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16 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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बीते दिनों महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव से डिप्थीरिया (गलघोंटू) के तीन मामले सामने आए। इनमें छह महीने और 11 साल के दो बच्चों की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीनों बच्चों को डिप्थीरिया के टीके नहीं लगे थे।
डिप्थीरिया एक संक्रामक बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो मुख्य रूप से गले और रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित करता है। समय पर टीकाकरण और इलाज न मिलने पर ये जानलेवा हो सकता है।
‘नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2022’ के मुताबिक, साल 2020 में भारत में डिप्थीरिया के 1586 मामले दर्ज हुए, जिनमें 22 लोगों की मौत हुई। वहीं 2021 में 3677 मामले दर्ज हुए, जिनमें 47 लोगों की जान गई थी।
इसलिए आज ‘फिजिकल हेल्थ’ में हम डिप्थीरिया के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- डिप्थीरिया कैसे फैलता है?
- इसके लक्षण क्या हैं?
- इससे बचने के क्या उपाय हैं?
सवाल- डिप्थीरिया (गलघोंटू) क्या है?
जवाब- यह एक गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो ‘कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया’ (Corynebacterium diphtheriae) नामक बैक्टीरिया से होता है।
- यह मुख्य रूप से गले, नाक और रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित करता है।
- संक्रमण के कारण गले में सफेद या भूरे रंग की मोटी लेयर बन जाती है, जिससे सांस लेने और कुछ भी निगलने में परेशानी होती है।
- गंभीर मामलों में टॉक्सिन हार्ट और नर्वस सिस्टम को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सवाल- इसे ‘गलघोंटू’ क्यों कहा जाता है?
जवाब- डिप्थीरिया में गले और टॉन्सिल पर मोटी लेयर बन जाती है, जो सांस की नली को ब्लॉक कर सकती है। इससे मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है और गला घुटने जैसा महसूस होता है। यही वजह है कि इसे ‘गलघोंटू’ कहा जाता है।
सवाल- डिप्थीरिया कैसे फैलता है?
जवाब- यह संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने और संपर्क से फैलता है। सभी रिस्क ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या डिप्थीरिया सिर्फ बच्चों को ही होता है?
जवाब- नहीं, यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। हालांकि जिन बच्चों का टीकाकरण नहीं हुआ है या जिन वयस्कों ने समय पर बूस्टर डोज नहीं ली है, उन्हें रिस्क ज्यादा होता है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में भी यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
सवाल- किन बच्चों को डिप्थीरिया का रिस्क ज्यादा होता है?
जवाब- इन बच्चों को रिस्क ज्यादा होता है-
- जिनकी उम्र 5 साल से कम है।
- जिन्हें डिप्थीरिया का टीका नहीं लगा है।
- जिनकी बूस्टर डोज छूट गई है।
- जो गंदगी और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
- जो कुपोषित हैं।
सवाल- डिप्थीरिया के लक्षण क्या हैं?
जवाब- डिप्थीरिया के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 2-5 दिन में दिखाई देते हैं। कुछ लोगों में लक्षण नहीं दिखते या बहुत हल्के हो सकते हैं। इसके बावजूद वे संक्रमण फैला सकते हैं। सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या डिप्थीरिया सिर्फ गले को प्रभावित करता है?
जवाब- नहीं, गंभीर मामलों में डिप्थीरिया का टॉक्सिन ब्लड स्ट्रीम के जरिए अन्य अंगों तक पहुंच सकता है। इससे-
- इर्रेगुलर हार्टबीट, हार्ट की मसल्स में सूजन (मायोकार्डाइटिस) और हार्ट फेलियर का रिस्क होता है।
- हाथ-पैरों में कमजोरी, निगलने व बोलने में दिक्कत और लकवा का खतरा रहता है।
- रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट ब्लॉक होने का रिस्क हाेता है।
- गंभीर मामलों में किडनी फेलियर भी हो सकता है।
सवाल- डॉक्टर डिप्थीरिया को कैसे डायग्नोस करते हैं?
जवाब- डिप्थीरिया के लक्षण दिखने पर इसकी पुष्टि के लिए कुछ टेस्ट कराए जाते हैं-
थ्रोट स्वैब और कल्चर टेस्ट: शुरुआती स्टेज में गले से सलाइवा/टिश्यू सैंपल लेकर लैब में बैक्टीरिया की पहचान की जाती है।
टॉक्सिन टेस्ट: डिप्थीरिया एडवांस स्टेज में होने पर टॉक्सिन्स बनाने लगता है। इस टेस्ट से इसका पता लगाया जाता है।
ब्लड टेस्ट: गंभीर मामलों में संक्रमण के शरीर में फैलने का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जाता है।
सवाल- डिप्थीरिया का इलाज कैसे होता है?
जवाब- इलाज का उद्देश्य बैक्टीरिया को खत्म करना और उसके टॉक्सिन के असर को रोकना होता है। इसके लिए डॉक्टर-
- शरीर में मौजूद टॉक्सिन के असर को कम करने के लिए एंटीटॉक्सिन देते हैं।
- बैक्टीरिया खत्म करने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं देते हैं।
- गंभीर मामलों में मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है।
- सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होने पर ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है।
- संक्रमण फैलने से रोकने के लिए मरीज को कुछ समय के लिए आइसोलेट किया जा सकता है।
सवाल- डिप्थीरिया से बचने का सबसे असरदार तरीका क्या है?
जवाब- इसके लिए DPT (डिप्थीरिया, पर्टुसिस एंड टिटनेस)/पेंटावेलेंट वैक्सिन दी जाती है। यह वैक्सिन शरीर को संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है और कॉम्प्लिकेशंस से बचाती है। वैक्सिन पूरे देश में ‘राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम’ के तहत फ्री में लगाई जाती है। इसलिए-
- बच्चों का टीकाकरण समय पर पूरा कराएं।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार बूस्टर डोज लगवाएं।
- संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से बच्चों को बचाएं और खुद बचें।
वैक्सिन से जुड़े जरूरी सवाल
सवाल- डिप्थीरिया की वैक्सिन कब लगती है?
जवाब- डिप्थीरिया से बचाव के लिए बच्चों को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत कई चरणों में वैक्सिन दी जाती है। समय पर सभी डोज और बूस्टर लगवाना जरूरी है। वैक्सिन चार्ट ग्राफिक में देखिए-

सवाल- अगर बच्चे की वैक्सिन मिस हो जाए तो क्या करें?
जवाब- ऐसी स्थिति में तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें। आमतौर पर छूटी हुई डोज पूरी की जा सकती है। इसके लिए-
- बच्चे का टीकाकरण रिकॉर्ड जांचें।
- डॉक्टर से सलाह लेकर जल्द-से-जल्द छूटी हुई डोज लगवाएं।
सवाल- क्या वैक्सिन लगने के बाद भी डिप्थीरिया हो सकता है?
जवाब- हां, वैक्सिन लगने के बाद भी कुछ मामलों में डिप्थीरिया हो सकता है। टीका इसके कॉम्प्लिकेशंस से सुरक्षा देता है। इसलिए टीकाकरण कराने वाले लोगों में बीमारी आमतौर पर ज्यादा गंभीर नहीं होती है।
सवाल- किन इलाकों में डिप्थीरिया का रिस्क ज्यादा होता है?
जवाब- डिप्थीरिया का रिस्क उन इलाकों में ज्यादा होता है, जहां टीकाकरण का कवरेज कम है और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है। भीड़भाड़ और खराब हाइजीन वाले क्षेत्रों में संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
सवाल- क्या डिप्थीरिया के मरीज को आइसोलेट करना जरूरी है?
जवाब- हां, मरीज को अलग रखने से संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिलती है।

सवाल- किन स्थितियों में डॉक्टर को तुरंत दिखाना जरूरी है?
जवाब- डिप्थीरिया के कुछ लक्षण गंभीर स्थिति का संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षणों को बिल्कुल इग्नोर न करें। जैसेकि-
- सांस लेने/निगलने में परेशानी हो।
- गले/टॉन्सिल पर सफेद या ग्रे लेयर दिखाई दे।
- सीने में दर्द, हार्टबीट इर्रेगुलर हो।
- सुस्ती या बेहोशी जैसे लक्षण दिखें।
सवाल- क्या डिप्थीरिया में कोई घरेलू उपाय किए जा सकते हैं?
जवाब- नहीं, यह मेडिकल इमरजेंसी है। इसलिए डॉक्टर की निगरानी जरूरी है। कुछ बातों का ध्यान रखें-
- डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं समय पर लें।
- पर्याप्त आराम करें।
- शरीर में पानी की कमी न होने दें।
- आसानी से निगली जा सकने वाली चीजें खाएं।
- मरीज को आइसोलेट करें, ताकि संक्रमण न फैले।
सवाल- डिप्थीरिया कब जानलेवा हो सकता है?
जवाब- समय पर इलाज न होने पर यह जानलेवा हो सकता है। इन स्थितियों में खतरा बढ़ जाता है-
- सांस की नली ब्लॉक होने पर।
- हार्ट तक इन्फेक्शन पहुंचने पर।
- नर्व्स को नुकसान होने पर।
- रेस्पिरेटरी फेलियर होने पर।
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