Wed, 07 Oct 20269:23 AM
Wed, Oct 7, 2026Updated 9:23 AM IST
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शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल को बताया संवैधानिक पाप, पूछा- क्या आयोग दोनों गुटों को अलग निशान दे सकता था?

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नई दिल्ली। शिवसेना पार्टी के चुनाव चिह्न और नाम को लेकर पिछले चार वर्षों से जारी विवाद पर मंगलवार, 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए दलबदल की प्रक्रिया को ‘संवैधानिक पाप’ करार दिया है। न्यायालय ने यह सवाल भी उठाया कि क्या निर्वाचन आयोग द्वारा शिवसेना के दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित किए जा सकते थे, ताकि दलबदल करने वाले सदस्यों के लिए मूल पार्टी के चिह्न की भावना को लागू किया जा सके। यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई है जिसमें शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना का दर्जा और ‘मशाल’ चिह्न आवंटित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट रूप से यह जिज्ञासा व्यक्त की कि जब विधायकों या सांसदों द्वारा दलबदल किया जाता है, तो ऐसे में मूल पार्टी के चुनाव चिह्न और उसकी विचारधारा की पवित्रता कैसे बरकरार रह सकती है। न्यायालय का मानना है कि दलबदल स्वयं में एक गंभीर संवैधानिक अपराध है और ऐसे व्यक्ति यदि किसी पार्टी के बहुमत के आधार पर उसके चिह्न पर दावा करते हैं, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध हो सकता है। कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि चुनाव चिह्न केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं की भावनाओं और पार्टी के ऐतिहासिक संघर्ष से जुड़ा होता है। इसलिए, दलबदल करने वालों को उसी चिह्न का लाभ मिलना संवैधानिक नैतिकता के प्रश्न खड़े करता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की भूमिका और उसके फैसले की वैधता पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि क्या आयोग के पास यह विकल्प मौजूद नहीं था कि वह शिवसेना के दोनों गुटों—एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे—को अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित कर दे? ऐसा करने से न केवल दलबदल की समस्या का समाधान होता, बल्कि मतदाताओं को भी स्पष्ट विकल्प मिलते। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि आयोग ने दोनों गुटों को अलग पहचान दी होती, तो वर्तमान स्थिति में उत्पन्न हुई जटिलताओं से बचा जा सकता था। यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि शिवसेना का विवाद अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पूर्णतः संवैधानिक और कानूनी बन चुका है, जिसका सीधा संबंध दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए से है।

गौरतलब है कि शिवसेना का यह विवाद जून 2022 में शुरू हुआ था, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बागी विधायकों ने उद्धव ठाकरे सरकार के खिलाफ बगावत कर दी थी। इसके बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट गहराया और अंततः शिंदे गुट ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई। फरवरी 2023 में, भारतीय निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को ‘शिवसेना’ नाम और ‘मशाल’ चिह्न आवंटित कर दिया, जबकि उद्धव ठाकरे गुट को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और ‘मशाल’ चिह्न मिला। उद्धव गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर अब तक कई सुनवाइयां हो चुकी हैं। मंगलवार की सुनवाई इसी लंबित मामले का हिस्सा थी, जिसमें न्यायालय ने संवैधानिक सिद्धांतों पर गहन विचार-विमर्श किया।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि न्यायपालिका दलबदल और चुनाव चिह्न आवंटन के बीच के संबंध को लेकर बेहद गंभीर है। ‘संवैधानिक पाप’ जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि कोर्ट इस मुद्दे को केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। यदि न्यायालय अंततः यह मानता है कि दलबदल करने वालों को मूल पार्टी का चिह्न नहीं मिलना चाहिए, तो इसका असर न केवल शिवसेना विवाद पर, बल्कि भविष्य में देश भर में होने वाले सभी दलबदल संबंधी मामलों पर पड़ सकता है। यह फैसला निर्वाचन आयोग की शक्तियों और सीमाओं को भी पुनः परिभाषित कर सकता है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना अंतिम फैसला सुरक्षित रख लिया है। अगली सुनवाई की तिथि अभी घोषित नहीं की गई है, लेकिन मंगलवार की कार्यवाही से यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायालय इस विवाद का समाधान संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर ही करेगा। शिवसेना के दोनों गुटों के लिए यह सुनवाई अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका परिणाम उनकी राजनीतिक पहचान, विधानसभा और लोकसभा में उनकी स्थिति तथा भविष्य की चुनावी रणनीति को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। देश भर की राजनीतिक पार्टियां भी इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार कर रही हैं, क्योंकि यह फैसला भारतीय लोकतंत्र में दलबदल और पार्टी अनुशासन के भविष्य को दिशा देने वाला साबित हो सकता है।