‘जंग के बीच गुजरता हर दिन पहले से ज्यादा भारी है। न चैन से सो पा रहे हैं, न जी पा रहे हैं। हमें तो रोज के खाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हमारी मेंटल हेल्थ दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। अब बिल्कुल लाचार महसूस कर रहे हैं। ये भी नहीं जानते कि आ
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ईरान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहीं कश्मीर की फलक घर नहीं लौट पा रहीं। वो तेहरान से तो सुरक्षित निकल गईं, लेकिन ईरान और अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा चौकी के पास फंसी हुई हैं। बॉर्डर पर वो अकेली नहीं हैं। उनके साथ ही 180 भारतीय स्टूडेंट्स फंसे हुए हैं।
इनकी शिकायत है कि एंबेसी ने टिकट और वीजा कराने को कहा था, जिसके बाद कोम शहर से इवैक्युएशन शुरू हुआ लेकिन अजरबैजान के बॉर्डर पर आकर फंस गए। न कंट्री कोड मिला और न घर लौट सके। बुक कराए फ्लाइट टिकिट भी बर्बाद हो गए, लेकिन एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिला।‘

15 मार्च को फ्लाइट के जरिए करीब 150 छात्र दिल्ली पहुंचे। इन्हें ईरान से आर्मेनिया और अजरबैजान बॉर्डर के रास्ते भारत भेजा गया।
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग में अब तक 2565 लोगों की मौत हो चुकी है। अभी जंग थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वहीं ईरान में करीब 1200 भारतीय स्टूडेंट फंसे हैं, जिनमें 900 जम्मू-कश्मीर के हैं। दैनिक भास्कर ने जंग के बीच बॉर्डर पर फंसे स्टूडेंट्स और उनकी फैमिली से बातचीत की।
‘1 से 1.5 लाख की टिकट खरीदी, लेकिन घर नहीं लौट सके‘ श्रीनगर की रहने वाली फलक तेहरान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। वे बताती हैं, ‘भारत सरकार अब तक हमें इवैक्युएट नहीं कर सकी है। हमसे यही कहा जा रहा है कि खुद के खर्च पर लौटना होगा। इससे पहले जब तेहरान से रेस्क्यू कर हमें कोम शहर लाया गया था, तब हम वहां भी 10 दिन फंसे रहे। एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिल रहा था।‘
‘फिर बताया गया कि हमें अजरबैजान के रास्ते भारत भेजा जा सकता है लेकिन पूरा खर्च हमें खुद उठाना होगा। हम भी अब और रिस्क नहीं लेना चाहते थे इसलिए हामी भर दी। हमसे कहा गया था कि PNR नंबर और कंफर्म टिकट देने के बाद ही हमें कोम शहर से आगे भेजा जाएगा।‘
‘हमने 1 से 1.5 लाख रुपए खर्च कर टिकट कराया, बाकी इंतजाम भी कर लिए। सारे डॉक्यूमेंट्स जमा करने के बाद हमें ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा पोस्ट के पास लाया गया, लेकिन भारत लौटने के लिए क्लीयरेंस नहीं मिला। हम करीब 180 स्टूडेंट्स यहीं फंसे हुए हैं।’
‘हमें भरोसा दिलाया गया था कि हर दिन 50 स्टूडेंट्स को बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब हमें टिकट कैंसिल कराने और नुकसान उठाने को कहा जा रहा है। हमें एंबेसी से भी कोई मदद नहीं मिल रही है।‘

20 दिन से एक से दूसरे शहर में घूम रहे, अब बॉर्डर पर फंसे फलक आगे कहती हैं, ‘हम पिछले 20 दिनों से यहां फंसे हुए हैं। अब तो चैन से नींद भी नहीं आ रही है। खाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। हमें बताया गया है कि हमारे लिए होटल में ठहरने का इंतजाम है, लेकिन यहां कुछ नहीं मिला। खाने-पीने और बाकी जरूरतों के इंतजाम खुद करने पड़ रहे हैं।‘
‘बस एक काम जो हम नहीं कर सकते, वो ईरान से बाहर निकलने का है। हमें अजरबैजान से बॉर्डर क्रॉस करने का क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है।‘
‘हम दूर-दराज वाले ऐसे इलाके में फंसे हैं, जहां नेटवर्क लगभग ना के बराबर है। फैमिली से भी बात नहीं हो पा रही है। कई स्टूडेंट्स के पास पैसे खत्म हो रहे हैं, कार्ड काम नहीं कर रहे और बैंकिंग सिस्टम साथ नहीं दे रहा है। हम इतना लाचार महसूस कर रहे हैं कि समझ नहीं पा रहे, आगे क्या करें।‘
‘ईरान में हालात अभी अस्थिर हैं। हमें बार-बार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। इस खौफ और अनिश्चितता के माहौल में हम मेंटली बिल्कुल थक चुके हैं। हमारी बस यही गुजारिश हैं कि कुछ भी करके हमें यहां से जल्द निकालें। अगर अपने पैसे खर्च करने के बाद भी हम यहां से नहीं निकल पा रहे, तो अब हमारे पास रास्ता ही क्या बचता है।‘

स्टूडेंट्स का कहना है कि बाकी देशों के स्टूडेंट्स को उनकी सरकारों ने पहले ही निकाल लिया। अब सिर्फ इंडियन स्टूडेंट्स ही फंसे हैं।
स्टूडेंट बोले- ये जंग पहले से ज्यादा भयानक ईरान में फंसे श्रीनगर के एक स्टूडेंट ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर हमसे बात की। वो कहते हैं, ‘अभी ईरान में फंसा हूं। पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब हमें जंग के कारण देश लौटने के लिए कहा जा रहा है।
‘पहली बार तब कहा गया, जब करीब 10-12 दिनों तक जंग के हालात रहे थे। तब भी हम डरे हुए थे, लेकिन अब के हालात पहले से कहीं ज्यादा भयानक हैं। पहले ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई थी, लेकिन अब इसमें कई देश शामिल हो गए हैं। अबकी बार हालात कंट्रोल से बाहर लग रहे हैं।‘
‘हमें लगातार हवाई हमलों, ड्रोन और ब्लास्ट की आवाजें सुनाई देती हैं। कई बार धमाके बहुत करीब से महसूस होते हैं। रात काटनी मुश्किल हो जाती है, हम सो नहीं पाते और हर वक्त खौफ में जीते हैं। हमें रीलोकेट कर दिया गया है। तेहरान के हाई रिस्क इलाकों से निकालकर सेफ जगहों पर लाया गया है, लेकिन खतरा कम नहीं हुआ है।‘
‘हमारे साथ कई स्टूडेंट्स को इवैक्युएशन के लिए आर्मेनिया और अजरबैजान जैसे बॉर्डर इलाकों में शिफ्ट किया गया है। कुछ आर्मेनिया के रास्ते भारत लौटने में कामयाब रहे, लेकिन हम सब कई दिनों से अजरबैजान में फंसे हुए हैं। हमने महंगे टिकट बुक करा लिए, सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर दिए और हर गाइडलाइन फॉलो की, लेकिन फिर भी कोई क्लियर जवाब नहीं मिला।‘
‘हमारे पैसे खत्म हो रहे हैं। कुछ स्टूडेंट्स बीमार पड़ रहे हैं। टेंशन बहुत बढ़ चुकी है। हमारे साथ-साथ घर वाले भी परेशान हैं। बार-बार इवैक्युएशन के स्थिति ने पढ़ाई-लिखाई चौपट कर दी है। MBBS का कोर्स, जो 5–6 साल में पूरा हो जाना चाहिए। अब वो 7 साल या उससे ज्यादा भी खिंच सकता है। क्योंकि जंग की वजह से एग्जाम टलेंगे, इसका असर करियर पर पड़ेगा।‘

पेरेंट्स परेशान, बोले- बस बच्चे सुरक्षित लौट आएं श्रीनगर की रहने वाली शाहीन अख्तर का बेटा ईरान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। वे कहती हैं, ‘जंग में बेटा भी फंसा है। बाकी पेरेंट्स की तरह हम भी उसकी सलामती को लेकर परेशान हैं।‘
‘ईरान से कई स्टूडेंट्स को आर्मेनिया के रास्ते पहले ही निकाला जा चुका है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स क्लीयरेंस न मिलने के कारण अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हैं। इनमें मेरा बेटा भी है।‘
‘हम लगातार ऑफिशियल चैनल के जरिए अथॉरिटीज के संपर्क में थे। मीटिंग्स भी हुईं। हमसे बच्चों के लिए टिकट और वीजा करने के लिए कहा गया। भरोसा दिलाया गया कि उन्हें सुरक्षित रास्तों से बॉर्डर तक पहुंचाया जाएगा और फिर भारत इवैक्युएट कर लिया जाएगा।‘
‘स्टूडेंट्स को लगभग 50-50 के ग्रुप में भेजने के लिए कहा गया था। इस पर यकीन करते हुए तय तारीखों पर हमने टिकट भी बुक कर दी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई पेरेंट्स ने तो पहली टिकट कैंसिल होने के बाद दोबारा भी टिकट बुक कराई, लेकिन अब तक बच्चे नहीं लौटे।‘

ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे भारतीय स्टूडेंट्स में से ज्यादातर कश्मीर के हैं। पेरेंट्स परेशान हैं कि टिकट के पैसे भी बर्बाद हो गए और बच्चे अब तक घर भी नहीं लौट सके हैं।
‘स्टू़डेंट्स से कुछ ग्रुप्स निकाले गए, कई अब भी फंसे‘ शाहीन आगे बताती हैं, ‘जिन स्टूडेंट्स के निकलने के लिए 18, 19 और 21 तारीख तय की गई थी, वो अब भी ईरान-अजरबैजान के बॉर्डर पर फंसे हैं। उनके पास वैलिड टिकट भी है, लेकिन मौजूदा पाबंदियों के कारण उन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन नहीं मिल रही है।‘
‘कुछ स्टूडेंट 15-16 दिनों से इंतजार कर रहे हैं। बॉर्डर बंद होने की वजह से उनमें कुछ के टिकट पहले ही कैंसिल हो चुके हैं। स्टूडेंट्स और उनके परिवार दोनों परेशान हैं। मेरी भारत सरकार, खासकर विदेश मंत्रालय से अपील है कि ये मुद्दा तुरंत अजरबैजान सरकार के सामने उठाया जाए ताकि बॉर्डर क्लीयरेंस मिल सके और बच्चे घर लौट सकें।’
हम मिडिल क्लास परिवार, हमारे पैसे बर्बाद-बच्चे भी नहीं लौटे इसके बाद हमने श्रीनगर में रहने वाले मोहम्मद अनवर से बात की। उनकी बेटी भी अजरबैजान में फंसी है। वे कहते हैं, ’हम सब मिडिल क्लास परिवारों से हैं, कोई भी हाईफाई फैमिली से नहीं है। हमने पहले जो टिकट बुक की, वो एग्जिट कोड न मिलने से बेकार हो गई। इसके बाद दोबारा टिकट बुक करनी पड़ी। इस बार कीमत लगभग तीन गुना ज्यादा थी।’
’टिकट और वीजा का इंतजाम करना हमारी जिम्मेदारी थी, हमने पूरी की। अब एग्जिट कोड जारी करना हमारे हाथ में नहीं है, ये तो अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अब हमारे बच्चे भाग-भागकर सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, मानसिक रूप से भी बहुत परेशान हो चुके हैं। घबराहट और तनाव में बीमार भी पड़ रहे हैं। सरकार से यही गुजारिश है कि इस मुश्किल वक्त में दखल देकर हमारी मदद करें।’

ये खराब मैनेजमेंट और कोऑर्डिनेशन का नतीजा बडगाम के रहने वाले सुहैल मुजम्मिल का बेटा भी अजरबैजान बॉर्डर पर फंसा है। उनका मानना है कि इवैक्युएशन में आ रही दिक्कत की सबसे बड़ी वजह खराब कोऑर्डिनेशन है।
वे कहते हैं, ‘अजरबैजान बॉर्डर पर बच्चे इसलिए फंसे हैं क्योंकि उनके इवैक्युएशन की जिम्मेदारी संभालने वालों का तरीका सही नहीं है। जिन स्टूडेंट्स को बाद की तारीख मिली थी, वो पहले बॉर्डर क्रॉस कर चुके हैं, जबकि जिनकी बुकिंग पहले की थी, वे अब भी फंसे हुए हैं।‘
‘यही खराब मैनेजमेंट पूरे संकट की जड़ है। एंबेसी से कॉन्टैक्ट करने का भी कोई सही जरिया नहीं है। पेरेंट्स की बच्चों से भी बात नहीं हो पा रही है, जब उनमें से कोई कॉल करता है तभी बात हो पाती है।‘
ये सिर्फ इवैक्युएशन नहीं, उनके फ्यूचर का सवाल जेकेएसए कंवीनर नासिर खुएहामी का कहना है कि पिछले तीन हफ्तों में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने भारतीय स्टूडेंट्स, खासकर कश्मीर के बच्चों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। कश्मीर घाटी से करीब 2,000 स्टूडेंट्स ईरान के मशहद, शिराज, अराक और तेहरान जैसे शहरों में पढ़ रहे हैं।
‘पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब जंग के चलते स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मौजूदा स्थिति पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक है। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स बाकी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हुए हैं।‘
‘स्टूडेंट्स की सेफ्टी तो मसला है ही। साथ ही बार-बार होने वाले इवैक्यूएशन ने उनका एकेडमिक फ्यूचर बर्बाद कर दिया है। MBBS जैसा कोर्स अब 7-7.5 साल तक खिंच सकता है। इससे उनका आगे का करियर भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए ये सिर्फ इवैक्यूएशन का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों स्टूडेंट्स के फ्यूचर और उनके परिवारों से जुड़ा बड़ा सवाल है। इस वक्त तत्काल और सख्त एक्शन की जरूरत है।‘

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