न पूंजीवाद पर भरोसा, न वामपंथ में रुचि:दुनिया में बढ़ रहा ‘जेन-जी’ समाजवाद; महंगाई के इस दौर में चाहिए तुरंत राहत

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दुनिया भर की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। 2007-09 के वित्तीय संकट के बाद उभरे पर्यावरण और कॉर्पोरेट बोर्ड में हिस्सेदारी की बात करने वाले ‘मिलेनियल समाजवाद’ की जगह अब ‘जेन-जी समाजवाद’ ले रहा है। यह नया समाजवाद किसी बड़ी किताबी विचारधारा या सामूहिक भलाई पर नहीं, बल्कि आम लोगों के सीधे व तात्कालिक स्वार्थ पर टिका है। इसका सीधा नारा है- ‘मेरा किराया कम करो’, ‘बिजली-पानी का बिल घटाओ’, ‘मुफ्त बस सेवा दो’ और ‘मेरी नौकरी बचाओ।’ अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी में यह नई व्यक्तिगत राजनीति तेजी से पैर पसार रही है। जेब खाली, तो बदला मिजाज हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स’ के सर्वे के मुताबिक, 2020-2025 के बीच युवाओं में पूंजीवाद, वामपंथ और समाजवाद दोनों के प्रति आकर्षण तेजी से घटा है। अमेरिका में खुद को ‘बेहद उदारवादी’ मानने वाले लोग 5% से घटकर महज 3.4% रह गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि युवा अब वामपंथी या दक्षिणपंथी ‘इज्म’ (वाद) की जंग से थक चुके हैं। उन्हें सिर्फ ऐसी सरकार चाहिए, जो उनके जीने की लागत को कम कर सके। महामारी के दौरान जहां सिर्फ 20% यूरोपीय नागरिक महंगाई और हाउसिंग को बड़ी समस्या मानते थे, वहीं 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 36% हो चुका है। जेन-जी समाजवाद के 4 एजेंडे मूल्य नियंत्रण और सरकारी राशन – किराया बढ़ाने पर रोक लगे। सरकारी राशन दुकानें खोली जाएं। एआई पर लगाम – टेक दिग्गजों पर पाबंदी हो। एआई से नौकरियों को सुरक्षा की गारंटी। 59% युवा एआई को खतरा मान रहे। मुफ्त सेवाएं – 5 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त डे-केयर और युवाओं के लिए बस-मेट्रो का सफर पूरी तरह मुफ्त हो। अमीरों पर भारी टैक्स- केवल अरबपतियों पर 1 से 2% तक अलग से टैक्स लगे। कॉर्पोरेट लालच और ‘के-शेप्ड’ इकोनॉमी से गुस्सा – यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स की अर्थशास्त्री इसाबेला वेबर के अनुसार, आधुनिक कंपनियां महंगाई की आड़ में मुनाफा बेतहाशा बढ़ा रही हैं। इसे ‘के-शेप्ड इकोनॉमी’ कहा जा रहा है, जिसमें अमीर लगातार अमीर और गरीब और पीछे छूटता जा रहा है। – ‘नेविगेटर’ के सर्वे में 60% से ज्यादा अमेरिकियों ने माना कि महंगाई की मुख्य वजह ‘कॉर्पोरेट लालच’ है। इस वजह से न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी, ब्रिटेन के ग्रीन पार्टी नेता जैक पोलंस्की जैसे युवा नेता लोकलुभावन वादे कर रहे हैं।



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