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Sat, Oct 10, 2026Updated 5:25 PM IST
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ओबीसी महासभा ने 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का किया ऐलान, जनगणना में अलग कॉलम और सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी

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अशोकनगर। मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में शनिवार को ओबीसी महासभा की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस प्रेस वार्ता के दौरान महासभा के पदाधिकारियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को अब राष्ट्रीय स्तर पर जोरदार तरीके से उठाने का औपचारिक ऐलान किया है। महासभा ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर वे प्रदेश स्तर से लेकर केंद्र सरकार तक निरंतर आंदोलन करेंगे और यदि जरूरत पड़ी तो न्यायिक लड़ाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाएंगे।

ओबीसी महासभा की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे समय में आयोजित की गई है, जब हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अपना फैसला सुनाया है। जबलपुर उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ओबीसी वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के इसी फैसले के बाद ओबीसी महासभा ने अपनी रणनीति को और अधिक आक्रामक बनाते हुए यह निर्णय लिया है कि अब इस मांग को केवल राज्य तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे पूरे देश में एक बड़े जनआंदोलन का रूप दिया जाएगा। महासभा का मानना है कि 14 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी वर्ग की वास्तविक जनसंख्या और उनके अधिकारों के अनुरूप नहीं है, इसलिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू होना अत्यंत आवश्यक है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ओबीसी महासभा के पदाधिकारियों ने बताया कि जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा 14 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखे जाने के बाद संगठन ने विस्तृत चर्चा की है। इस चर्चा के बाद यह सर्वसम्मत निर्णय लिया गया है कि ओबीसी समाज के हितों की रक्षा और उन्हें उनका वाजिब हिस्सा दिलाने के लिए आंदोलन की राह पकड़ी जाएगी। महासभा ने साफ तौर पर कहा है कि उनका यह आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण होगा, लेकिन अपनी मांगों को लेकर वे किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं हैं। प्रदेश की राजधानी से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक ओबीसी समाज की आवाज बुलंद की जाएगी ताकि केंद्र सरकार इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान ले सके।

27 प्रतिशत आरक्षण की मांग के साथ-साथ ओबीसी महासभा ने देश में होने वाली जनगणना को लेकर भी एक बड़ी और ठोस मांग रखी है। महासभा ने सरकार से मांग की है कि आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़ों को दर्ज करने के लिए एक अलग से कॉलम जोड़ा जाना चाहिए। महासभा के नेताओं का तर्क है कि जब तक जनगणना में ओबीसी वर्ग की सही और प्रमाणिक जनसंख्या का आंकड़ा सामने नहीं आएगा, तब तक आरक्षण के प्रतिशत को तार्किक रूप से निर्धारित करना संभव नहीं होगा। जनगणना में अलग कॉलम जोड़े जाने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि देश और प्रदेश में ओबीसी वर्ग की वास्तविक आबादी कितनी है, जिसके आधार पर 27 प्रतिशत या उससे अधिक आरक्षण की मांग को और भी मजबूती से न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर रखा जा सकेगा।

महासभा ने आगे की कानूनी रणनीति के बारे में जानकारी देते हुए स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को सरकार और प्रशासन द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने का विकल्प संगठन के पास खुला है और जरूरत पड़ने पर इस कानूनी विकल्प का पूरा उपयोग किया जाएगा। महासभा का कहना है कि ओबीसी समाज को संविधान में दिए गए अधिकारों से वंचित नहीं रहने दिया जाएगा और इसके लिए हर संभव कदम उठाया जाएगा।

अशोकनगर में आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ओबीसी समाज के संगठनों द्वारा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महासभा के पदाधिकारियों ने समाज के सभी लोगों से अपील की है कि वे इस आंदोलन में एकजुटता के साथ शामिल हों। उन्होंने कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण और जनगणना में जातिगत कॉलम की मांग केवल किसी एक गुट की नहीं, बल्कि पूरे ओबीसी समाज के भविष्य और उसके सर्वांगीण विकास से जुड़ा हुआ मामला है। महासभा ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर जिला स्तर पर भी बैठकों और जागरूकता अभियानों का आयोजन किया जाएगा, ताकि आम लोगों को उनके अधिकारों और संगठन की रणनीति की पूरी जानकारी मिल सके।

गौरतलब है कि ओबीसी आरक्षण का मुद्दा मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में हमेशा से ही राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र रहा है। जबलपुर हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इस बहस को एक बार फिर से तेज कर दिया है। ओबीसी महासभा द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन करने और सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा से यह स्पष्ट हो गया है कि 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को लेकर समाज अब और अधिक मुखर हो चुका है। वंदे भारत न्यूज़ की यह रिपोर्ट अशोकनगर में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस और महासभा द्वारा जारी किए गए आधिकारिक बयानों पर आधारित है। संगठन ने अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन और कानूनी दोनों रास्तों को खुला रखने का निर्णय लिया है।