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साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गौना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? लाल बिहारी बैंक पहुंचे, लेकिन मैनेजर ने जमीन के कागज मांग लिए। कागज लेने के लिए वह अपने चाचा के पास गए। चाचा भड़क उठे। बोले- जाओ, श्मशान में अपने बाप की राख से निकाल लो। परेशान लाल बिहारी गांव के एक आदमी की सलाह पर तहसील पहुंचे। तहसीलदार ने खतौनी निकाली, उस पर नजर दौड़ाई और फिर उनकी तरफ देखकर कहा- तुम तो मर चुके हो! लाल बिहारी रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़े। बोले- साहब, मैं तो आपके सामने खड़ा हूं। तहसीलदार का जवाब था- सामने खड़े हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में तुम मर चुके हो और तुम्हारे हिस्से की जमीन तुम्हारे चाचा के बेटे के नाम दर्ज है। लाल बिहारी यह कहानी सुनाते हुए रो पड़े। ब्लैकबोर्ड सीरीज में मैं नीरज झा ऐसे लोगों की कहानी लाया हूं, जिन्हें सरकारी कागजों में मार दिया गया, लेकिन खुद को जिंदा साबित करने के लिए वे लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे पहले, यूपी के आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर चौराहे पर एक दुकानदार से मैंने पूछा- ‘मुझे लाल बिहारी से मिलना है, उनके घर का पता बता सकते हैं?’ दुकानदार मुझे कुछ देर देखता रहा, फिर बोला, ‘अरे! आप ‘मृतक बिहारी’ का घर पूछ रहे हैं? मैंने कहा- हां, वही जिन्हें कागजों में मरा घोषित कर दिया गया है। दुकानदार ने कहा- ‘ऐसा कीजिए, यहां से पूरब की ओर सड़क पर आगे बढ़िए, फिर बाएं मुड़ जाइएगा। कुछ दूर जाकर किसी से भी पूछ लीजिएगा। और हां, उन्हें ‘मृतक बिहारी’ कहकर पूछेंगे तभी कोई बता पाएगा। लोग ‘लाल बिहारी’ नाम से नहीं जानते।’ अब मृतक बिहारी से मिलने चल पड़ा। रास्ते में सोच रहा था कि आखिर जिस व्यक्ति से मिलने जा रहा हूं, वह तो 70 साल का जिंदा आदमी है, लोग उसे ‘मृतक’ क्यों कह रहे हैं? पैदल चलते हुए करीब 20 मिनट बाद लाल बिहारी के घर पहुंचा। वो अपने बरामदे में बैठे मिले। पूछने पर सारी कहानी सुनाने लगे- ‘उस जमाने में जल्दी शादी हो जाती थी। 10 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी, लेकिन पत्नी 18 साल की हुई, तब मेरा गौना हुआ और वह घर आई। खर्च बढ़ गया तो अपना काम-धंधा शुरू करने के लिए बैंक से लोन लेने गया, जिसके बाद तहसीलदार ने खतौनी निकालकर बताया था कि- मैं मर चुका हूं। उस दिन घर पहुंचकर मां को बताया कि मुझे जमीन के कागजों में मरा बता दिया गया है। इससे दुखी मां ने एक हफ्ते तक चूल्हा नहीं जलाया। जब लोगों को ये बात पता चली तो वे मुझे मृतक बिहारी कहकर बुलाने लगे। सुनकर बुरा लगता है, लेकिन क्या कर सकता हूं? आप खुद तय कर लीजिए आप जिंदा आदमी से बात कर रहे हैं, या किसी मुर्दे से? लोग मुझे भूत-प्रेत, कंकाल तक कहते हैं। रास्ता चलते लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं- देखो-देखो, मरा आदमी जा रहा है। सच में जब मरूंगा, तब पता नहीं क्या कहेंगे?’, लाल बिहारी काफी गुस्से और टीस में ये बातें जल्दी-जल्दी बताते हैं। मेरी नजर उनके बरामदे में रखी दर्जनों फाइलों पर पड़ी। ऐसा लग रहा है जैसे किसी वकील के घर बैठा हूं। वह बताते हैं, ‘ये सभी फाइलें मेरे केस से जुड़ी हैं। मैं अंगूठाछाप हूं। पढ़ने का मौका नहीं मिला, लेकिन अपने दोस्तों की मदद से थोड़ा लिखना-पढ़ना सीख गया हूं।’ वह मुस्कुराकर कहते हैं- ‘गांव में एक आदमी की मौत हो गई है। उसके अंतिम संस्कार में जाना है। जरा सोचिए, एक मुर्दा आदमी मुर्दे को मिट्टी देने जाएगा?’ वह बताते हैं- यह मेरी नानी का घर है। मेरा असली घर यहां से 80 किलोमीटर दूर खलीलाबाद में है। 1955 की बात है। करीब 8-9 महीने का था। अचानक पिता की मौत हो गई। विधवा मां की कोई देख-भाल करने वाला नहीं था। बहुत गरीब परिवार था। मां मुझे लेकर यहां आ गईं। थोड़ा बड़ा हुआ, तो मां ने बताया- पिता की मौत के बाद सभी उन्हें ‘कुलच्छनी’ ‘मनहूस’ कहकर ताने मारते थे। कहते थे- देखो, इसके कैसे करम हैं। आते ही पति को खा गई। मुझे भी कहते थे- कैसा अभागा बेटा पैदा हुआ। जन्म लेते ही बाप को मार दिया। वह बताती थीं कि हमारी हालत इतनी खराब थी कि एक रोटी में दिनभर गुजारा होता था। घर में दूध नहीं था, तो मां मुझे अरारोट घोलकर पिला देती थीं। यहां पास में कुछ बुनकर कपड़े बनाते थे। जब 7-8 साल का हुआ, तो मां ने मुझे उनके पास काम सीखने भेज दिया। वह जमीदारों के खेतों में काम करती थीं। धीरे-धीरे मैंने बुनाई का काम सीख लिया। 10 साल का हुआ तो शादी हो गई और 8 साल बाद, यानी 18 साल का हुआ तो मेरा गौना हुआ। पत्नी घर आई। अब काम की जरूरत पड़ने लगी। बैंक से लोन लेने गया तो जमीन का कागज मांगा गया। वहां से तहसील पहुंचा था, जहां पता चला कि मुझे कागजों में मरा घोषित कर दिया गया है। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? सोचा, अदालत का रुख करूं, लेकिन मेरे एक जानने वाले ने बताया- तुम कोर्ट में चक्कर लगाते मर जाओगे, कुछ साबित नहीं होगा। ऐसा करो, अपने नाम के आगे मृतक लिखकर प्रशासन को चिट्ठियां भेजना शुरू करो। लाल बिहारी बताते हैं- उसके बाद मैंने अधिकारियों को कई चिट्ठियां लिखीं। अपने नाम के आगे मृतक लिखता, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बातचीत के दौरान ही उनकी पत्नी करमी देवी भी पास में आकर बैठ जाती हैं। वह बताते हैं- ‘बहुत परेशान था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। एक दिन घर पर बैठा था। मन में ख्याल आया कि क्यों न किसी का कत्ल कर दूं या कोई बड़ा अपराध कर दूं, ताकि पुलिस मुझे गिरफ्तार करके जेल में डाल दे। जेल से जब मेरी कोर्ट में पेशी हो तो वहां कह दूं- हुजूर, मैं तो मर चुका हूं। जिंदा होता, तब न कोई अपराध करता?’ अब तक कई बार थाने जाकर पुलिस से शिकायत कर चुका था कि- मैं जिंदा हूं, लेकिन मुझे कागज में मरा घोषित किय गया है। पुलिस कोई मदद नहीं कर रही थी। एक दिन मैंने योजना बनाई कि क्यों न चाचा के बेटे यानी अपने भाई का अपहरण कर लूं। उस वक्त वह 8 साल का था। शाम का वक्त था। वह घर के पास खेल रहा था। मैंने उसे उठा लिया और अपने घर में लाकर बंद कर दिया। एक कमरे में उसे हफ्तेभर बंद रखा। चाचा ने थाने में अपहरण केस दर्ज कराया, लेकिन पुलिस ने जान-बूझकर कोई खोजबीन नहीं की। पुलिस चाचा से कह रही थी की तुम्हारे भतीजे ने ही यह काम किया होगा। परेशान मत हो, बेटा वापस लौट आएगा। पुलिस जानती थी कि कागज में जिंदा होने के लिए मैंने ही ये सब किया है। आखिरकार, पुलिस ने भाई को नहीं खोजा। एक हफ्ते बाद मैंने उसे चाचा को सौंप दिया। सोचा अब क्या करूं। गांव में प्रधानी का चुनाव था। मैंने तय किया कि चुनाव लड़ूंगा, क्या पता मुझे सरकारी कागज में जिंदा कर दिया जाए। चुनाव में पर्चा छपवाया। जगह-जगह लगवाए, लेकिन फिर भी मुझे कागज में जिंदा नहीं किया गया। इस तरह छोटे-मोटे 5-6 चुनाव लड़ा। 1986 की बात है। मैंने एक विधायक की मदद ली। उनके साथ लखनऊ में विधानसभा के अंदर गया। वहां अपने नाम के पर्चे फेंके। बड़ी उम्मीद थी की शायद मेरे ऊपर अब एक्शन लिया जाएगा और कागज में जिंदा हो जाऊंगा, लेकिन उस पर भी कोई एक्शन नहीं हुआ। फिर नाउम्मीदी हाथ लगी। उसके बाद 1988 में देश के प्रधानमंत्री रहे वीपी सिंह लोकसभा चुनाव के लिए इलाहाबाद से चुनावी मैदान में उतरे। मैंने सोचा क्यों न उनके खिलाफ उतर जाऊं। मैं भी उनके खिलाफ इलाहाबाद से मैदान में उतर गया। इस बार उम्मीद थी कि मेरी चर्चा होगी और अधिकारी मुझे कागज में जिंदा कर देंगे। उस चुनाव में खर्च के लिए जो कुछ मेरे पास था सब बिक गया, लेकिन मुझे कागजों में जिंदा नहीं किया गया। आखिरकार, वह दिन आया जब पहली बार प्रशासन पर दबाव बना। 1994 की बात है। मेरी पत्नी ने विधवा पेंशन के लिए आवेदन किया। अधिकारी जांच-पड़ताल के लिए मेरे घर आए। उन्होंने पत्नी से कहा- तुम विधवा कहां हो? सिंदूर लगाती हो। चूड़ी पहनती हो। तुम्हारा पति जिंदा हैं, फिर किस बात की विधवा पेंशन? उस पर पत्नी ने कहा- जब मेरे पति सरकारी कागज में मर चुके हैं, तो मैं तो विधवा ही हुई न? लाल बिहारी बताते हैं कि- अब चूंकि पैसा देने की बात थी, तो अधिकारियों ने पहली बार मेरी एक-एक चीज खंगाली। जांच करते-करते एक साल बीत गया। 1995 में आजमगढ़ प्रशासन ने पहली बार मुझे कागजों में जिंदा कर दिया। मेरे गांव की जमीन, जो मेरे चाचा के बेटों के नाम पर थी, वह भी मेरे नाम कराकर दी। इस तरह खुद को जिंदा साबित करने में 18 साल लग गए। बात यहीं खत्म करके लाल बिहारी एक मय्यत यानी शोक में शामिल होने निकल जाते हैं। जाते-जाते कहते हैं- उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मेरे जैसे दर्जनों केस हैं। एक मामला तो जहानागंज के भुजहीं गांव में संजाफी देवी का है। अब वह चले जाते हैं। बातचीत से पहले ही उन्होंने अपनी संस्था ‘मृतक संघ’ के बारे में बताया था। इसके जरिए वह जान-बूझकर मृत घोषित किए गए लोगों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके मुताबिक यूपी में 40 हजार से ज्यादा ऐसे मामले हैं, जिनमें जमीन हड़पने के लिए जिंदा लोगों को ‘मुर्दा’ बता दिया गया है। चाचा ने कागजों में मारा, 6 साल बाद रजिस्टर में हुईं जिंदा अब मैं यहां से 35 किलोमीटर दूर जहानागंज के भुजहीं गांव निकल पड़ा। गांव पहुंचते ही कुछ कच्चे-पक्के मकान नजर आए। चौराहे पर डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति लगी हुई है। बसावट इतनी घनी है कि संजाफी देवी के घर जाने के लिए पैदल ही कच्चे रास्ते से दो घरों के बीच होकर जाना पड़ा। एक घर के बाहर 65 साल की संजाफी देवी खाट पर एक झोले में ढेर सारे कागज लिए मेरा इंतजार कर रही थीं। मुझे देखते ही फफक-फफककर रोने लगीं। वह यहां अपने मायके में रहती हैं। रोते हुए अपना घर-दुआर सब दिखाने लगीं। बोलीं- ‘ये सब आपको कोई मुर्दा औरत दिखा रही है क्या? सरकारी कागजों में मुझे मरा बता दिया गया है। ये सारा खिलवाड़ मेरे चाचा ने किया है। जमीन के लिए मुझे जिंदा होते हुए भी कागजों में मार दिया।’ वह आगे बताती हैं- हम चार भाई-बहन थे, लेकिन मैं ही इकलौती जिंदा बची। बाकी सभी बचपन में ही बीमारी से मर गए। 1986 की बात है। मेरी शादी हुई थी। कुछ महीने बाद पिता जी गुजर गए। फिर 2002 में मां भी चल बसीं। मुझे आज भी याद है- एक तरफ दरवाजे पर मां की लाश पड़ी थी। मेरे एक चाचा और उनके बेटे अर्थी तैयार कर रहे थे। वहीं, दूसरी तरफ मेरे बाकी चार चाचा पंचायत बुलाकर जमीन का हिस्सा बांटने में जुटे थे। मैंने कहा- पहले मां का अंतिम संस्कार हो जाने दीजिए, फिर जमीन बांट लेंगे। उस वक्त मेरी मां के नाम ढाई एकड़ जमीन थी। मां के अंतिम संस्कार के कुछ दिन बाद जब मैं अपने खेत में गई, तो मेरे चाचा और उनके बच्चे कहने लगे- ‘अरे बुढ़िया, तुम्हारा अब यहां कुछ नहीं बचा। यहां से चली जा।’ उसके बाद रोते हुए मैं तहसील पहुंची। कागज निकलवाए, तो पता चला कि चाचा ने मुझे रजिस्टर में मृत बताकर सारी जमीन हड़प ली है। उस दिन मेरा कलेजा फट गया। जब मेरा बेटा बड़ा हुआ, तो 2005 में कोर्ट में मुकदमा दायर किया। करीब 6 साल तक कोर्ट में लड़ाई लड़ने के बाद मुझे 2011 में रजिस्टर में जिंदा किया गया। ‘लेकिन आज भी जमीन चाचा के नाम ही है। लाखों रुपए कचहरी में फूंक दिए, कुछ नहीं मिला। केवल रजिस्टर में जिंदा की गई।’, यह कहते हुए संजाफी देवी फिर से रोने लगीं। जिंदा साबित करते हुए मर गईं, अब बेटी केस लड़ रही संजाफी से बात करते हुए अब रात हो चुकी है। अगली सुबह मऊ जिले के चांदमारी गांव जाना है, जहां जमीन हड़पने के लिए परिवार के लोगों ने कागज में एक विधवा की फर्जी शादी करा दी, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। अब वह मर चुकी हैं। उनकी बेटी मुकदमा लड़ रही है। अगले दिन सुबह मऊ के चांदमारी गांव पहुंचा। वहां 55 साल के ओम प्रकाश मिले। वह बताते हैं- ‘मेरी सास धीराजी देवी खुद को जिंदा साबित करते-करते 2019 में मर गईं। अब उनकी जगह उनकी बेटी, यानी मेरी पत्नी मुकदमा लड़ रही हैं। 20 साल हो गए मुकदमा लड़ते-लड़ते, लेकिन कुछ नहीं मिला। जो कुछ अपने पास था, वह भी बिक गया। 1974 की बात है। मेरे ससुर शंकर ठाकुर पश्चिम बंगाल के वर्धमान में एक कोल कंपनी में नौकरी करते थे। वहां बिजली गिरने से उनकी मौत हो गई। उनकी जगह पर मेरी सास को नौकरी मिली। 1995 में सास रिटायर होकर गांव आईं। उन्होंने पट्टीदारों से जब जमीन-जायदाद के बारे में पूछा, तो वे कहने लगे- कैसी जमीन? तुम्हारा यहां कुछ नहीं है। उस दिन उनके साथ मार-पीट की गई और भगा दिया गया। उसके बाद वह अपने मायके जाकर रहने लगीं। करीब 10 साल बाद वह दोबारा अपने ससुराल गईं। फिर से अपनी जमीन मांगी। इस बार पट्टीदारों ने उनका हाथ तोड़ दिया। उस दिन वह तहसील पहुंचीं। खतौनी निकलवाई, तो पता चला कि उन्हें कागज में मरा घोषित कर दिया गया है। कागज में लिखा था- पति शंकर की मौत के बाद धीराजी देवी ने दूसरी शादी कर ली, जहां उनकी भी मौत हो चुकी है। उनका कोई वारिस नहीं है। उसके बाद मेरी सास की सास रामदेई देवी ने पूरी संपत्ति दूसरे बेटे रामू ठाकुर के नाम कर दी थी। 2005 में हमने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया। 5 साल से ज्यादा लड़ाई के बाद 2011 में कोर्ट ने माना कि धीराजी देवी जिंदा हैं। रजिस्टर में उन्हें गलती से मरा घोषित कर दिया गया है। लेकिन कोर्ट ने जमीन नहीं दिलवाई। इन 20 सालों में जो जमीन थी वह भी मुकदमा लड़ने में बिक गई, यह बताते हुए ओम प्रकाश रोने लगे। वह रोते हुए घर में गए और मेरे सामने कागजों से भरा एक थैला लाकर पलट दिया। बोले- ‘ये कागज देखिए। मन करता है जहर खा लूं, लेकिन बेटे-पत्नी का मुंह देखकर शांत हो जाता हूं। पानी-पूरी का ठेला लगाकर जो कमाता हूं, उसे मुकदमा लड़ने में खर्च कर रहा हूं। उनके बगल में बैठीं ओम प्रकाश की पत्नी मंशा देवी गुस्से में कहती हैं, ‘जिसके पास पैसा है, उसके पास सब है। कोर्ट, कचहरी, वकील। हम तो बर्बाद हो गए। आखिर कोर्ट को समझना चाहिए कि उसके सामने क्या कोई मुर्दा मुकदमा लड़ने आ रहा? कागज में मेरी मां को 2005 में मृत बताया गया, जबकि उनकी मौत 2019 में हुई। क्या बंगाल में कोल की नौकरी कोई मुर्दा कर रहा था?’ इस तरह बेबस और परेशान चेहरों के बारे में सोचते हुए मैं वापस दिल्ली आ गया। ———————————— 1- ब्लैकबोर्ड-‘तुम ईसाई बन गए, बाप की लाश नाले में बहाओ’:22 दिन तक सड़ती रही लाश, सरपंच बोला- अंतिम संस्कार किया तो बीवी-बच्चों के बारे में सोच लेना 7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बजे थे। पापा की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई थी। देखते ही मां रो-रोकर बेहाल हो गई। शव बरामदे में रखते ही चीख-पुकार मच गई। सभी रिश्तेदार घर पहुंचने लगे। सभी कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब रोते रहेंगे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी के घरवालों ने नंगा करके पीटा, नस काटकर सुसाइड:पत्नी ने कॉलर पकड़कर मांगे 20 लाख तो फांसी लगाई; तंग पतियों की स्याह कहानियां ‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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ब्लैकबोर्ड- भाई का अपहरण किया, जिससे जिंदा साबित हो जाऊं:सिंदूर लगाने वाली पत्नी विधवा पेंशन मांगने पहुंची, लेकिन मुझे जिंदा नहीं माना
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