शाम के करीब 6 बजे हैं। कोलकाता के न्यू टाउन में टीन की छत वाला छोटा सा क्लब खुल चुका है। अंदर चार बुजुर्ग कैरम और बाहर कुछ लड़के फुटबॉल खेल रहे हैं। पहली नजर में यह किसी मोहल्ले का नॉर्मल क्लब लगता है, लेकिन ऐसा है नहीं। एक बॉक्स में शराब की बोतलें रख
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न्यू टाउन वाले क्लब में रखी शराब की बोतलें। स्थानीय निवासी गाउर घोष बताते हैं कि शाम होते ही पाड़ा क्लबों में लोग जुटने लगते हैं। पैसे मिलाकर शराब खरीदते हैं और क्लब में ही बैठकर पीते हैं।

न्यू टाउन एरिया में ये जगह क्लब का हिस्सा है। यहां ममता बनर्जी और TMC के बैनर लगे हैं। सामने खड़े शख्स तपस मंडल हैं। वे बताते हैं सब क्लब TMC के ही हैं।
बंगाल में 23 अप्रैल को पहले फेज की वोटिंग में रिकॉर्ड 93% वोटिंग हुई। 29 अप्रैल को दूसरे फेज की वोटिंग होगी। हर मोहल्ले में बने क्लब TMC के प्रचार में जुटे हैं। बंगाल की राजनीति समझने के लिए इन्हें समझना जरूरी है। ममता सरकार ने 2025 में हर रजिस्टर्ड क्लब को 1.1 लाख रुपए दिए थे। 2018 में ये रकम सिर्फ 10 हजार थी, यानी 8 साल में सरकारी मदद 10 गुना बढ़ी है।
अब तक सरकार क्लबों को 3,500 से 5,000 करोड़ रुपए दे चुकी है। 2025 में इन पर 495 करोड़ खर्च किए। ये 386 करोड़ रुपए लागत वाले भारत के पहले चंद्रयान प्रोजेक्ट से करीब 109 करोड़ रुपए ज्यादा है। बदले में क्लब मेंबर TMC के कैडर की तरह काम करते हैं। चुनाव के वक्त पोस्टर, रैली, वोटर लाने ले जाने में मदद करते हैं। क्लब नेटवर्क जहां मजबूत होता है, वहां दूसरी पार्टी का संगठन कमजोर रहता है।

‘क्लब और पार्टी ऑफिस में फर्क खत्म, सभी क्लब TMC से जुड़े, विधायकों से मदद’
न्यू टाउन में रहने वाले तपस मंडल कहते हैं, ‘अब क्लब और पॉलिटिकल पार्टियों के ऑफिस में खास फर्क नहीं रह गया है। सभी लोकल क्लब TMC से जुड़े हैं। इनके मेंबर पार्टी की एक्टिविटी में शामिल होते हैं। विधायक और सरकार क्लबों को टीवी, खेल का सामान और दुर्गा पूजा के लिए मदद देते हैं। 2011 से पश्चिम बंगाल सरकार स्पोर्ट्स क्लब और पाड़ा क्लबों को अलग-अलग योजनाओं के जरिए पैसे दे रही है।’
सरकारी रिकॉर्ड में अलग-अलग तरह के क्लब दर्ज हैं। सिर्फ दुर्गा पूजा कराने वाले क्लब ही करीब 45 हजार हैं। इनके अलावा पाड़ा क्लब, स्पोर्ट्स क्लब और यूथ क्लब हैं। सब मिलाकर ये करीब 1 लाख तक पहुंच जाते है। कई जगह एक पाड़ा में 4 से 5 क्लब है।
सबसे ज्यादा पैसा दुर्गा पूजा ग्रांट के तौर पर मिलता है। 31 जुलाई, 2025 को रजिस्टर्ड क्लबों को सरकार ने 495 करोड़ रुपए बांटे। इसके अलावा हर साल सभी छोटे-बडे़ रजिस्टर्ड क्लबों को सरकार से 2 लाख रुपए मिलते है। बिजली के बिल में 80% छूट, फायर लाइसेंस, सरकारी फीस में छूट भी इसमें शामिल है।
साल भर क्लबों को लोकल विधायक, नगरपालिका फंड, स्पोर्ट्स टूर्नामेंट, सांस्कृतिक कार्यक्रम, क्लब बिल्डिंग की मरम्मत, सरकारी कैंप जैसे- ‘दुआरे सरकार’ के लिए पैसे मिलते है।

पहला क्लब अंग्रेजों ने खोला, आजादी के बाद हर मोहल्ले में खुले, युवाओं का अड्डा बने
20वीं सदी की शुरुआत में क्लब मोहल्लों में लोगों के जुटने की जगह होते थे। लोग यहां नाटक करते, फुटबॉल खेलते और साथ त्योहार मनाते थे। शोवाबाजार राजबाड़ी 1885 में खुला पहला भारतीय क्लब था। इससे पहले अंग्रेजों ने 1827 में बंगाल क्लब बनाया था।
रविन्द्रनाथ टैगोर का मानना था कि मजबूत देश की शुरुआत सरकार से नहीं, बल्कि मोहल्ले और समाज से होती है। वे ऐसे क्लबों को लोगों को जोड़ने और समाज को मजबूत बनाने का जरिया मानते थे।
1950 से 1970 के बीच हर मोहल्ले में क्लब बनने लगे। ये युवाओं के मिलने-जुलने की जगह बन गए। 1970 के बाद राजनीति की एंट्री हुई। नेताओं ने क्लबों के जरिए लोगों तक पहुंचना शुरू किया। धीरे-धीरे चुनाव के समय पोस्टर लगाना, रैली और प्रचार करना क्लबों से ही होने लगा। 1977 से 2011 तक लेफ्ट की सरकार में क्लब समाज और राजनीति का हिस्सा बने रहे। हालांकि तब उन्हें सीधे पैसे कम मिलते थे।
रवींद्र भारती यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर बिस्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, ‘2011 में सरकार बदलने के बाद पाड़ा क्लबों की भूमिका काफी बदल गई। पहले ये राजनीति से दूर और तटस्थ हुआ करते थे। धीरे-धीरे इन्हें राजनीति से जोड़ा जाने लगा। क्लबों के प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी के पद पर लोकल नेताओं की भूमिका बढ़ने लगी। इससे क्लब की आजादी कम हुई। उनका इस्तेमाल राजनीतिक कामों में ज्यादा होने लगा।’
कोलकाता की बसंती कॉलोनी में रहने वाले स्वपन बैद्य क्लब में बच्चों को पढ़ाते हैं। वे कहते हैं, ‘हम TMC के सपोर्टर हैं। हमारे इलाके में सात-आठ क्लब हैं। यहां 24 घंटे पानी और बिजली आती है, अच्छी सड़क है। 260 परिवारों को फ्री में फ्लैट मिले हैं।’

ये न्यू टाउन के केष्टोपुर में चंडीबेरिया में बना अंकुर क्लब है। 1985 में बना था और आसपास के इलाकों का पुराना और एक्टिव क्लब है। यहां बच्चों को मुफ्त ट्यूशन, ड्राइंग और स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग दी जाती है।
ममता सरकार ने पहली बार पैसे देने शुरू किए, क्लब पॉलिटिकल हो गए
2011 में लेफ्ट की सरकार चली गई। ममता मुख्यमंत्री बनीं। TMC ने इन क्लबों के असर को जल्दी ही भांप लिया। उसने पाड़ा क्लबों का इस्तेमाल लोकल नेटवर्क बनाने और चुनावों से पहले जनता का मूड समझने के लिए किया। राज्य सरकार ने पहली बार क्लबों को नकद पैसे देना शुरू किया। सरकार ने कहा कि इसका मकसद सोशल, कल्चरल और स्पोर्ट्स एक्टिविटी को बढ़ावा देना है। हालांकि इससे क्लबों और सरकार चला रही पार्टी के बीच सीधा संबंध मजबूत हुआ।
कोलकाता में रहने वाले सुदर्शन मिश्रा अक्सर लोकल क्लब जाते हैं। क्लब का नाम केष्टोपुर है। सुदर्शन कहते हैं, ‘क्लब के बारे में बहुत कुछ जानकर भी कुछ नहीं कह सकता। बगल में रहकर उनके खिलाफ कैसे बोलूं। जिसे जहां अपना स्वार्थ लगता है, वहां काम करता है। यहां सब लोग साथ रहते हैं, इसलिए कुछ कहने से डर लगता है।’

नॉर्थ 24 परगना के केष्टोपुर में नबजागरण संघ नाम से क्लब है। ये क्लब 1967 में बना था। क्लब की दीवार पर लगे चुनाव आयोग के स्टिकर पर लिखा है- पोलिंग स्टेशन नंबर 167।
BJP का दावा: हर साल चंद्रयान प्रोजेक्ट के बराबर पैसे क्लबों को दे रहीं ममता
कोलकाता नगर निगम में BJP पार्षद सजल घोष किशोरी संघ क्लब चलाते है। वे आरोप लगाते है, ‘ममता सरकार खेल और समाजसेवा के नाम पर क्लबों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। केंद्र सरकार ने लगभग 615 करोड़ रुपए में चंद्रयान-3 मिशन पूरा कर रही है, वहीं बंगाल सरकार हर साल करीब 500 करोड़ रुपए क्लबों पर खर्च करती है।’
सजल घोष का दावा है कि क्लबों को मिलने वाले अनुदान के लिए स्थानीय विधायक के साइन जरूरी होते हैं। इससे पॉलिटिकल कंट्रोल बना रहता है। हर क्लब सरकार पर निर्भर रहता है। हालांकि, हम सरकार से पैसे नहीं लेते। जरूरत पड़ने पर मेंबर खुद पैसे जुटाकर लोगों की मदद करते हैं।

एक्सपर्ट बोले- स्कूल बंद, डॉक्टरों की कमी, लेकिन क्लब को फंड मिल रहा
प्रोफेसर बिस्वनाथ चक्रवर्ती क्लबों को मिल रहे फंड पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, ‘स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की हालत खराब है। करीब 8,200 प्राइमरी स्कूल बंद हो गए हैं। हॉस्पिटलों में डॉक्टरों की कमी है। यूनिवर्सिटी में टीचर कम हैं। करीब 6 लाख सरकारी पद खाली पड़े हैं, लेकिन क्लबों को फंड मिल रहा है।’

बंगाल में 85 हजार पोलिंग बूथ, इनसे ज्यादा क्लब, चुनाव पर भी असर
पश्चिम बंगाल में एक लाख से ज्यादा क्लब एक्टिव हैं। राज्य में करीब 85 हजार पोलिंग बूथ हैं। कई जगह एक बूथ पर दो क्लब हैं। यही वजह है कि चुनाव में इनका असर बहुत बड़ा हो जाता है। लोग मानते हैं कि क्लब अब भी उनके मोहल्ले की पहचान हैं। एक बात लगभग हर कोई मानता है, बंगाल में चुनाव बूथ पर नहीं, पाड़ा क्लब में तय होते हैं।
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