Ukraine Nuclear Tragedy; Chernobyl Power Plant Blast Disaster History Explained

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26 अप्रैल 1986 यानी आज से ठीक 40 साल पहले। तब के सोवियत रूस का हिस्सा रहे यूक्रेन का प्रिपयत शहर। रात के 1 बजकर 28 मिनट पर 25 साल के फायरफाइटर वसिली इग्नातेंको की नींद एक फोन से टूटी। आवाज आई- कहीं आग लगी है, तुरंत आओ।

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वसिली उठे। वर्दी पहनी। जाते-जाते पत्नी ल्युडमिला से बस इतना कहा- ‘घबराओ मत। जल्द लौटूंगा।’

ल्युडमिला नहीं जानती थी कि ये उनके पति के आखिरी शब्द हैं। वसिली कभी वापस नहीं आए। क्योंकि जिस ‘आग’ को बुझाने वे गए थे, वो कोई साधारण आग नहीं थी। वो चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर-4 की आग थी, वो दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु त्रासदी बन गई।

1980 का दशक। अमेरिका और सोवियत रूस के बीच कोल्ड वार अपने चरम पर थी। दोनों देश एक-दूसरे को दिखाना चाहते थे कि हम ताकतवर हैं, हम आधुनिक हैं।

इसी होड़ में सोवियत रूस ने यूक्रेन के एक छोटे से कस्बे चेर्नोबिल के पास एक विशाल न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाया। 1983 में तैयार हुआ ये प्लांट यूक्रेन की राजधानी कीव से 130 किलोमीटर दूर था और वहां की 10% बिजली अकेले यही प्लांट देता था।

प्लांट से महज 3 किलोमीटर दूर था प्रिपयत। एक खूबसूरत, आधुनिक शहर, जहां 50 हजार लोग रहते थे। ज्यादातर प्लांट के ही कर्मचारी और उनके परिवार।

कहानी में आगे बढ़ने से पहले सीधे शब्दों में जान लेते हैं कि ये RBMK रिएक्टर प्लांट काम कैसे करता था- यूरेनियम की छड़ें को गर्म करो, उससे पानी गर्म होगा, भाप बनेगी, भाप से टर्बाइन घुमेगा और बिजली तैयार।

25 अप्रैल, 1986 को चेर्नोबिल प्लांट के रिएक्टर-4 में पानी के पंप को लेकर एक रूटीन टेस्ट किया जाना था। इसका मकसद ये देखना था कि अगर रिएक्टर एनर्जी जेनरेट करना बंद कर दे, तो बची हुई बिजली से वॉटर पंप्स, बैकअप जेनरेटर चालू होने तक रिएक्टर को ठंडा रख पाते हैं या नहीं।

बिजली की मांग बढ़ने से टेस्ट सुबह नहीं हो सका, तो नाइट शिफ्ट को जिम्मेदारी दी गई। रिएक्टर कंट्रोल इंजीनियर लियोनिद टॉपटुनोव और नाइट शिफ्ट सुपरवाइजर अलेक्सांद्र अकिमोव टेस्ट कंडक्ट कर रहे थे। डिप्टी चीफ इंजीनियर अनातोली डायटलोव इसकी निगरानी कर रहे थे।

यहां पेच ये था कि टॉपटुनोव, जिनके पास टेस्ट की जिम्मेदारी थी, वे 25 साल के थे और उनके पास महज 3 महीने का अनुभव था।

रात 11 बजकर 10 मिनटः रिएक्टर 1 हजार मेगावॉट (MW) कैपिसिटी पर काम कर रहा था। टेस्ट 700 MW पर किया जाना था। कंट्रोल रॉड्स अंदर डालकर पावर घटाई गई, जिससे रिएक्शन धीमी हो सके।

रात 12 बजकर 28 मिनटः अचानक पावर 700 के बजाय 30 MW तक गिर गई। इसे ऊपर लाने के लिए कुछ कंट्रोल रॉड्स बाहर निकाली गईं।

रात 1 बजेः पावर नहीं बढ़ी, तो सुपरवाइजर ने और कंट्रोल रॉड्स निकालने को कहा। इंजीनियर टॉपटुनोव ने मना करते हुए कहा कि कम से कम 15 कंट्रोल रॉड्स रिएक्टर में होनी ही चाहिए।

रात 1 बजकर 5 मिनटः डिप्टी चीफ इंजीनियर ने सस्पेंड करने की धमकी दी। टॉपटुनोव ने और रॉड्स निकालीं। अब रिएक्टर में महज 8 रॉड्स थीं, जो सेफ्टी प्रोटोकॉल के खिलाफ था।

रात 1 बजकर 23 मिनटः 203 कंट्रोल रॉड्स बाहर होने से रिएक्टर कैपिसिटी एकदम से बढ़कर 2,600 MW तक पहुंच गई। रिएक्टर भट्टी की तरह तपने लगा। जेनरेटर चालू होकर पूरी क्षमता तक पहुंच पाता, उसके पहले ही अंदर मौजूद पानी जिसका काम रिएक्टर ठंडा करना था, भाप बनकर उड़ गया। इससे तापमान और बढ़ गया।

रात 1 बजकर 25 मिनटः सुपरवाइजर अकिमोव ने स्थिति हाथ से निकलती देख इमरजेंसी शटडाउन बटन (AZ-5) दबाया, जिससे सारी कंट्रोल रॉड्स एक साथ अंदर चली गई।

कंट्रोल रॉड्स के अंदर जाते ही रिएक्शन कंट्रोल हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। RBMK रिएक्टर में एक बड़ा ‘डिजाइन फ्लॉ’ था। कंट्रोल रॉड्स की टिप ग्रेफाइट की बनी थी, जिसने रिएक्शन को कई गुना बढ़ा दिया। रिएक्टर में 2 भयानक विस्फोट हुए, जिससे ऊपर लगी 1 हजार टन की कवर प्लेट उड़़ गई।

बाहर खड़े लोगों ने नीली रोशनी की एक लकीर आसमान की तरफ जाती हुई देखी। कुछ ने सोचा रंग-बिरंगी आतिशबाजी है। वे नहीं जानते थे कि वो रोशनी जानलेवा रेडिएशन की थी।

चेर्नोबिल के न्यूक्लियर रिएक्टर-4 का कंट्रोल रूम, जहां 25 अप्रैल 1986 की रात सेफ्टी टेस्ट के बाद हादसा हुआ।

चेर्नोबिल के न्यूक्लियर रिएक्टर-4 का कंट्रोल रूम, जहां 25 अप्रैल 1986 की रात सेफ्टी टेस्ट के बाद हादसा हुआ।

फायर फाइटर वसिली इग्नातेंको अपने 20 साथियों के साथ प्लांट पहुंचे। उन्हें बताया गया था कि एक फैक्ट्री में आग है। उनके पास न कोई सुरक्षा उपकरण थे और न ही रेडिएशन मापने का कोई यंत्र।

प्लांट की छत पर जो ग्रेफाइट के जले-पिघले टुकड़े बिखरे थे, वसिली के साथियों ने उन्हें हाथ से उठाकर फेंका। उन्हें क्या पता था कि वो टुकड़े इतने रेडियोएक्टिव थे कि कुछ ही मिनटों में किसी की जान ले सकते थे।

कुछ ही देर में फायरफाइटर्स को उल्टियां होने लगीं। त्वचा लाल पड़ गई। आंखें जलने लगीं। एक-एक करके वे बेहोश होकर गिरने लगे।

इलाज के दौरान कई फायरफाइटर्स के शरीर अंदर से टूटने लगे थे। उनकी त्वचा जलकर उतर रही थी और मांस के लोथड़े तक गिरने लगे थे।

वसिली और उनके 20 साथियों ने आने वाले हफ्तों में दम तोड़ दिया।

पत्नी ल्युडमिला बाद में याद करती हैं- ‘अस्पताल में वसिली को शीशे के पीछे रखा गया था। मैं उन्हें छू भी नहीं सकती थी। जब भी मिलती, नर्स चिल्लाती- दूर रहो, ये रेडियोएक्टिव हैं। मैंने कहा- मुझे परवाह नहीं।’

रेडिएशन के डर से हॉस्पिटल स्टाफ ने फायरफाइटर्स के कपड़े बेसमेंट में लाकर रख दिए थे। इन कपड़ों में आज तक रेडिएशन मौजूद है।

रेडिएशन के डर से हॉस्पिटल स्टाफ ने फायरफाइटर्स के कपड़े बेसमेंट में लाकर रख दिए थे। इन कपड़ों में आज तक रेडिएशन मौजूद है।

सोवियत यूनियन ने घटना से निपटने के लिए तुरंत एक हाई लेवल टीम बनाई, जिसकी कमान डिप्टी प्राइम मिनिस्टर बॉरिस शरबीना को सौंपी। टीम में कुर्चाटोव इस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर रिसर्च के प्रोफेसर वेलेरी लेगासोव को एक्सपर्ट के रूप में जोड़ा गया।

जब वेलेरी मौके पर पहुंचे, तो उन्हें प्लांट का सेंसर 3.6 रॉन्टगेन का रेडिएशन दिखा रहा था। जो खतरनाक जरूर था, लेकिन तुरंत जानलेवा नहीं।

लेगासोव को शक हुआ। नई मशीन मंगवाई। असली आंकड़ा था- 15,000 रॉन्टगेन। यानी 4000 गुना ज्यादा। 500 रॉन्टगेन के रेडिएशन में एक मिनट में जान जा सकती है। यहां 15,000 था।

इसे ऐसे समझिए कि उस रात चेर्नोबिल से जितना रेडिएशन हवा में फैला, उसकी तुलना हिरोशिमा पर हर घंटे दो एटम बम गिराए जाने से की जाती है।

लेगासोव ने डिप्टी प्राइम मिनिस्टर बॉरिस शरबीना से कहा- ‘प्रिपयत शहर तुरंत खाली कराओ। 50 हजार लोगों की जान खतरे में है।’

बॉरिस ने मना कर दिया। उनकी चिंता थी कि खबर फैली तो पूरी दुनिया में सोवियत रूस की बदनामी होगी।

इस बीच प्रिपयत के हॉस्पिटल नंबर-126 में भयावह दृश्य था। हर घंटे सैकड़ों लोग आ रहे थे। जलन, उल्टी, बेहोशी के साथ। हॉस्पिटल भर गया। गेट लगाया गया। कई लोगों ने बाहर ही दम तोड़ दिया।

चेर्नोबिल से लगभग 3 किलोमीटर दूर मौजूद प्रिपयत का हॉस्पिटल नं 126, जो हादसे का बाद से बंद है।

चेर्नोबिल से लगभग 3 किलोमीटर दूर मौजूद प्रिपयत का हॉस्पिटल नं 126, जो हादसे का बाद से बंद है।

हादसे में बचे एक चश्मदीद अलेक्सांद्र युवचेंको बताते हैं- कुछ लोग अपने छोटे बच्चों को नर्सों की गोद में सौंप रहे थे। उन्हें पता था वे नहीं बचेंगे। बस चाहते थे कि बच्चा बच जाए।

27 अप्रैल की सुबह हालात और बिगड़ने पर बॉरिस राजी हुए। 47 हजार से ज्यादा लोगों को 1000 बसों में भरकर शहर से निकाला गया। कहा गया 3 दिन में वापस आ जाओगे।

वे लोग कभी वापस नहीं आए।

चेर्नोबिल प्लांट में लगी आग बुझाना मुश्किल हो रहा था। रिएक्टर खुला था और उसमें मौजूद ग्रैफाइट के ब्लॉक्स जल रहे थे। जब फायरब्रिगेड से बात नहीं बनी, तो हेलिकॉप्टर की मदद से प्लांट पर लगभग 5 हजार टन बोरॉन पार्टिकल, रेत और मिट्टी बरसाए गए।

रेडिएशन की वजह से आग बुझाने में लगा एक हेलिकॉप्टर क्रेन की केबल में उलझकर क्रैश हो गया था।

रेडिएशन की वजह से आग बुझाने में लगा एक हेलिकॉप्टर क्रेन की केबल में उलझकर क्रैश हो गया था।

आग बुझाने में 10 दिन लगे, लेकिन खतरा अभी टला नहीं था। प्लांट के नीचे भारी मात्रा में पानी मौजूद था। वेलेरी को डर था कि अगर पिघला हुआ यूरेनियम उससे टकराया, तो पानी तेजी से भाप बन जाएगा, जिससे बड़ा विस्फोट हो सकता है।

तब तीन कर्मचारी आगे आए। उन्होंने रिएक्टर के नीचे मौजूद रेडियोएक्टिव मटेरियल से भरे हिस्से में गए और वाल्व खोलकर पानी निकाला।

प्लांट से 18 किलोमीटर दूर चेर्नोबिल कस्बे में मौजूद 'हीरोज मेमोरियल', जिसे त्रासदी में जान गंवाने वाले फायरफाइटर्स और कर्मचारियों की याद में बनाया गया है।

प्लांट से 18 किलोमीटर दूर चेर्नोबिल कस्बे में मौजूद ‘हीरोज मेमोरियल’, जिसे त्रासदी में जान गंवाने वाले फायरफाइटर्स और कर्मचारियों की याद में बनाया गया है।

सोवियत संघ ने सैकड़ों माइनर्स की मदद से रिएक्टर के नीचे सुरंग खोदकर नीचे एक कॉन्क्रीट बेस तैयार करवाया, जिससे यूरेनियम धरती में जाकर मिट्टी की उर्वरता और पास मौजूद प्रिपयत नदी के पानी को दूषित न कर पाए।

माइनर्स ने रेडिएशन के बीच दिन-रात काम किया, कई लोग गर्मी के कारण कम कपड़ों में काम करते थे। इस वजह से वे रेडिएशन के डायरेक्ट कॉन्टैक्ट में आए और रेडिएशन से जुड़ी बीमारियों के शिकार हुए।

चेर्नोबिल के नजदीक रसोखा गांव में रखे वाहन, जो शहर की सफाई के काम में लिए गए थे। रेडिएशन के कारण इन्हें बाद में इस्तेमाल नहीं किया जा सका।

चेर्नोबिल के नजदीक रसोखा गांव में रखे वाहन, जो शहर की सफाई के काम में लिए गए थे। रेडिएशन के कारण इन्हें बाद में इस्तेमाल नहीं किया जा सका।

UN के मुताबिक, चेर्नोबिल से निकला रेडिएशन हिरोशिमा में गिराए परमाणु बम से 400 गुना ज्यादा था। अगले 4 सालों में 5000 से ज्यादा लोग थायरॉइड कैंसर से मरे। ग्रीनपीस जैसी संस्थाएं मानती हैं कि सोवियत रूस ने आंकड़े छुपाए और असली संख्या 93 हजार से 2 लाख के बीच हो सकती है।

प्लांट के आस-पास 30 किलोमीटर का इलाका आज भी ‘एक्सक्लूजन जोन’ है। यहां न रहना मुमकिन है, न खेती।

प्रियपत शहर को हादसे के बाद खाली कराया गया था। ये शहर आज भी एक्सक्लूजन जोन में आता है और पिछले 40 सालों से वीरान है।

प्रियपत शहर को हादसे के बाद खाली कराया गया था। ये शहर आज भी एक्सक्लूजन जोन में आता है और पिछले 40 सालों से वीरान है।

हादसे के 206 दिन बाद रिएक्टर के ऊपर कंक्रीट का एक ढांचा बनाया गया। साल 2019 में उसके ऊपर 1.6 अरब डॉलर की लागत से एक विशाल स्टील डोम बनाया गया जो 100 साल तक रेडिएशन रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। उस डोम के अंदर आज भी 4 टन जानलेवा रेडियोएक्टिव पदार्थ बंद है।

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के ऊपर बना डोम, जिसे 10 हजार से ज्यादा लोगों ने मिलकर करीब 12 सालों नें तैयार किया।

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के ऊपर बना डोम, जिसे 10 हजार से ज्यादा लोगों ने मिलकर करीब 12 सालों नें तैयार किया।

प्रोफेसर वेलेरी लेगासोव ने पूरी दुनिया को चेर्नोबिल की सच्चाई बताई। 1986 में वियना में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सामने RBMK रिएक्टर की डिजाइन खामियां उजागर कीं। सोवियत सरकार नाराज हो गई।

लेगासोव ने एक के बाद एक टेप रिकॉर्ड करके सच दुनिया के सामने रखा- कैसे सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया, कैसे अफसरों ने जानबूझकर खतरे को छुपाया।

27 अप्रैल 1988 को हादसे की दूसरी बरसी पर वेलेरी लेगासोव ने खुद की जान ले ली।

27 अप्रैल 1988 को हादसे की दूसरी बरसी पर वेलेरी लेगासोव ने खुद की जान ले ली।

उनकी रिकॉर्ड की हुई ‘लेगासोव टेप्स’ सोवियत संघ के पतन के बाद सार्वजनिक हुईं। कहा जाता है कि इन टेपों ने सोवियत सरकार की विश्वसनीयता को ऐसा धक्का दिया जो देश के टूटने में अहम कारण बना।

डायटलोव समेत तीन मुख्य आरोपियों को 10-10 साल की सजा सुनाई गई।

हादसे के बाद प्रिपयत शहर हमेशा के लिए वीरान हो गया। बच्चों के खिलौने, परिवारों की तस्वीरें, खाने की अधूरी थालियां, सब जहां थे, वहीं पड़े रहे। आज भी उस शहर की इमारतों में पेड़ उग आए हैं। सड़कों में दरारें पड़ गई हैं। लेकिन कोई इंसान वहां नहीं रहता। *** ये स्टोरी दैनिक भास्कर में फेलोशिप कर रहे प्रथमेश व्यास ने लिखी है।

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References and Further Readings:-

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