सुप्रीम कोर्ट ने SIR के 14 फैसलों पर जारी किया नोटिस, CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने से किया इनकार; कहा- कानून टूटा तो सभी फैसले रोक देंगे

नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन (SIR) नीति और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई की। इस दौरान शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा लिए गए 14 फैसलों पर नोटिस जारी किया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर तत्काल कार्रवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग ने कानून का उल्लंघन किया है, तो वह उसके सभी फैसलों पर रोक लगा देगा। यह मामला देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनाव आयोग की स्वायत्तता के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई उन दो अलग-अलग याचिकाओं पर हुई, जो सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनकी देखरेख में लागू की गई स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन (SIR) नीति से जुड़े विवादों को लेकर दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने SIR नीति के तहत जो फैसले लिए हैं, वे कानूनी दायरे और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं हैं। इन्हीं याचिकाओं के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल प्रभाव से उनके पद से निलंबित किया जाए ताकि निष्पक्ष जांच और प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं की निलंबन वाली मांग को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को सस्पेंड करना उचित नहीं होगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को बिना ठोस और अंतिम निष्कर्ष के निलंबित नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि यह साबित होता है कि चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा है, तो अदालत SIR नीति के तहत लिए गए सभी फैसलों पर पूरी तरह से रोक लगाने में संकोच नहीं करेगी। अदालत की यह सख्त टिप्पणी चुनाव आयोग के हालिया कार्यों पर एक बड़ी कानूनी चुनौती के रूप में देखी जा रही है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा SIR नीति के तहत लिए गए कुल 14 फैसलों पर नोटिस जारी किया है। इन 14 फैसलों को लेकर अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन (SIR) नीति मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़ी एक विशेष समीक्षा प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर लागू किया जाता है। इस नीति का मूल उद्देश्य मतदाता सूचियों में व्याप्त विसंगतियों, फर्जी नामों और अन्य खामियों को दूर करके उन्हें अधिक शुद्ध और अपडेट बनाना होता है। लेकिन वर्तमान मामले में याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस नीति के तहत लिए गए फैसलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुना। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों ने न्यायालय का ध्यान इस ओर आकर्षित कराया कि चुनाव आयोग ने जिन 14 फैसलों को लागू किया है, उनमें पारदर्शिता और कानूनी प्रावधानों की अनदेखी की गई है। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित नहीं किया जाता, तब तक इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच संभव नहीं हो पाएगी। दूसरी ओर, अदालत ने निलंबन की मांग को अत्यधिक कठोर कदम मानते हुए इसे फिलहाल स्वीकार करने से मना कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग के 14 फैसलों पर नोटिस जारी करके यह संकेत दे दिया है कि वह इस मामले की गहराई से जांच करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई चेतावनी कि ‘चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा तो सभी फैसले रोक दिए जाएंगे’, भारतीय चुनावी प्रणाली के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी संदेश है। चुनाव आयोग भारत में एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था है, जिस पर निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में, शीर्ष अदालत द्वारा आयोग के फैसलों की वैधता पर सवाल उठाया जाना और नोटिस जारी करना राजनीतिक और कानूनी दोनों ही गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
इस पूरे मामले में वंदे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, बल्कि 14 फैसलों पर नोटिस जारी करके संबंधित पक्षों से अपना जवाब पेश करने का समय दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि जांच और सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि वास्तव में चुनाव आयोग ने कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किया है, तो वह SIR नीति से जुड़े सभी निर्णयों को रद्द या स्थगित करने का आदेश पारित कर सकती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर ये दोनों याचिकाएं देश के लोकतांत्रिक ढांचे और चुनावी सुधारों के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, अदालत ने निलंबन की मांग को खारिज करके संवैधानिक पदों की गरिमा और संतुलन को भी बनाए रखा है।
आने वाले दिनों में इस मामले की अगली सुनवाई होगी, जिसमें चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस का औपचारिक जवाब देना होगा। पूरा देश अब इस बात पर नजर बनाए हुए है कि क्या चुनाव आयोग अपने उन 14 फैसलों का कानूनी बचाव कर पाएगा, जिन पर शीर्ष अदालत ने सवाल उठाए हैं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में कोई भी संस्था अदालती कार्रवाई से परे नहीं है।

