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Sat, Oct 10, 2026Updated 4:39 PM IST
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मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण विवाद: उमंग सिंघार ने मोहन यादव सरकार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- पीठ पर छूरा घोंपा

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भोपाल। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर सियासी घमासान तेज हो गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मामले को लेकर मोहन यादव सरकार पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत लागू नहीं होने देना चाहती है। भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उमंग सिंघार ने यह बयान दिया और सरकार की नीयत व नीतियों दोनों पर सवाल खड़े किए।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने अपने संबोधन में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मौजूदा सरकार ने ओबीसी समाज की पीठ पर छूरा घोंपने का काम किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने न्यायालय में ओबीसी जनसंख्या और आरक्षण से जुड़ा सही डेटा पेश नहीं किया। सिंघार का कहना था कि यदि सरकार की वास्तविक मंशा ओबीसी वर्ग को उनका हक दिलाने की होती, तो अदालत में मजबूती के साथ सटीक आंकड़े रखे जाते। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जिसके चलते 27 प्रतिशत आरक्षण का मामला अटक गया है। उन्होंने इसे ओबीसी समाज के साथ सीधा धोखा करार दिया।

इस पूरे विवाद में पटवारियों के संगठन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिसने राजनीतिक बयानबाजी को एक नया आयाम दे दिया है। पटवारियों ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इशारे पर ओबीसी आरक्षण को रोका जा रहा है। पटवारियों का तर्क है कि जमीनी स्तर पर आंकड़ों के संकलन और राजस्व रिकॉर्ड के रखरखाव में उनकी अहम भूमिका होती है, लेकिन आरक्षण के मामले में राजनीतिक दबाव और वैचारिक निर्देशों के कारण सही स्थिति सामने नहीं आ पा रही है। पटवारियों द्वारा आरएसएस का नाम लिए जाने से यह मामला केवल प्रशासनिक चूक तक सीमित न रहकर एक बड़े वैचारिक और राजनीतिक विवाद में बदलता दिख रहा है।

उमंग सिंघार ने आगे कहा कि ओबीसी वर्ग मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या में एक बहुत बड़ा हिस्सा रखता है। ऐसे में उन्हें मात्र 14 प्रतिशत आरक्षण पर टिके रहने के लिए मजबूर करना किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि सरकार के पास सभी जरूरी आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन वे इन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने से बच रहे हैं ताकि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू न हो सके। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है जिसके तहत पिछड़े वर्गों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

भोपाल में दिए गए इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में उबाल आना तय माना जा रहा है। ओबीसी आरक्षण का मुद्दा मध्य प्रदेश में हमेशा से ही अत्यंत संवेदनशील रहा है। चुनावी राजनीति में ओबीसी मतदाताओं का वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है, इसलिए सभी राजनीतिक दल इस वर्ग को साधने की हरसंभव कोशिश करते रहते हैं। कांग्रेस नेता उमंग सिंघार के इस आक्रामक रुख को विपक्ष द्वारा आगामी राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। विपक्ष का मानना है कि सरकार की इस कथित विफलता को जनता के बीच ले जाकर ओबीसी समाज में व्याप्त असंतोष को मुखर किया जाएगा।

दूसरी ओर, सरकार की तरफ से अभी तक उमंग सिंघार के इन विशिष्ट आरोपों पर कोई औपचारिक और विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, सत्ता पक्ष के नेता समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि वे ओबीसी आरक्षण के पक्ष में हैं और न्यायालयीन प्रक्रियाओं के तहत ही आरक्षण का लाभ समाज तक पहुंचाया जा सकता है। सरकार का पक्ष रहा है कि आरक्षण का मामला पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करता है, जिसमें राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा कानूनी लड़ाई महत्वपूर्ण है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की मांग काफी लंबे समय से उठती रही है। विभिन्न ओबीसी संगठनों और समाज के लोगों ने कई बार इसके लिए आंदोलन और प्रदर्शन भी किए हैं। पूर्व में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा है। अब जब नेता प्रतिपक्ष ने सीधे तौर पर सरकार पर न्यायालय में सही डेटा न देने और पीठ पर छूरा घोंपने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, तो यह मामला और अधिक सुर्खियों में आ गया है।

पटवारियों द्वारा आरएसएस का नाम जोड़े जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन या सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है। ओबीसी आरक्षण का यह मुद्दा आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को किस दिशा में ले जाता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। फिलहाल, विपक्ष ने इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाने का संकेत दे दिया है, जिससे विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह बहस तेज होने की पूरी संभावना है।