14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’:उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस

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दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। उसकी चमड़ी बंजर जमीन सी फटी-फटी या यूं कह लें पेड़ की छाल जैसी है। उसके शरीर से दुर्गंध आ रही है, मानो मांस का कोई टुकड़ा सड़ रहा हो। एक पल को लगा कि उल्टी हो जाएगी, तो तुरंत बैग से मास्क निकाला और लगा लिया। मुझे देखते ही लड़की सहम गई और मां को आवाज देते हुए दीवार के सहारे अकड़ी-अकड़ी सी भागने लगी। दैनिक भास्कर हर शुक्रवार ला रहा है ऐसी ही दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ऐ जिंदगी। मैं नीरज झा पहले एपिसोड के लिए पहुंचा हूं छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के कौड़ गांव। गांव अब छाल बन रही इसी लड़की से पहचाना जाता है। मुझे देखकर बच्ची भागी तो उसकी आवाज सुनकर मां बाहर आ गईं। मैंने अपने बारे में बताया और आने की वजह भी। बच्ची की मां का नाम सुबी है। उन्होंने बताया कि बेटी का नाम जागेश्वरी है। वो बताती हैं- ‘साल 2012 था और महीना अप्रैल का, जब जागेश्वरी का जन्म हुआ। तीन महीने की ही हुई थी कि इसके पैर की खाल पर हल्के-हल्के कांटे उभरने लगे। हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। लगा किसी ने कुछ तंत्र-मंत्र कर दिया है। ओझा-तांत्रिकों को दिखाया। झाड़-फूंक करवाई। देवी को बलि भी चढ़ाई, लेकिन हुआ कुछ नहीं।’ ‘कुछ महीने बाद जागेश्वरी के शरीर की पूरी चमड़ी कांटे जैसी हो गई। जब भी खेलने घर से बाहर जाती, आस-पास के बच्चे भूत-भूत कहकर चिढ़ाते। आखिर परेशान होकर इसने बाहर निकलना ही छोड़ दिया। अब इस बीमारी के साथ जागेश्वरी भी 14 साल की हो गई है।’ वह बताती हैं, ‘जागेश्वरी अंजान लोगों को देखकर डर जाती, जैसे आपको देखकर डर गई। पहले तो हम दिनभर इसकी देखभाल करते थे, लेकिन इसे ही देखते रहेंगे तो पेट कैसे भरेंगे। अब इसे छोड़कर खेत में काम करने चले जाते हैं। इसे कभी स्कूल नहीं भेजा। बच्चे चिढ़ाते हैं, मास्टर भी कहां ऐसे बच्चे को पढ़ाएंगे। एक दिन, कुछ रिश्तेदार घर आए, तो उन्होंने हमें गीदम कस्बे में इलाज कराने को कहा। जब मैं जागेश्वरी को लेकर गीदम के अस्पताल पहुंची, तो डॉक्टर समेत सभी लोग मुंह बिगाड़ने लगे। बोले- छी! ये लड़की कैसी दिखती है। इसे क्या हो गया?’ जब डॉक्टर को भी कुछ समझ नहीं आया तो हम घर लौट आए। घर से अस्पताल 20 किलोमीटर दूर है। कौन बार-बार जाता। घर में खाने को दाना नहीं, इलाज कहां से कराएं। बुखार-खांसी होती, तो जड़ी-बूटी से ठीक हो जाती। रास्ता तो आपने देखा ही है। यहां पैदल चलना भी मुश्किल है। बारिश में सोचिए क्या हाल होता होगा। अभी आप आए हैं, पता तो चल ही गया होगा। यहां कुछ नहीं है, हमने तो बिजली भी दो साल पहले ही देखी।’ मैंने सुबी से कहा कि एक बार जागेश्वरी से बात करनी है। सुबी उसे समझाने लगीं, करीब आधे घंटे बाद वो घर से बाहर आई। बड़ी मुश्किल से उसे एक स्टूल पर बैठाया। जागेश्वरी की आंखों में आंसू थे। सिर से पांव तक, पेट से जांघ और पीठ तक, पूरे शरीर की चमड़ी पेड़ की छाल जैसी हो गई है। कई जगह घाव भी हैं। सिर्फ चेहरा, हथेली और पैर के तलवे अछूते हैं। कान के ऊपरी हिस्से में अभी कांटेदार उभार आ रहे हैं। मैंने जागेश्वरी से पूछा- बहुत दर्द होता है? गर्दन हिलाते हुए जागेश्वरी गोंडी भाषा में बोली- ‘हां बहुत ज्यादा। अकड़न की वजह से हाथ-पैर सीधे नहीं कर पाती। लंगड़ाकर, दीवार के सहारे बमुश्किल इस कोने से उस कोने तक चल पाती हूं। शरीर की चमड़ी खिंचती है, मन करता है अपनी खाल को खुरपी से छीलकर फेंक दूं।’ करीब ही खाट पर बैठी सुबी, बेटी जागेश्वरी के कपड़े ऊपर करके पूरा शरीर दिखाती है। कहती हैं- ‘इसकी पूरे शरीर की चमड़ी ऐसी ही है। रोज घुट-घुटकर जीते हुए देख रहे हैं। कहीं जाती नहीं। एक साल पहले इसकी बड़ी बहन की शादी थी, तो एक कोने में दुबकी बैठी रही। बाहर नहीं निकली, नहीं तो रिश्तेदार डर जाते। आज भी पास ही एक गांव में रिश्तेदार के बेटे की शादी है। हमें जाना है।’ मैंने पूछा- जागेश्वरी भी जाएगी? चेहरे पर बिना किसी भाव के सुबी बोली- ‘कैसे जाएगी सर? शरीर ही ऐसा है। ठीक से चल-फिर नहीं पाती। बाहर के लोग भी देखते हैं, तो डर जाते हैं। दस तरह के सवाल पूछते हैं।’ सुबी की आवाज में गुस्सा और तंज दोनों है। गुस्सा इसलिए कि जागेश्वरी बस जी रही है और तंज इसलिए कि उसके हालात कभी ठीक नहीं होंगे। थोड़ी देर बाद मैंने फिर सुबी से पूछा- जागेश्वरी को क्या बीमारी है, ये कब पता चला? सुबी बोली- ‘2019 में। यहां डॉक्टर आए थे। लोगों ने कहा- बच्ची को वहां दिखा लो। बड़े डॉक्टर देखेंगे, तो ठीक हो जाएगी। इसके पापा और चाचा इसे डॉक्टरों के पास ले गए। डॉक्टर दंग रह गए। तुरंत एंबुलेंस बुलाई और जागेश्वरी को रायपुर के बड़े अस्पताल भेज दिया। पापा-चाचा भी साथ गए। वहां हफ्तेभर तो डॉक्टरों को पता ही नहीं चला कि जागेश्वरी को कौन-सी बीमारी है। करीब एक महीने तक बेटी भर्ती रही। मुंबई से रिपोर्ट आई। तब हमें बताया कि दुनिया में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। मुझे तो बीमारी का नाम भी पता नहीं। इसके बाद, सुबी मुझे एक पर्चा दिखाती हैं। जिसमें बीमारी का नाम- इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स लिखा है। सुबी बताती हैं- जब तक यह अस्पताल में भर्ती थी, तो पूरी चमड़ी ठीक हो गई। घर आते वक्त डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दी थीं। कुछ दिन दवाई लगाई, लेकिन जब खत्म हो गई, तो बंद कर दी। अब अस्पताल इतना दूर है कि दवा लेने कौन जाए। आने-जाने का भाड़ा भी लगता है, वो कहां से लाएं। डॉक्टर भी सिर्फ नाम के हैं। बच्ची को देखने कोई नहीं आता। मैं अकेली क्या-क्या करूं। सरकार से अब तक केवल 13 हजार रुपए की मदद मिली है। न ही विकलांग सर्टिफिकेट बना है, न ही इस बीमारी का। सुनने में आया है कि ऐसे लोगों को सरकार 600 रुपए महीना देती है। लेकिन वो मदद भी नहीं मिली। इसी बीच, जागेश्वरी जमीन पर बैठने की कोशिश करती है, लेकिन उसके घुटने मुड़ नहीं रहे। हाथों का भी ऐसा ही हाल है। घर में शौचालय नहीं है। मां कहती हैं- जैसे-तैसे खेत में जाती है। 2021 में इसके पिता की गले के कैंसर से मौत हो गई। मेरी उम्र भी ढल चुकी है। मैं कमाऊं या इसकी देखभाल करूं। तीन और बच्चे हैं। सिर्फ इसे ही देखूंगी, तो बाकी का क्या होगा? मेरे बाकी तीनों बच्चे ठीक हैं। पति थे, तो सहारा था। अब जब तक मैं जिंदा हूं, इसकी देखभाल कर रही हूं। मरने के बाद इसका क्या होगा, पता नहीं। मेरी भी उम्र अब कितनी ही बची है।’ सुबी थोड़ा रुककर पूछती हैं- हमें शादी में जाना है। कुछ और तो नहीं पूछना? अब मैं वहां से चल पड़ता हूं। जागेश्वरी की हालत देखने के बाद मन में कई सवाल उठ रहे हैं। जैसे- यह बीमारी क्यों होती है? इसकी दवाएं कौन-कौन सी हैं? क्या बच्ची कभी ठीक हो पाएगी? इन सभी सवालों का जवाब खोजने के लिए मैं दंतेवाड़ा से रायपुर मेडिकल कॉलेज के लिए निकलता हूं। वहां मेरी मुलाकात डर्मेटोलॉजिस्ट डिपार्टमेंट के हेड डॉक्टर मृत्युंजय सिंह से हुई। इन्होंने ही 2019 में जागेश्वरी का इलाज किया था। मैंने उनसे जागेश्वरी की बीमारी का जिक्र किया। थोड़ी देर बाद वो बोले- ‘हां-हां, याद आ गया। अरे वो बहुत खतरनाक केस था। ऐसा केस मेरे सामने क्या, देश में भी शायद पहली बार ही आया होगा। हम लोगों ने इसके बारे में पढ़ा था, लेकिन प्रैक्टिकली देखने को भी मिलेगा, सोचा नहीं था। 2019 में जब जागेश्वरी को यहां लाया गया, तो उसकी हालत बहुत खराब थी। एक महीने तक इलाज चला। तब तो वह ठीक हो गई थी। मैंने बताया कि अब उसकी हालत और बिगड़ गई है। डॉ. मृत्युंजय बोले- ‘हां, बीमारी ही ऐसी है। इस बीमारी से इंसान मरता तो नहीं है, लेकिन आम लोगों की तरह जी भी नहीं पाता। चमड़ी इस कदर सूखकर फटने लगती है। यह ऐसी बीमारी है, जिसका पूरी तरह इलाज संभव नहीं है। इसे सिर्फ मैनेज और कंट्रोल किया जा सकता है। जब वह बच्ची हमारे पास आई, तो सबसे पहले उसे भर्ती किया गया। उसकी बायोप्सी और जेनेटिक एनालिसिस के लिए सैंपल मुंबई भेजे। निजी अस्पतालों में इन जांचों का खर्च करीब 50 हजार रुपए तक पहुंच जाता है, क्योंकि जेनेटिक टेस्ट काफी महंगा होता है।’ जागेश्वरी की हालत देखकर भीतर तक डर और बेचैनी उतर जाती है। शरीर पर पेड़ की छाल जैसी जमी सख्त परतें, हर हरकत में खिंचाव और दर्द… यह सब देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि वह हर दिन किस तकलीफ से गुजरती होगी। सबसे बड़ा सवाल यही है- जिस दर्द को देखकर बाहर वाले सिहर उठते हैं, उसे 14 साल की यह बच्ची आखिर कब तक सहती रहेगी? 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