Vastu Tips for Home: किसी भी प्रकार की विद्या प्राप्ति के लिए एक मूलभूत ग्रंथ आधार बनता है, जिस पर उस विद्या या विभाग का विस्तार होता है. ठीक इसी प्रकार, वास्तु शास्त्र के लिए भी एक मूलभूत ग्रंथ बताया गया है, जिसे विश्वकर्मा प्रकाश कहा जाता है. यह ग्रंथ स्वयं में एक शोध का विषय है, लेकिन इसके अनुसार एक आदर्श भवन, जिसमें रहने वाला व्यक्ति स्वयं को राजा के समान अनुभव करे, उसके लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए गए हैं. अगर आप वास्तु के ये बदलाव अपने घर में करते हैं तो आपका घऱ खुशियों से भर जाएगा. इस बारे में बता रहे हैं भोपाल स्थित वास्तु शास्त्री रवि पाराशर.
घर के वास्तु में करें ये बदलाव
घर के देवता का स्थान– ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में होना चाहिए.
स्नान गृह (बाथरूम)– पूर्व दिशा में होना चाहिए.
रसोईघर (किचन)– अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में स्थित होना चाहिए.
अनाज भंडारण– उत्तर दिशा में किया जाना चाहिए.
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अनाज पीसने या कूटने, मिक्सर मशीन के इस्तेमाल का स्थान– पूर्व और दक्षिण-पूर्व के बीच (ईस्ट-साउथ ईस्ट) होना चाहिए.
घी या तैलीय पदार्थों का स्थान– दक्षिण-पूर्व और दक्षिण के बीच होना चाहिए.
शौचालय (टॉयलेट) – दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम (साउथ-साउथ वेस्ट) के बीच उपयुक्त माना गया है.
स्टूडेंट्स के पढ़ाई करने का स्थान – पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम (वेस्ट-साउथ वेस्ट) के बीच सबसे उपयुक्त होता है.
न्यूली मैरिड कपल का कमरा – उत्तर और उत्तर-पश्चिम (नॉर्थ-नॉर्थ वेस्ट) के बीच माना गया है.
दवाइयों और बीमार व्यक्तियों के लिए स्थान – उत्तर और उत्तर-पूर्व (नॉर्थ-नॉर्थ ईस्ट) के बीच उपयुक्त माना गया है. इससे रोगी जल्दी स्वस्थ होता है.
गर्भवती स्त्रियों के लिए उपयुक्त स्थान – नैऋत्य कोण (साउथ-वेस्ट) को सबसे उपयुक्त माना गया है, ताकि उनका गर्भकाल सुरक्षित और सुखद रहे.
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इन सभी दिशाओं को ध्यान में रखकर निर्मित भवन एक उत्तम वास्तु माना जाता है. हालांकि, इन्हें पूर्ण रूप से लागू करने के लिए एक विशाल भवन की आवश्यकता होती है, फिर भी अगर इन सिद्धांतों को किसी भी रूप में अपने घर में समाहित किया जाए, तो वह वास्तु अधिक शुभ और सुखदायक बन सकता है.