ब्लैकबोर्ड- मां-बाप, पत्नी, बेटा-बेटी सब मलबे में बह गए:गम भुलाने के लिए दिन-रात शराब पीता हूं, पूरा गांव भी नशे में डूब गया

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‘हम सब अपने घर में सो रहे थे। रात करीब डेढ़ बजे अचानक बहुत तेज आवाज आई। हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही पानी, मलबा और बड़े-बड़े पत्थर हमारे घर के दीवारें तोड़ते हुए भीतर घुस आए। धरती कांपने लगीं। मेरी पत्नी, माता-पिता, बहनें घर के सभी 12 लोग मेरी आंखों के सामने बह गए। मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया। उन 12 लोगों में से किसी एक का भी हाथ पकड़कर उसे बचा नहीं सका। मैंने छत के साथ बनी एक स्लैब पकड़ ली। पानी, पत्थर शरीर से टकरा रहे थे। कुछ देर बाद बचाव दल के लोग पहुंचे। नेवी के जवानों ने मुझे मलबे से बाहर निकाला।’, उन्नीकृष्णन। ब्लैकबोर्ड में इस बार वायनाड लैंडस्लाइड में बच गए लोगों की स्याह कहानी, जिनकी आंखों के सामने उनका पूरा परिवार मलबे में समा गया; दो साल बाद भी वे सहमे रहते हैं, बच्चों और परिवार को भुलाने के लिए शराब का सहारा लेते हैं। 30 जुलाई 2024 की आधी रात, केरल के वायनाड में भूस्खलन यानि लैंडस्लाइड हुई। मेप्पाड़ी पंचायत के मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और पुंजिरिमट्टम मलबे में समा गए। उस वक्त लोग गहरी नींद में थे, उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही मिनटों में उनका घर, उनका परिवार और उनकी दुनिया खत्म हो जाएगी। दो साल बीत चुके हैं। सरकार ने वहां से लगभग 13 किलोमीटर दूर कल्पेट्टा में उनके लिए नई कॉलोनी बसाई है- पक्की दीवारें, सीमेंट की छतें, बिजली के बल्ब। लेकिन इन घरों में सन्नाटा बसता है। रात होते ही नींद गायब हो जाती है। जरा-सी बारिश की आवाज आती है, तो लोग बिस्तर पर उठकर बैठ जाते हैं- जैसे बारिश में पहाड़ फिर दरकने वाला हो। नई कॉलोनी की एक गली में 50 साल के उन्नीकृष्णन मिलते हैं। आंखें लाल हैं। आवाज धीमी। शराब की गंध साफ महसूस होती है। भूस्खलन ने उनके परिवार के 12 लोगों को निगल लिया था। वे सीधे कहते हैं, ‘मैं होश में नहीं रहना चाहता। जिस दिन नहीं पीता, सब कुछ सामने आ जाता है- पत्नी… माता-पिता… उनकी लाशें। अब आंख बंद करता हूं तो वही रात दिखती है। मेरे दो बेटे बच गए- एक नौकरी करता है, दूसरा पढ़ता है। लेकिन उस मलबे की तबाही अब भी मेरी आंखों में अटकी है। दो साल हो गए, मैं ठीक से सोया नहीं हूं। सरकार ने मनोचिकित्सकों को भेजा। कॉलोनी में काउंसलिंग कैंप लगे। लेकिन मैं नहीं गया- बात करने से क्या होगा? जो चला गया, वह लौटेगा क्या? आज भी बारिश की हल्की आवाज होती है तो वे चौंककर दरवाजे की तरफ देखता हूं।
नई दीवारें हैं, नई छत है- लेकिन हमारे दिलो-दिमाग में वही टूटा हुआ घर बसता है। यहां उन्नीकृष्णन के बाद मेरी मुलाकात 42 वर्षीय सुबेर से होती है। वायनाड लैंडस्लाइड में उन्होंने अपने दो बेटों समेत 10 लोगों का परिवार खो दिया। बात करते हुए वे चेहरा दूसरी ओर घुमा लेते हैं। उनके हाथ अनायास कांपने लगते हैं। गहरे मानसिक ट्रॉमा में नजर आते हैं। हिंदी ठीक से नहीं आती, फिर भी टूटे शब्दों में अपनी कहानी सुनाते हैं। सुबेर कहते हैं, ‘उस रात वायनाड में बारिश कहर बनकर बरस रही थी। मैंने वैसी बारिश पहले कभी नहीं देखी थी। पांच दिन से लगातार हो रही थी, रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बहुत चिंतित था। बार-बार पत्नी और बच्चों को फोन कर हाल-चाल पूछ रहा था। उस वक्त केरल के कुन्नूर में नौकरी कर रहा था। फोन पर मेरे बड़े बेटे सहल ने कहा- अब्बू, आप यूं ही डर रहे हैं। यहां ऐसी बारिश होती रहती है। आप चिंता मत कीजिए, आराम से सो जाइए। लेकिन पता नहीं क्यों, उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। रात 1 बजकर 48 मिनट पर लैंडस्लाइड हुई। मलबे का सैलाब आया और मेरे परिवार समेत बाकी लोगों को बहा ले गया। कुछ देर बाद एक दोस्त का फोन आया। उसने बताया कि वायनाड में लैंडस्लाइड हुई है और मेरा हाल-चाल जानने के लिए फोन किया है। मैं घबरा गया। रात के करीब 2 बज रहे थे। मैंने तुरंत घर पर पत्नी को फोन लगाया। फोन नहीं उठा। उसके बाद एक-एक करके घर के बाकी लोगों फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। तभी समझ गया कि शायद मेरी दुनिया लुट चुकी है। मैंने तुरंत बस पकड़ी। अगले दिन घर पहुंचा तो इलाके में भीड़ थी। बचाव कार्य चल रहा था। मेरा घर बह चुका था… और मेरा पूरा परिवार भी। मेरे दो बच्चे… मेरे पिता… बहनें… बहनोई और उनके बच्चे, सब चले गए। एक ही रात में।’ यह कहते हुए सुबेर का गला रुंध जाता है। आवाज भर्राने लगती है। सुबेर कुछ देर तक जमीन की ओर देखते रहते हैं। फिर जैसे भीतर जमा शब्द खुद बाहर आने लगते हैं। ‘दो साल हो गए… मैं ठीक से सो नहीं पाया। दिन-रात शराब पीता हूं। नशे में रहूं तो थोड़ी देर के लिए सब धुंधला हो जाता है। होश में रहूं तो बच्चों के चेहरे साफ दिखते हैं। उस रात सहल मुझे समझा रहा था- अब्बू, आप बेवजह डर रहे हैं और कुछ ही मिनटों बाद पहाड़ टूट पड़ा।’ यह कहते हुए वह कुछ पल के लिए चुप हो जाते हैं। फिर कहते हैं, ‘जब सहल की लाश मिली, तो पहचान भी नहीं हो रही थी। डीएनए टेस्ट से पता चला कि वह मेरा बेटा है। लेकिन रसल… मेरा 9 साल का रसल… वह आज तक नहीं मिला। 32 लोग लापता थे। उनमें मेरा बच्चा भी था। कोई मुझे मेरा रसल लौटा दे… कम से कम उसका चेहरा तो आखिरी बार देख लेता।’ यह कहते हुए वह दोनों हाथों से चेहरा ढक लेते हैं। फिर कहते हैं, ‘अब क्या बचा है? मेरी पत्नी की एक टांग चली गई। वह चल नहीं पातीं। हम सुबह उठते हैं… घर में बैठे रहते हैं… जैसे समय रुक गया हो। घर की दीवारों को देखते रहते हैं। मैं कल्पेट्टा में एक कपड़ों की दुकान पर काम करता हूं… जैसे-तैसे दिन कट जाता है। लेकिन रात आंखों में नाचती रहती है। शराब पीता हूं तो थोड़ी मन को राहत मिलती है। यह बताते हुए साफ नजर आ रहा था कि उनकी आंखें लाल हैं। शायद नशे में हैं या फिर कम सोए हैं। फिर कहते हैं- लोग कहते हैं डॉक्टर को दिखाओ, पर डॉक्टर क्या करेगा? मुझे मेरा बच्चा ला सकता है क्या? यह कहते हुए वे जेब से मोबाइल निकालते हैं। स्क्रीन पर दो बच्चों की तस्वीरें उभरती है। वह उंगली से तस्वीर छूते हैं, जैसे उन बच्चों के चेहरे को सहला रहे हों। दिखाते हैं- यह सहल और यह रसल है। मैं इनकी तस्वीरें साथ लेकर चलता हूं… कहीं भूल न जाऊं। कॉलोनी में ऐसे कई घर हैं, जहां लोग बच तो गए, लेकिन भीतर से टूट चुके हैं। जिंदगी चल रही है- पर जैसे बिना धड़कन के। सुबेर के बाद बालकृष्णन बताते हैं, ‘मैं यहीं पैदा हुआ और यहीं मेरी परवरिश हुई। जो इलाका आप सामने देख रहे हैं, वहीं उस रात पहाड़ टूटा था। पांच दिन तक लगातार बारिश होती रही। घने काले बादलों ने पूरे वायनाड को ढक रखा था। पहाड़ टूटा, तो लगा जैसे कोई बांध फट गया हो। पानी, कीचड़, मिट्टी, पत्थर- सब एक साथ, पूरी ताकत से नीचे आया। घर, दुकानें, पेड़… सब बह गए। कई सौ घर थे यहां। मिनटों में सब मलबा बन गए। लोग चीख रहे थे… और हम बस देखते रह गए। हाथ-पांव जैसे काम ही नहीं कर रहे थे। कुछ लोग उसी वक्त मर गए। हम कुछ नहीं कर पाए… बस खड़े रहे, बेबस। अब सोचता हूं मैं क्यों बच गया।’ बालकृष्णन आगे बताते हैं, ‘यह घटना रात करीब 1 बजे की है। मैं उसी वक्त वहां से भागा था। लौटकर मलबे में से पहला शव मैंने ही निकाला था। वह एक महिला का शव था। मैंने एक साथ इतनी लाशें पहले कभी नहीं देखी थीं। पहाड़ से शव बहकर नीचे आ रहे थे। सड़क किनारे यूं पड़े थे, जैसे किसी ने सब कुछ फेंक दिया हो। मेरे तीन दोस्त भी वहां मदद के लिए आ गए थे। हम लोग बचाव कार्य में जुटे ही थे कि तभी एक और लैंडस्लाइड हो गई। दोस्तों के साथ हम फिर से भागे। पास के दूसरे पहाड़ पर चढ़ गए। लेकिन मेरा दोस्त ब्रजेश फंस गया। वह अपनी जीप लेकर मदद के लिए आया था। अचानक उसकी जीप मिट्टी में धंस गई और ब्रजेश भी उसी में दब गया। मेरी आंखों के सामने उसकी मौत हो गई। हम कुछ नहीं कर पाए। दूसरी लैंडस्लाइड के साथ फिर तेज पानी आया। उसके साथ भी शव बहते हुए आ रहे थे। कुछ को हमने खींचकर पास के छोटे पेड़ों से बांध दिया, वरना वे भी बह जाते।’ वे कहते हैं, ‘मैंने यहां रहते हुए कई भूस्खलन देखे हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं देखा। जहां कभी चार सौ परिवार रहते थे, वहां अब कोई नहीं है। सब कुछ खाली हो गया है। लैंडस्लाइड से बचे लोगों को नया आशियाना जरूर मिल गया है, लेकिन इन घरों में अब भी रुदन और सन्नाटा बसता है। आंसू थमते नहीं। —————————- 1- ब्लैकबोर्ड-घूंघट नहीं किया तो जेठ ने निर्वस्त्र करके पीटा: कम कपड़ों में होती तो दरवाजे पर चढ़कर झांकता था- पति और प्रेमी ने गर्भवती कर छोड़ा ‘पापा ने मेरी शादी के लिए दो एकड़ जमीन बेच दी थी। उस समय मैं 20 साल की थी। जून का महीना था जब मेरी शादी हुई और मैं ससुराल आई। सुहागरात के अगले दिन सुबह-सुबह मेरे जेठ और ननदोई मेरे कमरे में आए। उन्होंने पूछा- तुम्हारी पहली रात कैसी रही? कोई परेशानी तो नहीं हुई? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया: 3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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