। कॉल करने वाले ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई का अधिकारी बताया। इसके बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और ठगों ने अपने जाल में फंसाने के लिए एक के बाद एक कई लोगों को मैदान में उतारा। इनमें से कुछ ने खुद को IPS अधिकारी होने का दावा किया। इन फर्जी अधिकारियों ने पीड़ित कारोबारी को यह कहकर डराया कि उसके नाम और उसके बैंक खातों का इस्तेमाल एक बड़े धन शोधन (मनी-लॉन्ड्रिंग) घोटाले में किया गया है। ठगों ने दावा किया कि यह घोटाला 6.80 करोड़ रुपये का है और इसमें पीड़ित की संलिप्तता पाई गई है।

ठगों ने पीड़ित को विश्वास दिलाने के लिए फर्जी दस्तावेज और गिरफ्तारी वारंट जैसे प्रमाण भी दिखाए, जो पूरी तरह से जाली थे। इस डर और दबाव के चलते कारोबारी मानसिक रूप से इतना सहम गया कि उसने ठगों की हर बात माननी शुरू कर दी। ठगों ने उसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखने का फरमान सुनाया। डिजिटल अरेस्ट का मतलब यह था कि पीड़ित को लगातार 44 दिनों तक वीडियो कॉल पर रखा गया। उसे निर्देश दिया गया कि वह किसी भी परिजन, रिश्तेदार या दोस्त को इस बारे में कोई जानकारी नहीं देगा। यदि उसने ऐसा किया, तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इन 44 दिनों के दौरान पीड़ित कारोबारी पूरी तरह से ठगों के नियंत्रण में रहा। वह अपने परिवार से कटा रहा और लगातार इस डर में जीता रहा कि कहीं उसकी गिरफ्तारी न हो जाए। ठगों ने इसी बीच ‘जांच’ और ‘सत्यापन’ के नाम पर उससे पैसे ट्रांसफर करवाने शुरू कर दिए। पीड़ित को यह कहा गया कि उसकी संपत्ति और बैंक बैलेंस की जांच के लिए उसे एक सुरक्षित सरकारी खाते में पैसे ट्रांसफर करने होंगे, जिसे जांच पूरी होने के बाद वापस कर दिया जाएगा। डरे और सहमे हुए कारोबारी ने किस्तों में कुल 8.50 लाख रुपये ठगों द्वारा बताए गए विभिन्न खातों में ट्रांसफर कर दिए।

लंबे समय तक चले इस मानसिक उत्पीड़न और आर्थिक नुकसान के बाद जब ठगों ने संपर्क करना बंद कर दिया, तब जाकर पीड़ित कारोबारी को एहसास हुआ कि वह एक बहुत बड़ी साइबर ठगी का शिकार हो चुका है। इसके बाद उसने हिम्मत जुटाई और अपने परिजनों को पूरी आपबीती सुनाई। परिजनों के साथ मिलकर पीड़ित ने खमतराई थाने में पहुंचकर इस पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर अज्ञात साइबर ठगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है और मामले की जांच शुरू कर दी है।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यह मामला साइबर अपराधियों द्वारा अपनाए जा रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बढ़ते ट्रेंड को दर्शाता है। इस तरह के अपराध में ठग मुख्य रूप से बुजुर्गों और कम तकनीकी जानकारी रखने वाले लोगों को निशाना बनाते हैं। वे सरकारी एजेंसियों जैसे सीबीआई, ईडी, पुलिस या कस्टम का नाम लेकर इतना दबाव बनाते हैं कि पीड़ित व्यक्ति तर्क करने की स्थिति में नहीं रहता। 6.80 करोड़ रुपये के मनी-लॉन्ड्रिंग का डर दिखाकर 64 वर्षीय किराना व्यापारी से 8.50 लाख रुपये ऐंठ लेना इस बात का प्रमाण है कि ठग कितनी गहराई तक योजना बनाकर काम करते हैं।

खमतराई पुलिस अब उन बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की जांच कर रही है, जिनका इस्तेमाल ठगों ने 44 दिनों की इस अवधि में किया। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या यह ठग रायपुर के लोकल स्तर पर सक्रिय हैं या किसी अन्य राज्य से इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे। साइबर सेल की मदद से कॉल डिटेल और डिजिटल फुटप्रिंट्स खंगाले जा रहे हैं। हालांकि, ऐसे मामलों में ठगों तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती होती है क्योंकि वे अक्सर फर्जी सिम कार्ड और दूसरों के नाम पर खोले गए बैंक खातों का उपयोग करते हैं।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर आम नागरिकों के लिए चेतावनी का काम किया है। पुलिस और साइबर विशेषज्ञ लगातार लोगों से अपील कर रहे हैं कि कोई भी सरकारी एजेंसी, चाहे वह सीबीआई हो या पुलिस, कभी भी वीडियो कॉल के जरिए किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को कहती है। यदि किसी व्यक्ति को इस प्रकार की कॉल आए, तो उसे तुरंत कॉल काट देना चाहिए और अपने परिजनों या नजदीकी पुलिस थाने को इसकी सूचना देनी चाहिए। 1930 साइबर हेल्पलाइन नंबर पर भी तुरंत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। रायपुर के इस कारोबारी के साथ हुई 44 दिन की यह आपबीती समाज के लिए एक गंभीर संदेश है कि साइबर ठगों के नए हथकंडों से सतर्क रहना अत्यंत आवश्यक है।