पीएम बालेन शाह ने रविवार को दावा किया- नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है। मामले ने तूल पकड़ा, तो नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी।
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क्या वाकई नेपाल ने भारत की जमीन कब्जा की है और बालेन का दावा उनका ही नुकसान कैसे कर सकता है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: बालेन शाह ने क्या दावे किए, जिन पर हंगामा मच गया?
जवाबः नेपाल में जेन-जी आंदोलन के बाद मार्च 2026 में चुनाव हुए। पुरानी पार्टियां और नेता बुरी तरह हार गए। बालेन शाह की अगुआई में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिला। 35 साल के बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने।
पीएम बनने के 65 दिन बाद 31 मई को बालेन संसद में पहला भाषण देने पहुंचे थे। इसी दौरान कुछ सांसदों ने उनसे भारत-नेपाल सीमा विवाद पर सवाल पूछा। जवाब में बालेन ने 2 बड़ी बातें कहीं…
- प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि न सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है।
- हमने केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि यूके सरकार से भी बात की है। हमारा मानना है कि ब्रिटेन को भी इस मामले में रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उस दौर का है जब ब्रिटिश इंडिया इस क्षेत्र को छोड़कर गया था।

बालेन शाह ने पहली बार सदन में सांसदों के सवालों का जवाब दिया।
इन बयानों के बाद नेपाल की संसद में हंगामा मचा। विपक्षी दलों ने उनसे सबूत मांगे। बयान को संसद की कार्रवाई से हटाने की मांग की गई। प्रधानमंत्री को माफी मांगने के लिए कहा जाने लगा।
नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने X पर लिखा ‘उन्हें जनता को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वह कौन-सी जगह है और उसके क्या सबूत हैं। उन्हें तुरंत उस गलती को सुधारना चाहिए और सम्मानपूर्वक वह जमीन भारत को वापस कर देनी चाहिए।’
विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस के नेता वासना थापा ने कहा, ‘हमें जल्द सूचित किया जाना चाहिए था कि किस भूमि पर अतिक्रमण हुआ। यह एक गंभीर और आपत्तिजनक मुद्दा है। इस बयान को संसद के रिकॉर्ड से भी हटाना चाहिए।’
हालांकि नेपाल में पत्रकारों और राजनयिकों के एक धड़े ने पीएम बालेन की साफगोई और सीमा विवाद को इतनी मजबूती से उठाने की तारीफ भी की है।
सवाल-2: क्या वाकई नेपाल ने भारत की जमीन पर कब्जा कर रखा है?
जवाबः नेपाल के विदेश मंत्रालय ने पीएम के बयान पर खुद स्पष्टीकरण जारी किया। लिखा- ‘प्रधानमंत्री भारत के इलाकों पर कब्जे की नहीं, ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन’ की बात कर रहे थे।’
क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन यानी एक देश की जमीन को दूसरे देश के नागरिक खेती-बाड़ी, रहने के लिए और दूसरे कामों में इस्तेमाल करते हैं।
दरअसल, भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किमी लंबी सीमा है। इसमें पहाड़ी इलाके, नदियां और समतल जमीन है। ज्यादातर खुली सीमा है यानी दोनों देशों के बीच में कोई फेंसिंग नहीं है। जिन इलाकों में जमीन समतल है, वहां दोनों तरफ कुछ जमीन ‘नो मेंस लैंड’ रखी जाती है।
बॉर्डर पिलर के दोनों तरफ 10-10 गज की पट्टी होती है, इसलिए इसे दसगजा भी कहते हैं। इस जमीन पर दोनों देशों के नागरिकों को स्थायी निर्माण, मकान, दुकान या खेती करने की अनुमति नहीं होती।
बिहार के सीमावर्ती इलाकों से भास्कर रिपोर्टर बताते हैं कि सीमा के कई इलाकों में 500 मीटर तक कोई पिलर नहीं है। यहां लोग अपना कब्जा बढ़ा लेते हैं। दोनों तरफ के किसान अपनी जमीन के साथ नो मेंस लैंड की जमीन पर भी खेत जोतकर बुआई कर लेते हैं। कई जगहों पर लोगों ने टीन शेड लगाकर भैंसें और बकरियां भी बांधी हुई हैं।
भारत का सशस्त्र सीमा बल और नेपाल सशस्त्र पुलिस मिलकर इस क्षेत्र में कब्जे हटाने के अभियान चलाते रहते हैं। इसके अलावा भी पिछले सालों में क्रॉस बॉर्डर अतिक्रमण की कुछ रिपोर्ट मिलती हैं…
- 2018 में दैनिक भास्कर ने सीमावर्ती इलाकों से रिपोर्ट की थी कि नेपाल के लोगों ने पश्चिमी चंपारण के करीब 7100 एकड़ इलाके में अवैध कब्जा जमा लिया है। भारत के सशस्त्र सीमा बल यानी SSB ने समय-समय पर इसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को दी है।
- 2022 में उत्तराखंड के चंपावत में भी 5 हेक्टेयर जमीन पर नेपाल के कब्जे की रिपोर्ट दी गई थी।
सवाल-3: बालेन शाह का दावा उनका ही नुकसान कैसे करेगा?
जवाबः उनके दावे से 3 मुश्किलें पैदा होंगी…
1. नेपाल की कूटनीतिक स्थिति कमजोर होगी
- नेपाल लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लगातार अपना हिस्सा बताता आया है। नेपाल का कहना है कि भारत ने यहां कब्जा किया है। एक तरह से नेपाल इस विवाद में खुद को विक्टिम दिखाता आया है।
- अब पीएम बालेन का यह कहना कि उन्होंने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है, नेपाल की डिप्लोमैटिक स्थिति कमजोर करता है। अगर वो खुद कह रहे हैं कि हम भारत की जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, तो वो विक्टिम कैसे हुए?
- पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ‘जब भारत के अतिक्रमण को लेकर पूरे देश में बहस और चिंता है, प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘नेपाल ने भी भारत की सीमा पर अतिक्रमण किया है’, यह पूरी तरह गैर-जिम्मेदाराना है।’
2. ब्रिटेन शामिल हुआ, तो मामला और उलझ जाएगा
- बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यांजंकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत की थी। द काठमांडू पोस्ट के मुताबिक फेन ने साफ कर दिया कि यह द्विपक्षीय मामला है और वे इसमें दखल नहीं देना चाहते।
- भारत भी किसी तीसरे का दखल नहीं चाहता। बालेन शाह के मुताबिक भारत ने उनकी चिट्ठी के जवाब में कहा है- ‘दोनों सरकारें इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और क्षेत्र की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की टीमें बनाएंगी और बातचीत से समाधान तलाशेंगी।’
- ब्रिटेन और भारत के स्टैंड के बाद बालेन शाह के तीसरे देश वाले सुझाव का कोई मतलब नहीं होगा। उनकी यह मांग मामले को और लंबा खींचेगी।
- भारत के पूर्व राजनयिक कंवल सिब्बल लिखते हैं कि ब्रिटेन को इस मामले में घसीटकर क्या बालेन शाह खुद अपने सर मुसीबत मोल लेना चाहते हैं।
3. बालेन शाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठे
- बालेन शाह के बयान पर विदेश मंत्रालय को स्पष्टीकरण देना पड़ा।
- सोशल मीडिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, ‘प्रधानमंत्री ने खुद संसद में यह कहकर कि नेपाल ने अतिक्रमण किया है, इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड का हिस्सा बना दिया।’
- फॉरेन एक्सपर्ट और JNU में प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं, ‘बालेन शाह का बयान अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी नासमझी को दर्शाता है। वे आंदोलन से उभरे एक युवा नेता हैं, इसीलिए उनमें डिप्लोमैसी के अनुभव की कमी है। उन्हें बयान देने के पहले ये सोचना चाहिए कि इससे दोनों देशों के पारंपरिक रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा।’

नेपाल के विपक्षी दल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (UML) ने बालेन शाह के बयान के खिलाफ प्रोटेस्ट किया। 275 सीटों वाले सदन में पार्टी के पास 25 सीटें हैं।
सवाल-4: भारत के लिए इस बयान के मायने क्या हैं?
जवाबः बालेन शाह के ताजा बयान पर फिलहाल भारत ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, पिछले दिनों सीमा विवाद के सवाल पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि नेपाल के ये क्षेत्रीय दावे न तो सही हैं और न ही किसी ऐतिहासिक तथ्य या सबूत पर आधारित हैं।
पीएम बनने के बाद पिछले 65 दिनों में बालेन शाह ने कई ऐसे काम किए, जिससे भारत के डिप्लोमैटिक गलियारों में हलचल है…
भारतीय राजदूत को विशेष दर्जा नहीं दिया: परंपरा के मुताबिक, नेपाल में नए पीएम भारतीय राजदूत से अलग से शिष्टाचार मुलाकात करते हैं। बालेन शाह ने भारतीय राजदूत से अलग से मिलने के बजाय सभी देशों के राजदूतों से सामूहिक मुलाकात की। इससे यह संदेश गया कि उनकी सरकार भारत को कोई विशेष तरजीह नहीं देना चाहती।
मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताई: 4 जुलाई से मानसरोवर यात्रा शुरू होनी है। इसके लिए श्रद्धालु भारत से लिपुलेख पास होते हुए चीन के तिब्बत जाते हैं। नेपाली विदेश मंत्रालय ने इस पर आपत्ति जताई है और कहा है कि लिपुलेख उनका इलाका है। उन्होंने भारत और चीन को भी चिट्ठी लिखकर अपना स्टैंड साफ किया है।
भारतीय विदेश सचिव से नहीं मिले: मई 2026 में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी नेपाल जाकर बालेन शाह को भारत आने का आधिकारिक न्योता देने वाले थे, लेकिन बालेन ने उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया और दौरा रद्द हो गया।
पीएम बनने के बाद भारत नहीं आए: ये परंपरा रही है कि पद संभलाने के बाद नेपाली प्रधानमंत्री भारत का दौरा करते हैं, लेकिन बालेन ने कार्यभार संभालते ही यह घोषणा कर दी कि वे कार्यकाल के पहले साल किसी भी देश के आधिकारिक दौरे पर नहीं जाएंगे।
राजन कुमार के मुताबिक, नेपाल के विदेश मंत्रालय ने पीएम बालेन शाह के बयान पर सफाई दे दी है। इसलिए भारत अभी इस पर कड़ा रुख नहीं अपनाएगा। भारत-नेपाल का सीमा विवाद उतना जटिल भी नहीं है, क्योंकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा है।
इस बीच बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबि लामिछाने 5 दिन के भारत दौरे पर आए हैं। वे बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात करेंगे। इस दौरान हुई बातचीत से नेपाल की नई सरकार का रुख और साफ हो सकता है।

रबि लामिछाने (दाएं) 1 जून को दिल्ली पहुंचे। BJP के जनरल सेक्रेटरी अरुण सिंह ने उनका स्वागत किया।
सवाल-5: भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद क्या है?
जवाबः भारत के पांच राज्यों से नेपाल की सीमा लगती है- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम। इनमें उत्तराखंड में भारत-नेपाल सीमा की लंबाई 173 किलोमीटर है। उत्तराखंड की सीमा चीन से भी लगती है।
इसी सीमा से जुड़े तीन इलाके- लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी विवाद की वजह हैं। नेपाल इन्हें अपना हिस्सा बताता है, जबकि भारत इस दावे को खारिज करता आया है। ये पूरा इलाका लगभग 338 वर्ग किलोमीटर में फैला है यानी रायपुर शहर जितना बड़ा।

भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद करीब 210 साल पुराना है…
- 1816 में सुगौली समझौते के तहत भारत-नेपाल के बीच बहने वाली काली नदी के जरिए दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण किया गया था।
- काली नदी के पश्चिमी इलाके को भारत तो वहीं पूर्वी इलाके को नेपाल का हिस्सा माना गया, लेकिन पहाड़ी नदी होने के चलते इसकी दो धाराएं हैं, जो आगे जाकर एक हो जाती है।
- भारत पूर्वी धारा को काली नदी का उद्गम स्थल मानता है। वहीं, नेपाल पश्चिमी धारा को और इसी आधार पर दोनों देश इलाके पर अपना-अपना दावा करते हैं।
- नेपाल के मुताबिक, ‘काली नदी लिम्पियाधुरा से शुरू होती है, तो उसके नीचे का पूरा हिस्सा हमारा है, जिसमें लिपुलेख और कालापानी भी आते हैं।
- वहीं भारत का कहना है, ‘नदी का उद्गम कालापानी है, ऐसे में सीमा वहीं से शुरू होती है।’
- नदी के रास्ते में हर साल कुछ न कुछ बदलाव होता रहता है, इसलिए भी सीमा के सटीक निर्धारण में दिक्कत होती है।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में मौजूद कालापानी भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद जरूरी है। मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्री इसी इलाके के लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरते हैं। यहां से चीनी सेना पर नजर रखना आसान है। इसीलिए चीन इसे लेकर नेपाल को उकसाता रहता है।
1962 के युद्ध के बाद लिपुलेख दर्रा बंद भी हुआ। हालांकि 2015 में हुए भारत-चीन समझौते के बाद इसे दोबारा खोला गया।
मई 2020 में भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को आसान बनाने के लिए पिथौरागढ़ से लेकर लिपुलेख दर्रे तक 80 किमी की सड़क बनाई, जिस पर नेपाल ने नाराजगी जताई थी।
15 मई 2020 को तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष एम.एम नरवणे ने कहा था कि नेपाल ऐसा किसी और के बहकावे में कर रहा है। नरवणे का इशारा चीन की ओर था।
इसके बाद जून 2020 में नेपाल की संसद ने एक नया नक्शा मंजूर किया था, जिसमें इन इलाकों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि नेपाल का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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27 मार्च 2026 को 35 साल के बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। पीएम बनते ही पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को गिरफ्तार करवा दिया गया। सरकारी दफ्तरों से नेताओं की तस्वीरें उतरवा दी गईं। छात्र राजनीति पर रोक लगा दी गई। अब अफसरों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ना होगा, जबकि कर्मचारियों को हर 15 दिन में सैलरी मिलेगी। पूरी खबर पढ़िए…















