नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि विकसित देशों का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत से करीब छह गुना अधिक है, फिर भी जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर डाल दी जाती है। प्रधानमंत्री ने इन बातें नई दिल्ली में ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन भाषण देते हुए कीं। इस अवसर पर मोदी जी ने जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत की भूमिका और परमाणु ऊर्जा के महत्व पर प्रकाश डाला।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। उन्होंने बताया कि भारत परमाणु ऊर्जा उत्पादन को तेजी से बढ़ाने पर काम कर रहा है और यह देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है। प्रधानमंत्री ने कहा, “जो लोग पर्यावरण पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं, जब मैं परमाणु ऊर्जा का काम आगे बढ़ाता हूं तो वे इसे रोकने के लिए अदालतों में जाते हैं।” इन टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि सरकार परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार को एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में देख रही है।
इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों ने भारतीय और वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान यह मुद्दा उभरकर सामने आया कि विकसित और विकासशील देशों के बीच कार्बन उत्सर्जन के बारे में असमानता को संबोधित करने की आवश्यकता है। मोदी जी ने यह बात रेखांकित की कि विकसित देशों का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत से काफी अधिक होने के बावजूद, जलवायु परिवर्तन की दायित्व अक्सर विकासशील देशों को थोपी जाती है।
भारत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में काफी प्रगति कर रहा है। सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार के लिए कई पहलें की हैं और देश में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। प्रधानमंत्री ने इस दिशा में कार्यरत सरकारी प्रयासों को स्वीकार किया और यह राष्ट्रीय लक्ष्य पर जोर दिया कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को परमाणु ऊर्जा के माध्यम से पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस संदर्भ में, पेरिस कॉप-21 की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है। पेरिस कॉप-21 जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के तहत आयोजित 21वां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जो 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015 तक फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुआ था। इस सम्मेलन में करीब 195 देशों ने हिस्सा लिया और पेरिस समझौता अपनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के औसत तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना और संभवतः 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की कोशिश करना था। इसके तहत हर देश ने कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने-अपने लक्ष्य तय किए थे। पेरिस समझौते के तहत विकसित और विकासशील देशों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है, जिस पर भारत ने लगातार अपनी बात रखी है कि विकसित देशों को अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार होना चाहिए।
प्रधानमंत्री के इन बयानों के बीच, भारत जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखने के लिए कई पहलें कर रहा है। देश ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में भी काफी प्रगति की है और सौर ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु वित्त और तकनीकी सहायता के लिए भी आवेदन किए हैं ताकि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा दोनों का संयुक्त उपयोग जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए आवश्यक होगा। भारत की स्थिति यह है कि देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में परमाणु ऊर्जा को एक स्वच्छ और विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
इस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह भी चर्चा हुई कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ और हरित पर्यावरण सुनिश्चित करने के लिए सभी देशों को सामूहिक प्रयास करने होंगे। प्रधानमंत्री के भाषण ने यह संदेश दिया कि भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता से समर्पित है, लेकिन साथ ही यह भी जोर दिया कि विकसित देशों को अपने ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार होना चाहिए और विकासशील देशों को इस दिशा में उचित समर्थन मिलना चाहिए।
इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में भागीदारी के माध्यम से भारत ने यह प्रदर्शित किया कि यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत है। प्रधानमंत्री के बयानों ने यह स्पष्ट किया कि भारत परमाणु ऊर्जा के विस्तार को रोकने के प्रयासों का विरोध करेगा और देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए परमाणु ऊर्जा को एक महत्वपूर्ण खंड के रूप में आगे बढ़ाएगा।


















