श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी गयाजी पहुंचे, पितृपक्ष मेले में दादा-परदादा का किया पिंडदान

गया। बिहार के ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी गयाजी में चल रहे पितृपक्ष मेले की महत्ता देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैली हुई है। इसी कड़ी में श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी गयाजी पहुंचे हैं। उन्होंने आज 10 अक्टूबर 2026 को पितृपक्ष मेले के दौरान अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक पिंडदान किया। हेमंत द्विवेदी ने विशेष रूप से अपने दादा और परदादा के निमित्त गयाजी की पवित्र भूमि पर वैदिक विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान की सभी रस्में पूरी कीं। गयाजी में पितृपक्ष मेले का आज 10 अक्टूबर 2026 को बारहवां दिन है, जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंच रहे हैं।
श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने गयाजी में पिंडदान करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनका गयाजी का पहला दौरा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि गयाजी की इस पवित्र धरती पर आना उनके लिए गौरव की बात है। एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो उत्तराखंड के सबसे प्रमुख और पवित्र धामों में शामिल बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों की देखरेख और संचालन से जुड़ी समिति का नेतृत्व कर रहे हैं, उनके द्वारा गयाजी को पवित्र धरती बताकर यहां आने को गौरव का विषय माना जाना, गयाजी की धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता को और भी अधिक रेखांकित करता है।
हेमंत द्विवेदी ने अपने दादा और परदादा के नाम पर पिंडदान किया। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान देश के कोने-कोने से लोग गयाजी पहुंचते हैं। बीकेटीसी अध्यक्ष का यह दौरा इसलिए भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे चारधाम में गिने जाने वाले प्रमुख तीर्थ स्थलों की व्यवस्था संभालने वाले शीर्ष पदाधिकारी का गयाजी में आकर स्वयं पिंडदान करना, दोनों धार्मिक स्थलों के बीच मौजूद गहरे आध्यात्मिक संबंध को दर्शाता है।
बता दें कि गयाजी में पितृपक्ष मेला प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है। यह मेला भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलता है। इस वर्ष 10 अक्टूबर 2026 को मेले का बारहवां दिन है, जिसका अर्थ है कि सर्वपितृ अमावस्या अब कुछ ही दिनों की दूरी पर है। इन दिनों गयाजी के फल्गु नदी के घाटों, विष्णुपद मंदिर और अन्य पिंडदान स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। लोग अपने परिवार के साथ आकर पुरोहितों के मार्गदर्शन में पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया को पूरा कर रहे हैं।
श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) उत्तराखंड सरकार के अधीन कार्य करने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्था है। यह समिति मुख्य रूप से बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों सहित उत्तराखंड के कई अन्य प्रमुख मंदिरों के प्रबंधन, रखरखाव, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन की जिम्मेदारी वहन करती है। इस समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का गयाजी आना और यहां के धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होना, भारतीय सनातन संस्कृति में विभिन्न तीर्थ स्थलों की एकात्मकता और आपसी सम्मान का प्रतीक है।
गयाजी का पितृपक्ष मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह बिहार राज्य के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन भी है। इस दौरान गया शहर की पूरी व्यवस्था मेला क्षेत्र में तब्दील हो जाती है। प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, यातायात और स्वच्छता को लेकर विशेष इंतजाम किए जाते हैं। बारहवें दिन तक लाखों लोगों ने यहां पिंडदान संपन्न कर लिया है और सर्वपितृ अमावस्या के दिन यह संख्या अपने चरम पर होने की उम्मीद जताई जा रही है।
हेमंत द्विवेदी ने गयाजी के अपने पहले दौरे के अनुभव को साझा करते हुए जिस प्रकार से इस पवित्र धरती के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया है, उससे स्थानीय लोगों और पुजारी समाज में भी हर्ष का वातावरण है। गयाजी के पंडों और पुरोहितों के लिए यह गर्व का विषय है कि देश के प्रमुख मंदिरों की समिति के अध्यक्ष ने स्वयं गयाजी की महत्ता को स्वीकार किया है और यहां आकर विधिवत पिंडदान किया है। यह घटनाक्रम गयाजी की उस प्राचीन मान्यता को एक बार फिर बल देती है, जिसके अनुसार हर हिंदू को जीवन में कम से कम एक बार गयाजी आकर अपने पितरों का श्राद्ध और पिंडदान अवश्य करना चाहिए।
कुल मिलाकर, श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का गयाजी दौरा और उनके द्वारा अपने दादा-परदादा का पिंडदान, पितृपक्ष मेले 2026 के बारहवें दिन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण खबर है। इस घटना ने गयाजी की धार्मिक गरिमा को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी है और यह संदेश दिया है कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी बड़े धार्मिक पद पर क्यों न हो, पितरों के प्रति श्रद्धा और गयाजी की पवित्रता का महत्व सनातन धर्म में हमेशा सर्वोपरि रहेगा।

