Sun, 04 Oct 20262:42 PM
Sun, Oct 4, 2026Updated 2:42 PM IST
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शिवपुरी: सेजवारा के पास आदिवासी बस्ती जाने वाली पुलिया अचानक धंसी, ट्रैक्टर का पहिया फंसा; चालक शिशुपाल धाकड़ बाल-बाल बचे, ग्रामीणों ने निर्माण गुणवत्ता पर उठाए सवाल

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मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक बार फिर सार्वजनिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले के सेजवारा गांव के समीप आदिवासी बस्ती की ओर जाने वाले मार्ग पर निर्मित एक पुलिया का एक हिस्सा अचानक धंस गया। इस घटना के दौरान पुलिया से गुजर रहे एक ट्रैक्टर का अगला पहिया धंसे हुए हिस्से में बुरी तरह फंस गया, जिससे वाहन वहीं रुक गया। हालांकि, इस दुर्घटना में ट्रैक्टर चालक शिशुपाल धाकड़ बाल-बाल बच गए। यह घटना रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को सामने आई है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि यह पुलिया मात्र चार साल पहले ही बनाई गई थी, जिसके बाद से इलाके में निर्माण कार्य की गुणवत्ता और जिम्मेदार विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, सेजवारा गांव के पास से होकर गुजरने वाला यह रास्ता आसपास की आदिवासी बस्तियों को मुख्य क्षेत्रों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसी मार्ग पर एक पुलिया का निर्माण किया गया था, ताकि ग्रामीणों और किसानों को आवागमन में सुविधा मिल सके। रविवार को ट्रैक्टर चालक शिशुपाल धाकड़ अपने ट्रैक्टर लेकर इसी पुलिया से गुजर रहे थे। तभी अचानक पुलिया का एक हिस्सा भरभरा कर नीचे धंस गया। अचानक हुई इस घटना से ट्रैक्टर का संतुलन बिगड़ गया और उसका अगला पहिया पुलिया के धंसे हुए हिस्से में जाकर फंस गया। पहिया फंसने के कारण ट्रैक्टर आगे नहीं बढ़ सका और वहीं रुक गया। यदि ट्रैक्टर थोड़ी अधिक गति में होता या पूरा ढांचा एक साथ गिर जाता, तो बड़ा हादसा हो सकता था।

इस घटना में ट्रैक्टर चालक शिशुपाल धाकड़ पूरी तरह सुरक्षित रहे। वे किसी भी प्रकार की चोट से बच गए। हालांकि, अचानक हुई इस घटना से चालक सहित आसपास मौजूद लोगों में हड़कंप मच गया। घटना की सूचना मिलते ही सेजवारा गांव और आसपास की आदिवासी बस्तियों के लोग मौके पर जुट गए। ग्रामीणों ने देखा कि पुलिया का एक हिस्सा कैसे धंस चुका है और ट्रैक्टर उसमें फंसा हुआ है। ग्रामीणों ने किसी तरह ट्रैक्टर को वहां से सुरक्षित निकालने का प्रयास किया और चालक की कुशलक्षेम जानी।

ग्रामीणों का कहना है कि यह पुलिया अभी बहुत पुरानी नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पुलिया का निर्माण लगभग चार वर्ष पूर्व कराया गया था। मात्र चार साल के भीतर ही पुलिया का धंस जाना ग्रामीणों के लिए चिंता और आक्रोश का विषय बन गया है। ग्रामीणों ने सीधे तौर पर निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पुलिया के निर्माण के दौरान मानकों का पालन नहीं किया गया और घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जिसका परिणाम आज देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों ने मांग की है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और निर्माण में लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

यह मार्ग विशेष रूप से आदिवासी बस्ती के निवासियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस रास्ते से होकर न केवल ग्रामीण अपने दैनिक कार्यों के लिए आते-जाते हैं, बल्कि किसान अपने कृषि उपकरणों और ट्रैक्टरों के जरिए खेतों तक पहुंचते हैं। ऐसे में पुलिया का क्षतिग्रस्त होना और धंस जाना इन आदिवासी परिवारों के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। यदि समय रहते इस मार्ग की मरम्मत नहीं की गई, तो आवागमन पूरी तरह बाधित हो सकता है, जिससे बस्ती के लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

मध्य प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी बहुल इलाकों में सड़कों तथा पुल-पुलियों के निर्माण की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। कई मामलों में नवनिर्मित सड़कें और पुलिया कुछ ही वर्षों या महीनों में टूटती या धंसती देखी गई हैं। सेजवारा गांव के पास हुई यह घटना भी उसी श्रृंखला का एक हिस्सा प्रतीत होती है। सरकारी योजनाओं के तहत ग्रामीण कनेक्टिविटी बेहतर करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन यदि निर्माण में गुणवत्ता से समझौता किया जाए, तो न केवल सरकारी धन की बर्बादी होती है, बल्कि आम जनता की जान भी खतरे में पड़ जाती है।

फिलहाल, इस घटना के संबंध में संबंधित निर्माण एजेंसी या जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पुलिया का निर्माण किस विभाग द्वारा और किस एजेंसी के माध्यम से कराया गया था। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि वे जल्द से जल्द मौके का मुआयना करें, क्षतिग्रस्त पुलिया की मरम्मत या पुनर्निर्माण का कार्य शुरू करें और दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करें। जब तक इस मामले में जिम्मेदारी तय नहीं होती और नया निर्माण नहीं होता, तब तक आदिवासी बस्ती के लोगों को इस टूटी हुई पुलिया के सहारे अपना जीवनयापन जारी रखना होगा, जो उनके लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है।