पितृ मोक्ष अमावस्या पर कंचना घाट में संपन्न हुए पितृपक्ष अनुष्ठान, तर्पण और पिंडदान के साथ श्रद्धालुओं ने की पितरों की आत्मशांति की कामना

निवाड़ी। मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित पांखी के कंचना घाट पर शनिवार को पितृ मोक्ष अमावस्या के अवसर पर पितृपक्ष के अनुष्ठान विधिवत रूप से संपन्न हुए। इस पवित्र अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कंचना घाट पर पहुंचकर अपने पितरों की आत्मशांति के लिए तर्पण, पिंडदान और हवन जैसे महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान किए। पितृपक्ष के सोलह दिनों तक चलने वाले श्राद्ध कर्म का समापन इसी अमावस्या तिथि को होता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या या पितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन को हिंदू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का सबसे प्रमुख दिन माना गया है।
शनिवार को सुबह से ही पांखी के कंचना घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई थी। नदी के तट पर मौजूद घाट पूरी तरह से आस्था और श्रद्धा के रंग में डूबा हुआ दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से स्नान करने के बाद अपने पितरों को जल अर्पित किया। तर्पण की प्रक्रिया में काले तिल, कुश, जौ और शुद्ध जल का उपयोग किया गया। पंडितों और पुरोहितों ने श्रद्धालुओं को वैदिक मंत्रों का उच्चारण कराते हुए तर्पण की विधि पूरी करवाई। मान्यता है कि पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन किया गया तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस दिन कंचना घाट पर दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पहुंचते हैं।
तर्पण के उपरांत श्रद्धालुओं द्वारा पिंडदान का अनुष्ठान संपन्न किया गया। पिंडदान हिंदू धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसमें चावल, आटा, तिल और अन्य सामग्रियों से बनाए गए पिंड को पितरों को समर्पित किया जाता है। कंचना घाट पर मौजूद पुरोहितों ने बताया कि पिंडदान करने से पितरों को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों में तृप्ति मिलती है। जो परिवार नियमित रूप से पिंडदान करते हैं, उनके घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। शनिवार को घाट पर पिंडदान की यह प्रक्रिया पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ संपन्न हुई। कई परिवार अपने बुजुर्गों के साथ आए थे, जबकि कुछ युवा पीढ़ी के लोग भी अपने दादा-परदादा और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इस अनुष्ठान में शामिल हुए।
पितृ मोक्ष अमावस्या के इन अनुष्ठानों का समापन हवन के साथ हुआ। कंचना घाट पर आयोजित हवन में वैदिक मंत्रों का जाप करते हुए आहुतियां दी गईं। हवन की पवित्र अग्नि में घी, लकड़ी और विशेष हवन सामग्री अर्पित की गई। इस दौरान पूरे घाट पर मंत्रोच्चारण की गूंज और हवन की पवित्र धूप से एक अत्यंत आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो गया था। हवन का उद्देश्य पितरों की आत्मा को परम शांति प्रदान करना और परिवार में व्याप्त किसी भी प्रकार के पितृ दोष को दूर करना होता है। पुरोहितों ने बताया कि हवन के माध्यम से देवताओं और पितरों दोनों को प्रसन्न किया जाता है, जिससे परिवार के सदस्यों के जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
पांखी का कंचना घाट निवाड़ी जिले में धार्मिक आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। विशेषकर पितृपक्ष और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन इस घाट का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि कंचना घाट पर किया गया तर्पण और पिंडदान अत्यंत फलदायी होता है। शनिवार को भी इस आस्था को चरितार्थ होते देखा गया, जब सैकड़ों की संख्या में लोगों ने नदी के तट पर खड़े होकर अपनी श्रद्धा अर्पित की।
पितृपक्ष के दौरान सोलह दिनों तक चलने वाले श्राद्ध कर्म का अपना एक विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय पितृपक्ष कहलाता है। इस दौरान हर तिथि को किसी न किसी पूर्वज का श्राद्ध किया जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सटीक तिथि ज्ञात नहीं होती, वे पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन ही सभी पितरों का एक साथ श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर देते हैं। यही वजह है कि अमावस्या के दिन कंचना घाट जैसे तीर्थ स्थलों पर सबसे अधिक भीड़ देखने को मिलती है।
शनिवार को संपन्न हुए इस अनुष्ठान में श्रद्धालुओं ने न केवल अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की, बल्कि अपने परिवारों के उज्ज्वल भविष्य, सुख-शांति और समृद्धि की भी कामना की। हवन के समापन के बाद प्रसाद वितरण किया गया और श्रद्धालुओं ने ब्राह्मणों तथा जरूरतमंदों को भोजन कराया, जिसे पितृपक्ष की परंपरा का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। इस प्रकार पांखी के कंचना घाट पर पितृ मोक्ष अमावस्या का पर्व पूरी श्रद्धा, आस्था और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ।

