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5 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी
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हम आवाज को सिर्फ कम्युनिकेशन का जरिया मानते हैं, लेकिन यह हमारी सेहत का एक अहम संकेत भी है। आमतौर पर सर्दी-जुकाम या थकान होने पर आवाज में हल्का बदलाव होता है। कई बार आवाज में बदलाव डायबिटीज, थायरॉइड, हार्ट डिजीज या न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम्स का इशारा भी हो सकता है।
दरअसल आवाज ब्रेन, लंग्स और वोकल कॉर्ड्स के कोऑर्डिनेशन से बनती है। इसलिए इनमें किसी भी गड़बड़ी का असर तुरंत आवाज पर दिखता है। ऐसे में सवाल ये है कि आवाज में हो रहे कौन-से बदलाव सामान्य हैं और किन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
‘फिजिकल हेल्थ’ में आज जानेंगे कि आवाज कैसे सेहत का हाल बताती है। साथ ही जानेंगे कि-
- आवाज में किस तरह के बदलाव गंभीर हो सकते हैं?
- आवाज में कौन-से बदलाव किस बीमारी का संकेत हैं?
सवाल- हमारी आवाज शरीर के किन ऑर्गन्स पर निर्भर करती है?
जवाब- आवाज एक न्यूरो-मस्कुलर और रेस्पिरेटरी प्रक्रिया है, जिसमें कई अंग मिलकर काम करते हैं।
- ब्रेन: बोलने का कंट्रोल सेंटर है, जो सांस, मसल्स और आवाज को निर्देश देता है।
- फेफड़े: हवा का दबाव बनाते हैं, जो आवाज की ऊर्जा का मुख्य सोर्स है।
- वोकल कॉर्ड्स (लैरिंक्स): हवा के गुजरने पर कंपन करते हैं और आवाज पैदा करते हैं।
- जीभ, होंठ और दांत: आवाज को स्पष्ट शब्दों में बदलते हैं, इसे आर्टिक्युलेशन कहते हैं।
- नाक और गला: आवाज की गूंज, टोन और क्वालिटी तय करते हैं।
सवाल- क्या आवाज में अचानक बदलाव किसी छिपी हुई हेल्थ कंडीशन का संकेत हो सकता है?
जवाब- आवाज में अचानक बदलाव अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है। हमारी आवाज ब्रेन, नर्व्स और रेस्पिरेटरी सिस्टम से जुड़ी होती है। इसलिए कई बार बदलाव का कारण गंभीर भी हो सकता है।

सवाल- आवाज में किस तरह के बदलाव कॉमन हैं?
जवाब- आवाज में हल्के बदलाव सर्दी-जुकाम, एलर्जी, डिहाइड्रेशन या ज्यादा बोलने के कारण हो सकते हैं।
- आवाज बैठना (होर्सनेस): आवाज भारी या भर्राई लगती है।
- आवाज कमजोर होना: आवाज धीमी या कम स्पष्ट हो जाती है।
- पिच में बदलाव: आवाज ऊंची या नीची हो सकती है।
- फुसफुसाती या टूटी आवाज: सांस के साथ आवाज टूट सकती है।
- बोलने की स्पीड बदलना: कभी तेज, कभी धीमी हो सकती है।
- खराश या म्यूकस: गले में बलगम से स्पष्टता कम हो जाती है।

सवाल- आवाज में किस तरह के बदलावों को गंभीरता से लेना चाहिए और क्यों?
जवाब- कुछ बदलाव गंभीर बीमारी के शुरुआती संकेत हो सकते हैं, इसलिए इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नीचे ग्राफिक में दिए लक्षण स्ट्रोक, न्यूरोलॉजिकल डिजीज या कैंसर से जुड़े हो सकते हैं। इसमें तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

ग्राफिक में दिए कुछ पॉइंट्स विस्तार से समझिए-
- 2-3 हफ्ते से ज्यादा होर्सनेस: लगातार भारी या बैठी आवाज गले की समस्या का संकेत हो सकती है।
- अचानक बोली लड़खड़ाना: स्ट्रोक या न्यूरोलॉजिकल समस्या का संकेत हो सकता है।
- बोलने पर खांसी के साथ खून: गले या फेफड़ों की गंभीर बीमारी का रिस्क हो सकता है।
- कमजोर या मोनोटोन आवाज: नसों या ब्रेन से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।
- सांस लेने में दिक्कत: रेस्पिरेटरी सिस्टम की समस्या का संकेत है।
सवाल- आवाज में अचानक आए बदलाव के पीछे क्या संभावित कारण हो सकते हैं? यह किन बीमारियों का संकेत हो सकता है?
जवाब- आवाज में अचानक बदलाव कई शारीरिक समस्याओं का संकेत हो सकता है। ग्राफिक में देखिए, आवाज में किस तरह का बदलाव, किस बीमारी का संकेत है-

सवाल- क्या आवाज में आए बदलाव को आइडेंटिफाई कर बीमारियां भी डायग्नोज की जा सकती हैं?
जवाब- हां, आवाज में बदलाव का एनालिसिस कर कुछ बीमारियों के संकेत पहचाने जा सकते हैं। हाल के वर्षों में वॉइस एनालिसिस और AI टेक्नीक्स पर तेजी से रिसर्च हुई है।
- ये टेक्नीक्स आवाज की पिच, स्पीड और कंपन का एनालिसिस करती हैं।
- आवाज के कंपन से कोरोनरी आर्टरी डिजीज के रिस्क के संकेत मिल सकते हैं।
- स्पीच पैटर्न से डिमेंशिया और पार्किंसन के शुरुआती लक्षण पहचाने जा सकते हैं। हालांकि, यह केवल स्क्रीनिंग टूल है।
- किसी भी बीमारी का अंतिम डायग्नोसिस क्लिनिकल टेस्ट और डॉक्टर की सलाह से ही किया जाता है।
सवाल- क्या मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानी होने पर भी आवाज बदलती है?
जवाब- हां, मेंटल हेल्थ का आवाज पर सीधा असर पड़ता है। भावनाएं और स्ट्रेस ब्रेन फंक्शनिंग की स्पीड को बदलते हैं, जिससे आवाज की टोन और रिदम प्रभावित होती है।
- डिप्रेशन: आवाज धीमी, सपाट और कम ऊर्जा वाली हो जाती है।
- एंग्जाइटी: आवाज तेज, ऊंची पिच और कांपती हुई लग सकती है।
- क्रॉनिक स्ट्रेस: सांस तेज चलती है, जिससे व्यक्ति जल्दी-जल्दी बोलता है।
- स्किजोफ्रेनिया: आवाज टूटी-फूटी या मोनोटोन हो सकती है।
ये बदलाव लंबे समय तक बने रहें तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। सवाल- पार्किंसन, अल्जाइमर्स जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में आवाज से किस तरह के संकेत मिलते हैं?
जवाब- न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से ब्रेन और नर्व्स प्रभावित होती हैं, जिससे बोलने के लिए जरूरी मसल्स पर कंट्रोल कम हो जाता है।
- पार्किंसन डिजीज: आवाज धीमी, मोनोटोन, कम वॉल्यूम और सांस भारी होती है। वोकल कॉर्ड्स में हल्का कंपन (ट्रेमर) भी देखा जा सकता है। आवाज की स्पष्टता कम हो जाती है और शब्द साफ नहीं निकलते।
- अल्जाइमर्स/डिमेंशिया: बोलने की स्पीड धीमी हो जाती है और व्यक्ति बार-बार रुकता है। ब्रेन को शब्द खोजने में कठिनाई होती है, वाक्य छोटे और सरल हो जाते हैं। बातचीत में दोहराव बढ़ सकता है।
सवाल- क्या आवाज में हर बदलाव बीमारी का संकेत होता है?
जवाब- नहीं, ज्यादातर बदलाव अस्थायी कारणों से होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं।
- सर्दी-जुकाम या एलर्जी: अस्थायी होर्सनेस (आवाज बैठना) कॉमन है।
- डिहाइड्रेशन: गला सूखने से आवाज भारी हो सकती है।
- ज्यादा बोलना/चिल्लाना: वोकल कॉर्ड्स पर दबाव पड़ने से आवाज बदलती है।
- कैफीन या अल्कोहल: गले को ड्राई करके आवाज प्रभावित कर सकते हैं।
सवाल- क्या उम्र बढ़ने के साथ आवाज में बदलाव होना स्वाभाविक है?
जवाब- हां, उम्र बढ़ने के साथ आवाज में बदलाव होना सामान्य है। इसे मेडिसिनल लैंग्वेज में ‘प्रेस्बीफोनिया’ कहा जाता है।
- आवाज में ताकत कम हो सकती है।
- हल्का कंपन महसूस हो सकता है।
- पहले की तुलना में आवाज धीमी हो जाती है।
- लंबे समय तक बोलने पर थकावट होती है।
- फेफड़ों की क्षमता घटने से ऐसा होता है।
सवाल- अगर आवाज 2-3 हफ्ते से ज्यादा समय तक खराब है तो कौन-से टेस्ट जरूरी होते हैं?
जवाब- यह किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। सही कारण जानने के लिए ईएनटी (ENT) एक्सपर्ट द्वारा कुछ जांच जरूरी होती है।
- लैरिंगोस्कोपी: कैमरे से वोकल कॉर्ड्स का स्ट्रक्चर और कंडीशन देखी जाती है।
- वीडियो स्ट्रोबोस्कोपी: वोकल कॉर्ड्स के कंपन और फंक्शनिंग का एनालिसिस होता है।
- ब्लड टेस्ट: थायरॉइड या अन्य हाॅर्मोन असंतुलन की जांच की जाती है।
- न्यूरोलॉजिकल रिव्यू: नर्व्स या ब्रेन से जुड़ी समस्या का पता लगाने के लिए यह टेस्ट होता है।
- पल्मोनरी टेस्ट: रेस्पिरेटरी सिस्टम की स्थिति जांचने के लिए यह टेस्ट होता है।
सवाल- आवाज और वोकल कॉर्ड को हेल्दी रखने के लिए क्या करें?
जवाब- वोकल कॉर्ड की सेहत डेली लाइफस्टाइल की आदतों पर निर्भर करती है, सही देखभाल से समस्याएं रोकी जा सकती हैं। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- आवाज में बदलाव के साथ कैसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से कंसल्ट करना जरूरी है?
जवाब- हल्की खराश है या आवाज बैठ गई है तो आमतौर पर कुछ दिनों में ठीक हो जाती है। लेकिन अगर ये बदलाव लंबे समय तक रहें या अन्य लक्षण के साथ हों, तो डॉक्टर से सलाह जरूरी है। जैसेकि-
- 2-3 हफ्ते से ज्यादा होर्सनेस रहे।
- खांसी के साथ खून आए।
- निगलने में दर्द/कठिनाई हो।
- सांस लेने में दिक्कत हो।
- अचानक बोली लड़खड़ाए।
- बहुत कमजोर या मोनोटोन आवाज हो।
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