पश्चिम चंपारण: मझौलिया थाने में हिरासत के दौरान युवक की पिटाई का आरोप, पीड़ित कोमा में; पिता ने एसपी से लगाई निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की गुहार

बेतिया/पश्चिम चंपारण। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के मझौलिया थाना क्षेत्र से पुलिस हिरासत में कथित प्रताड़ना और पिटाई का एक गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना में एक युवक के कोमा में चले जाने की बात कही जा रही है। पीड़ित युवक का इलाज फिलहाल सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (जीएमसीएच), बेतिया में चल रहा है। युवक के पिता ने थाने की पुलिस पर बेटे को बुरी तरह पीटने का सीधा आरोप लगाते हुए पुलिस अधीक्षक (एसपी) से निष्पक्ष जांच कराने और परिवार को सुरक्षा प्रदान करने की गुहार लगाई है। वहीं, दूसरी ओर पुलिस ने इन गंभीर आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया है कि युवक को हिरासत में लेने के बाद उसे मेडिकली फिट पाया गया था। यह पूरा मामला अब जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और मानवाधिकार संगठनों तथा आम जनता के बीच पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
मझौलिया थाने में हिरासत के दौरान हुई कथित पिटाई के शिकार युवक की पहचान इंद्रजीत कुमार के रूप में हुई है। इंद्रजीत कुमार के पिता झापस राम ने मीडिया और पुलिस प्रशासन के समक्ष अपने बयान में आरोप लगाया है कि उनके बेटे को मझौलिया थाने की पुलिस ने हिरासत में लिया था और वहां उसके साथ मारपीट की गई। झापस राम का कहना है कि पुलिस ने उनके बेटे को इतनी बुरी तरह से पीटा कि वह गंभीर रूप से घायल हो गया और उसकी हालत बिगड़ती चली गई। पिता के मुताबिक, इस कथित प्रताड़ना के बाद उनका बेटा इंद्रजीत कुमार कोमा में चला गया है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांग रहे हैं। झापस राम ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उनके बेटे की वर्तमान गंभीर स्थिति के लिए पूरी तरह से मझौलिया थाने की पुलिस जिम्मेदार है, जिसने हिरासत के दौरान कानून को अपने हाथ में लेते हुए युवक पर अत्याचार किया।
इंद्रजीत कुमार को गंभीर और नाजुक अवस्था में इलाज के लिए जीएमसीएच, बेतिया में भर्ती कराया गया है। अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, युवक की हालत चिंताजनक बनी हुई है और डॉक्टरों की टीम उसका इलाज कर रही है। परिजनों का आरोप है कि जब तक युवक पुलिस हिरासत में था, तब तक उसे किसी प्रकार की चोट नहीं थी, लेकिन हिरासत से बाहर आने या अस्पताल पहुंचने तक उसकी स्थिति कोमा जैसी हो चुकी थी। यही कारण है कि परिजनों का शक सीधे तौर पर थाने में हुई पूछताछ और पिटाई की तरफ जा रहा है। अस्पताल में भर्ती युवक के शरीर पर चोट के निशान हैं या नहीं, इसे लेकर अभी तक कोई स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है, लेकिन परिजनों के आरोपों ने मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है।
इस पूरे मामले में पीड़ित युवक के पिता झापस राम ने पश्चिम चंपारण के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से सीधे हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने एसपी से दो मुख्य मांगें रखी हैं। पहली मांग यह है कि मझौलिया थाने की पुलिस के खिलाफ निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सके। झापस राम ने आशंका जताई है कि अगर जांच स्थानीय स्तर पर या संबंधित थाने के दायरे में हुई, तो सच्चाई को दबाया जा सकता है। उनकी दूसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण मांग यह है कि उनके परिवार को पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा प्रदान की जाए। परिजनों को डर है कि थाने की पुलिस के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें और उनके परिवार को नुकसान पहुंचाया जा सकता है या उन्हें झूठे मामलों में फंसाकर डराया-धमकाया जा सकता है। ऐसे में परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
उधर, मझौलिया थाने की पुलिस ने परिजनों द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इंद्रजीत कुमार को हिरासत में लिया गया था, लेकिन उसके साथ किसी भी प्रकार की मारपीट या प्रताड़ना नहीं की गई है। पुलिस ने अपना पक्ष रखते हुए दावा किया है कि हिरासत के दौरान युवक की मेडिकल जांच कराई गई थी, जिसमें उसे पूरी तरह से ‘मेडिकल फिट’ पाया गया था। पुलिस के इस बयान और परिजनों के गंभीर आरोपों के बीच भारी अंतर है, जिससे मामले की सच्चाई जानने के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। पुलिस का कहना है कि वे कानून के दायरे में रहकर काम कर रहे हैं और उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं।
पश्चिम चंपारण जिले में पुलिस हिरासत में प्रताड़ना का यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि बिहार में समय-समय पर थानों में हिरासत के दौरान मारपीट की घटनाएं सामने आती रही हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस हिरासत में किसी भी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार कानून का खुला उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, हिरासत में लिए गए हर व्यक्ति की नियमित मेडिकल जांच होनी चाहिए और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की होती है। यदि इंद्रजीत कुमार वास्तव में हिरासत के दौरान कोमा में गया है, तो यह पुलिस प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती और कानूनी परीक्षा का विषय है।
फिलहाल, पूरा मामला पुलिस अधीक्षक के संज्ञान में आने और उनके अगले कदम पर टिका हुआ है। देखना यह होगा कि क्या एसपी इस मामले में किसी वरिष्ठ अधिकारी या विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराते हैं या नहीं। जीएमसीएच बेतिया में भर्ती इंद्रजीत कुमार की स्वास्थ्य स्थिति पर भी सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। परिजन न्याय की आस में हैं, जबकि पुलिस अपने बचाव में मेडिकल फिट होने का हवाला दे रही है। वंदे भारत न्यूज इस मामले की हर अपडेट पर नजर बनाए हुए है और जैसे ही पुलिस प्रशासन या अस्पताल की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने आएगी, उसे प्रकाशित किया जाएगा।

