2 जून को तमिलनाडु बीजेपी के नेता के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा दिया। 3 दिन मान-मनौव्वल के बाद जब इस्तीफा मंजूर हुआ, तो अन्नामलाई ने अपने नए ‘पॉलिटिकल मूवमेंट’ का ऐलान कर दिया। ये पार्टी 2031 में विधानसभा चुनाव लड़ेगी।
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कहा जा रहा है कि अन्नामलाई बीजेपी में रहते वो हासिल कर सकते थे, जो सीएम विजय थलापति ने किया। जबकि कांग्रेस का कहना है कि अन्नामलाई बीजेपी की ही B टीम बना रहे हैं।
आखिर अन्नामलाई के बीजेपी से किनारा करने की इनसाइड स्टोरी क्या है, क्या अन्नामलाई विजय थालापति की तरह बीजेपी को बड़ी जीत दिला सकते थे, आगे के प्लान की क्या सच्चाई, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: अन्नामलाई के बीजेपी से इस्तीफा देने की इनसाइड स्टोरी क्या है?
जवाब: अन्नामलाई ने अगस्त 2020 को BJP जॉइन की औरे 11 महीने बाद 16 जुलाई 2021 को उन्हें BJP प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
- सितंबर 2023 में तमिलनाडु में BJP और AIADMK का पारंपरिक गठबंधन टूट गया। इसकी वजह अन्नामलाई के बयानों को माना गया, जो उन्होंने जयललिता, पलानीस्वामी और सीएन अन्नादुरई जैसे बड़े द्रविड़ नेताओं के खिलाफ दिए थे।
- अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ी बीजेपी और AIADMK को एक भी सीट नहीं मिली। हालांकि, BJP का वोट शेयर पहली बार 3% से बढ़कर 11% पहुंचा। इसके लिए अन्नामलाई की तारीफ भी हुई।
- लेकिन एक साल बाद 11 अप्रैल 2025 को चैन्नई दौरे पर गए गृहमंत्री अमित शाह ने AIADMK नेता एडापड्डी पलानीस्वामी, EPS के साथ दोबारा गठबंधन का ऐलान कर दिया।
- उसी दिन BJP नेता नैनार नागेंद्रन ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरा। अन्नामलाई समेत पार्टी के 9 सीनियर नेताओं ने उनके नाम का समर्थन किया।
- साफ था कि अन्नामलाई को अध्यक्ष पद से हटाना ही गठबंधन में AIADMK की वापसी की शर्त थी। हालांकि, अन्नामलाई के लिए दूसरा झटका अभी बाकी था।
- 15 मार्च 2026 को विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ। 24 मार्च को NDA ने अपने 27 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी, लेकिन पार्टी ने अन्नामलाई को टिकट नहीं दिया।
- 4 मई को नतीजे आए और पहली बार चुनाव लड़ी थलापति विजय की पार्टी TVK ने 234 में से सबसे ज्यादा सीटें 108 जीतीं।
- BJP और AIADMK का गठबंधन 53 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर रहा। BJP ने पिछले चुनाव में 3 सीटों के मुकाबले सिर्फ एक सीट जीती। उसका वोट शेयर भी 11% से गिरकर दोबारा 3% पर आ गया है।
- 2 जून को अन्नामलाई दिल्ली जाकर अमित शाह से मिले, जिसके बाद उन्होंने BJP राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
- अन्नामलाई ने इस्तीफे में लिखा, ‘तमिलनाडु को लेकर मेरा और BJP का नजरिया हमेशा से अलग रहा। राष्ट्रीय पार्टियां कभी तमिलनाडु के लोगों की नहीं समझ सकतीं।’

5 जून को बीजेपी ने अन्नामलाई का इस्तीफा स्वीकार करते हुए प्रेस रिलीज जारी की।
- इसी दिन यानी 5 जून को अन्नामलाई ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर ‘इधु नम्मा इयक्कम’ यानी ‘ये हमारा आंदोलन है’ नाम के अपने पॉलिटिकल मूवमेंट का ऐलान भी कर दिया।
- उन्होंने कहा, ‘मेरी सबसे बड़ी इच्छा एक नया रास्ता और नया आंदोलन शुरू करने की है। बीजेपी ने मुझे 6 साल तक तमिलनाडु के लोगों के लिए काम करने का मौका दिया। आज मैं उससे अलग हो गया हूं।’

अन्नामलाई 5 जून की रात दिल्ली से चेन्नई पहुंचे। एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए बड़ी संख्या में समर्थक जमा हुए थे।
दरअसल, तमिलनाडु में पिछले 60 सालों से एक अलग तरह की राजनीति होती आई है, जिसे ‘द्रविड़ पॉलिटिक्स’ कहते हैं। इसी द्रविड़ पॉलिटिक्स के सहारे पार्टियां DMK और AIADMK 60 सालों तक लगातार सत्ता में रहीं। अन्नामलाई ने बीजेपी में रहते द्रविड़ पॉलिटिक्स का काट निकालने की कोशिश की, लेकिन उनका ये मिशन सफल नहीं हो पाया।
सवाल-2: आखिर तमिलनाडु की द्रविड़ पॉलिटिक्स है क्या?
जवाब: इसकी शुरुआत होती है- आर्य बनाम द्रविड़ की बहस से। जर्मन भाषाविद मैक्स मूलर जैसे कई विद्वानों ने दावा किया कि 1500 ईसापूर्व आर्य नाम की एक जाति ने भारतीय उपमहाद्वीप पर हमला किया। इनकी भाषा संस्कृत थी। वहीं दक्षिण भारत में बोली जाने वाली भाषाओं- तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम को द्रविड़ भाषा कहा गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान ये सोच बनी कि द्रविड़ भाषाएं आर्यों की भाषा से कमतर हैं। इसी भाषाई आधार पर देश के लोगों में एक बंटवारा हुआ- आर्य बनाम द्रविड़। फिर 20वीं सदी की शुरुआत में मद्रास में द्रविड़ सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन खड़ा हुआ। शुरुआती द्रविड़ नेता ब्राह्मणों के भी विरोधी थे। उसकी वजह थी कि मद्रास प्रेसिडेंसी में सिर्फ 3% ब्राह्मण सरकारी विभागों में करीब 70% प्रमुख पदों पर काबिज थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं का मानना था कि ब्राह्मण दक्षिण के मूल निवासी नहीं हैं, बल्कि आर्य हैं और बाहरी हैं।
द्रविड़ आंदोलन मूलतः 3 बातों पर टिका था-
- तमिल भाषा, संस्कृति की सुप्रीमेसी और हिंदी भाषा का विरोध।
- जातीय भेदभाव का विरोध, पिछड़े वर्गों की तरक्की।
- केंद्र सरकार से दक्षिण की आजादी की मांग।
इन्हीं तीन बातों पर दो बड़ी द्रविड़ राजनीतिक पार्टियां बनीं…
1. DMK: अन्नादुरई पहले गैर कांग्रेसी CM बने
- द्रविड़ नेता अय्योथी थास ने 1891 में ‘द्रविड़ महाजन सभा’ नाम का गैर-ब्राह्मण जातियों का संगठन बनाया। इसी विचारधारा पर ‘जस्टिस पार्टी’ बनी।
- 1938 में जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष रहे दिग्गज द्रविड़ नेता पेरियार ई. वी. रामासामी ने 1944 में इसका नाम द्रविड़ कझगम यानी अंग्रेजी में ‘द्रविड़ ऑर्गेनाइजेशन’ (DK) रखा। द्रविड़ राजनीतिक आंदोलन का जनक पेरियार को ही माना जाता है।
- आजादी के समय पेरियार का मानना था कि कांग्रेस में ब्राह्मणों के वर्चस्व के चलते देश में अंग्रेजों की जगह ब्राह्मण और उत्तर भारतीय लोगों का वर्चस्व कायम हो जाएगा।
- उन्होंने दक्षिण भारतीयों के लिए द्रविड़ नाडु नाम के आजाद देश की मांग की। इसका पार्टी के बड़े नेता CN अन्नादुरई ने विरोध किया। वह द्रविड़वाद को लेकर उतने कट्टर नहीं थे।
- अन्नादुरई और पेरियार से नाराज कुछ और नेताओं ने 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कझगम, यानी ‘प्रगतिशील द्रविड़ ऑर्गेनाइजेशन’, DMK की नींव रखी।
- 1965 में हिंदी विरोधी आंदोलन के बाद DMK का प्रभाव बढ़ा और 1967 में विधानसभा चुनाव जीतकर मद्रास में पहली बार उसकी सत्ता आई। अन्नादुरई मद्रास राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने और 14 जनवरी 1969 को उन्होंने राज्य का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ कर दिया।

सीएन अन्नादुरई को द्रविड़ राजनीति का फाउंडर माना जाता है। वे 14 जनवरी 1969 को मद्रास राज्य (वर्तमान में तमिलनाडु) के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे।
2. AIADMK, एक्टर MG रामचंद्रन सीएम बने
- इधर 1952 में तमिल एक्टर MG रामचंद्रन यानी MGR की फिल्म ‘पराशक्ति’ में ब्राह्मणवाद का जोरदार विरोध दिखा। लोग उन्हें द्रविड़ पॉलिटिक्स का नेता मानने लगे। 1953 में MGR कांग्रेस छोड़कर DMK से जुड़ गए।
- 1967 में MGR को गोली लगने के बाद सिम्पैथी की ऐसी लहर चली कि वे पहली बार सबसे ज्यादा 27 हजार वोटों से विधायक बने। लोग उन्हें ‘पुरत्ची थलाइवर’ यानी ‘क्रांतिकारी नेता’ कहने लगे।
- 1969 में अन्नादुरई की मृत्यु के बाद पार्टी के प्रेसिडेंट एम. करुणानिधि और MGR में तनाव शुरू हो गया।
- 1972 में MGR ने अपने राजनीतिक गुरु अन्नादुरई के नाम पर ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कझगम यानी AIADMK की नींव रखी। 1977 से 1987 तक MGR दो बार AIADMK की सरकार में सीएम रहे।
- 1987 में MGR की मृत्यु के बाद MGR की को-एक्ट्रेस जयललिता AIADMK की महासचिव बनीं। उन्हें भी MGR का ‘कल्ट स्टेटस’ हासिल हुआ। वह 6 बार तमिलनाडु की सीएम बनीं।

एक कार्यक्रम के दौरान जयललिता का अभिवादन करते ओ. पन्नीरसेल्वम समेत अन्य DMK नेता। जयललिता 1991 से 2016 तक कुल 6 बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं। फोटो – PTI
2016 में जयललिता की मृत्यु के बाद से AIADMK कमजोर पड़ती गई। EPS अभी इसके नेता हैं। इधर DMK की कमान एम.के. स्टालिन के हाथों में है। 2021 से 2026 तक उनकी सरकार रही।
DMK और AIADMK आज भी द्रविड़ पॉलिटिक्स को सबसे ऊपर रखती हैं। तमिल प्राइड, सेकुलरिज्म और एंटी-हिंदी कल्चर के अपने स्टैंड के लिए जानी जाती हैं। हालांकि दोनों में मूल अंतर ये है कि DMK पेरियार की सोच, एंटी-ब्राह्मण रेशनलिज्म जैसे मुद्दों पर ज्यादा सख्त है। जबकि AIADMK उतना कट्टर नहीं है। इसीलिए AIADMK और BJP का गठबंधन भी हुआ।
हालांकि अन्नामलाई द्रविड़ पॉलिटिक्स के बजाय नए तरीके से बीजेपी को सत्ता में लाना चाहते थे। अन्ना से विवाद के चलते बीजेपी इसमें सफल नहीं हुई, लेकिन सिर्फ 2 साल पहले TVK को लॉन्च करने वाले विजय थलापति इसमें सफल हो गए।
सवाल-3: तमिलनाडु में ऐसा क्या करना चाहते थे अन्नामलाई, जिस पर बीजेपी से विवाद हुआ?
जवाब: तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद अन्नामलाई ने बीजेपी की पॉलिटिक्स और द्रविड़ पॉलिटिक्स के अलावा एक तीसरी तरह की पॉलिटिक्स की…
- अन्नामलाई का कहना था कि DMK नेता करुणानिधि और AIADMK की नेता जयललिता के बाद राज्य में एक पॉलिटिकल वैक्यूम है। वोटर्स दो दक्षिणवादी पार्टियों से जुड़े हैं, लेकिन तमिल प्राइड, राष्ट्रवाद को मिलाकर एक नई राजनीतिक ताकत राज्य में उभर सकती है।
- उन्होंने DMK और AIADMK पर हमला बोलना शुरू किया। कहा कि द्रविड़ राजनीति तमिल हितों से भटक गई है और वंशवादी राजनीति, भ्रष्टाचार और समाजिक बंटवारे का जरिया बन गई है।
- अन्ना ने तमिल पहचान के अलावा राष्ट्रवादी बयान भी दिए। चोल साम्राज्य के तमिल राजाओं और तमिल संस्कृति की महानता का जिक्र किया, तो ये भी कहा कि राष्ट्रीय पहचान की कीमत पर तमिल इतिहास का जश्न नहीं मनाना चाहिए।
- 2023 में अन्नामलाई ने 6 महीने में तमिलनाडु की सभी 39 लोकसभाओं में 1700 किमी की पदयात्रा की। 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा, तो कहा गया कि अन्ना ने बीजेपी के लिए अच्छा काम किया है।
- हालांकि 2026 के विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी को लगा कि DMK के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए दोबारा AIADMK के साथ जाना चाहिए।
- AIADMK से बीजेपी के रिश्ते बेहतर करने की कीमत अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़कर चुकानी पड़ी।
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘पद जाने के 6 महीने बाद अन्नामलाई ने दिसंबर 2025 में पार्टी से भी इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन तब अमित शाह ने चुनाव होने तक इंतजार करने को कहा था।’

अन्नामलाई की दाईं ओर खड़े नैनार नागेंद्रन, जो अन्ना के बाद 11 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए।
इस्तीफे के बाद अन्ना का तमिलनाडु में तीसरे तरह की पॉलिटिक्स का एक्सपेरिमेंट रुक गया। हालांकि अन्ना की पॉलिटिकल वैक्यूम वाली बात सही साबित हुई। उन्होंने द्रविड़ राजनीति को जितना कमजोर किया, उसका फायदा विजय को हुआ। अन्ना द्रविड़ राजनीति को राष्ट्रवाद से हराना चाहते थे, वहीं विजय ने यही काम अपने ‘नए द्रविड़वाद’ से किया।
विजय ने 2 फरवरी 2024 को जब तमिलगा वेत्री कझगम, TVK बनाई तब कहा था, ‘हम द्रविड़ राष्ट्रवाद को तमिल राष्ट्रवाद से अलग नहीं करेंगे। ये दोनों इस धरती की दो आंखें हैं।’ यानी विजय ने भी द्रविड़ राजनीति को ऊपर रखा, लेकिन थोड़ा अलग तरह से। पॉलिटिकल एनालिस्ट आर. राजगोपालन कहते हैं कि ये विजय की नई द्रविड़ विचारधारा है।
DMK के आइकॉन पेरियार और करुणानिधि हैं और AIADMK के आइकॉन MGR और जयललिता। जबकि विजय ने 5 बड़ी शख्सियत- कांग्रेस के दिग्गज नेता के. कामराज, पेरियार, महिला स्वतंत्रता सेनानी वेलु नाच्चियार और अंजलाई अम्माल और भीमराव आंबेडकर को अपना आदर्श बताया।
TVK का आधिकारिक नारा है, ‘पिरप्पोक्कुम एल्ला उयिर्क्कुम’ यानी ‘जन्म से सभी जीव समान हैं।’ ये DMK और AIADMK की आर्यन बनाम द्रविड़ पॉलिटिक्स की लाइन से अलग है।
TVK के नाम में द्रविड़ शब्द तक नहीं है। विजय ने चुनाव में ज्यादा कट्टर द्रविड़वादी मानी जाने वाली DMK का पुरजोर विरोध किया। जबकि AIADMK और उसके नेता EPS को लेकर अपना रुख रखा।
सवाल-4: अन्नामलाई का आगे का प्लान क्या, क्या इसमें सफल होंगे?
जवाब: अन्नामलाई ने कहा, ‘पहले मैं लोगों को आंदोलन से जोडूंगा, फिर उन्हें ट्रेनिंग देकर इसे पॉलिटिकल पार्टी बनाऊंगा।’ अन्नामलाई ने WetheLeaders.org नाम का एक पोर्टल बनाया है। 5 जून को पोर्टल शुरू होने के सिर्फ 10 घंटे के भीतर 10 लाख लोगों ने इस पर रजिस्ट्रेशन करा लिया।
अन्नामलाई ने कोयंबटूर में ‘एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स’ बनाकर युवाओं को राजनीति की ट्रेनिंग देने का ऐलान भी किया है।
उन्होंने कहा, ‘इस सेंटर में मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके उन लोगों को ट्रेन किया जाएगा, जो राजनीति में आना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मंच नहीं मिलता। मैं कुछ सबसे प्रतिभाशाली लोगों को राजनीति में लाकर प्रदेश की राजनीतिक भाषा बदलना चाहता हूं।’

अन्नामलाई ने 5 जून को अपने पॉलिटिकल मूवमेंट का ऑनलाइन पोर्टल wetheleaders.org लॉन्च किया, जिस पर 2 दिन में 16 लाख से ज्यादा लोग रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं।
अन्नामलाई का कहना है कि 2031 के विधानसभा चुनाव से पहले स्थानीय निकाय चुनावों में भी अपने उम्मीदवार उतारेंगे। पार्टी BJP को भी उसी नजरिए से देखेगी जैसे DMK, AIADMK या दूसरी पार्टियों को।’
तमिलनाडु BJP प्रदेश उपाध्यक्ष करु नागराजन सहित कई बीजेपी नेता भी इस्तीफा देकर अन्नामलाई से जुड़ गए हैं। नागराजन ने कहा है, ‘मेरे साथ कई और BJP नेता भी हैं, जिन्होंने अन्नामलाई के प्रति समर्थन जताया है।’
पॉलिटिकल एनालिस्ट आर. राजगोपालन कहते हैं, ‘10-15 सालों तक तमिलनाडु में TVK की प्रासंगिकता बनी रह सकती है। लेकिन अगर अन्नामलाई अलग पार्टी बनाते हैं, तो DMK नेता उदयनिधि के अलावा यह TVK के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर सकती है।’
हालांकि तमिलनाडु के सीनियर जर्नलिस्ट आर. रंगराज कहते हैं कि अन्नामलाई के आंदोलन का असर सीमित ही रहेगा, क्योंकि TVK पहले ही युवाओं को अपने साथ जोड़ चुकी है। अभी हम ये भी नहीं जानते कि ये पार्टी पूरी तरह से अन्नामलाई की है या इसमें BJP का समर्थन भी है।’
तमिलनाडु के कांग्रेस नेता और सांसद मणिकम टैगोर ने भी X पर लिखा, ‘तमिलनाडु के लिए प्लान-बी तैयार है और इसके पीछे RSS का भी हाथ है।’

अन्नामलाई ने 2 जून को इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी।
सवाल-5: तो क्या अन्नामलाई के इस प्लान के पीछे बीजेपी है?
जवाब: पॉलिटिकल एनालिस्ट निहार नलिनी सारंगी कहती हैं, ‘अन्नामलाई BJP से इस्तीफा देते हैं, फिर गृहमंत्री के घर पर उनसे मिलते हैं और उसी दिन नई पार्टी का ऐलान कर देते हैं। वो भी उस राज्य में जहां BJP अभी-अभी बुरी तरह हारी है। अन्नमलाई की ये विदाई बड़ी कंट्रोल्ड दिखती है।’
सारंगी के मुताबिक, ‘कोई आदमी गृहमंत्री से पार्टी छोड़ने के बाद नहीं मिलता, बल्कि तब मिलता है, जब उसे नई चाबियां सौंपी जाती हैं। इसका संकेत ये है कि अन्नामलाई ने इस्तीफे में BJP के लिए कोई कड़वी बात नहीं लिखी। PM मोदी की तारीफ की और पार्टी को धन्यवाद भी दिया।’

अन्नामलाई ने अपने इस्तीफे में PM मोदी और BJP नेतृत्व की तारीफ की है। फोटो – X
सारंगी कहती हैं, ‘अन्नामलाई की नई पार्टी BJP के लिए कोई चैलेंज नहीं, बल्कि TVK की प्रतिद्वंद्वी है। इसका टारगेट TVK की तरह OBC समुदाय, शहरी मिडिल क्लास और उन युवा वोटर्स को जोड़ना होगा, जो द्रविड़ियन राजनीति से थक चुके हैं। इसी वोटबैंक ने TVK को 108 सीटें दिलाईं और BJP इस ट्रेंड से अनजान नहीं है।’
आर. रंगराज भी कहते हैं, ‘तमिलनाडु में BJP ने ही अन्नामलाई को नई पार्टी बनाने के लिए बढ़ावा दिया है, क्योंकि अभी बीजेपी AIADMK के साथ मिलकर जैसी राजनीति कर रही है, उसमें अन्नामलाई के लिए कोई स्पेस नहीं बचता।’
आर. राजगोपालन के मुताबिक, ‘अन्नामलाई उन युवा वोटर्स को खींच सकते हैं, जिन तक BJP अपनी मौजूदा पहचान के साथ नहीं पहुंच सकती। उन्हें RSS का साइलेंट सपोर्ट भी मिल सकता है। ऐसे में बीजेपी, AIADMK गठबंधन में रह सकते हैं, जबकि अन्नामलाई अपने पुराने रवैये से DMK और AIADMK दोनों के वोट काट सकते हैं।’
हालांकि, तमिलनाडु BJP अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने कहा है कि बीजेपी नेतृत्व ने अन्नामलाई के आंदोलन को कोई समर्थन नहीं दिया है। BJP नेताओं से अपील है कि वे किसी भी बहकावे में आकर इस मूवमेंट में शामिल न हों।’
***** रिसर्च सहयोग – प्रथमेश व्यास ———————————————————– तमिलनाडु से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…
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