खरगोन: पावागढ़ से माता की ज्योत लेकर लौट रहे श्रद्धालुओं के साथ 300 किमी पैदल चला काला श्वान, 8 दिन तक नहीं छोड़ा साथ, भैरव बाबा का रूप मानकर की पूजा

खरगोन। वंदे भारत न्यूज डेस्क। मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में एक अद्भुत और आस्था से जुड़ी घटना सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच गहरी चर्चा का विषय बन गई है। गुजरात के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पावागढ़ से माता की ज्योत लेकर लौट रहे श्रद्धालुओं के जत्थे के साथ एक काला श्वान भी चल पड़ा। इस श्वान ने करीब 300 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी की और लगातार आठ दिनों तक श्रद्धालुओं के साथ रहा। रास्ते भर उसने उनका साथ नहीं छोड़ा, जिसके बाद श्रद्धालुओं ने इस काले श्वान को भैरव बाबा का रूप मान लिया और उसके प्रति गहरी आस्था व्यक्त की।
पावागढ़ से शुरू हुई यात्रा और श्वान का आना
गुजरात के पावागढ़ धाम से माता की ज्योत लेकर श्रद्धालुओं का एक जत्था अपनी निर्धारित यात्रा पर निकला था। यह जत्था पैदल मार्ग से होते हुए मध्य प्रदेश के खरगोन की ओर लौट रहा था। श्रद्धालुओं के अनुसार, जब वे पावागढ़ से ज्योत लेकर रवाना हुए, तभी एक काले रंग का श्वान उनके जत्थे के साथ हो लिया। शुरुआत में श्रद्धालुओं ने इसे सामान्य बात समझा, क्योंकि रास्तों में अक्सर आवारा कुत्ते कुछ दूर तक साथ चलते हैं और फिर वापस लौट जाते हैं। लेकिन इस काले श्वान का व्यवहार बिल्कुल अलग था। वह जत्थे के साथ बना रहा और उसने आगे के सफर में भी अपना साथ नहीं छोड़ा।
300 किलोमीटर और 8 दिन का कठिन सफर
श्रद्धालुओं की यह पैदल यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। पावागढ़ से खरगोन तक का यह सफर लगभग 300 किलोमीटर लंबा था। इस दौरान जत्थे को कई गांवों, कस्बों, सड़कों और कच्चे रास्तों से होकर गुजरना पड़ा। आठ दिनों तक चली इस लंबी और थका देने वाली यात्रा में काला श्वान हर कदम पर श्रद्धालुओं के साथ रहा। उसने न तो रास्ता भटका और न ही किसी अन्य जानवर या व्यक्ति की ओर आकर्षित हुआ। वह सीधे जत्थे के साथ चलता रहा। श्रद्धालुओं ने बताया कि यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते थे, तब भी यह श्वान उनके पास ही बैठ जाता था। जब जत्था आगे बढ़ता, तो वह भी उनके साथ चल देता था। इतनी लंबी दूरी तक बिना किसी प्रशिक्षण या पालतू संबंध के किसी श्वान का इस तरह साथ निभाना श्रद्धालुओं के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।
श्रद्धालुओं ने माना भैरव बाबा का रूप
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में काले श्वान का विशेष महत्व होता है। काले श्वान को भगवान काल भैरव का वाहन और उनका रूप माना जाता है। खासकर माता की यात्राओं और ज्योत ले जाने की परंपरा में भैरव बाबा को रक्षक के रूप में पूजा जाता है। जब इस काले श्वान ने 300 किलोमीटर की यात्रा में आठ दिनों तक जत्थे का साथ नहीं छोड़ा, तो श्रद्धालुओं की आस्था और गहरी हो गई। उन्होंने इस घटना को साधारण नहीं माना और इस काले श्वान को साक्षात भैरव बाबा का रूप मान लिया। श्रद्धालुओं का मानना था कि माता की ज्योत की सुरक्षा और जत्थे की रक्षा के लिए स्वयं भैरव बाबा ने श्वान का रूप धारण किया था और पूरी यात्रा में उनकी रक्षा करते रहे।
यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने इस काले श्वान का पूरा ध्यान रखा। उसे भोजन और पानी दिया गया, हालांकि श्रद्धालुओं के मुताबिक श्वान ने अपनी मर्जी से ही यात्रा की और किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होने दी। जत्थे में शामिल लोगों ने बताया कि श्वान के साथ रहने से उन्हें यात्रा के दौरान एक अलग प्रकार का मानसिक सुकून और सुरक्षा का अनुभव हो रहा था।
खरगोन पहुंचने पर आस्था का संगम
आठ दिनों की लंबी पैदल यात्रा पूरी करने के बाद जब श्रद्धालुओं का जत्था माता की ज्योत लेकर खरगोन पहुंचा, तो इस काले श्वान की कहानी ने पूरे क्षेत्र में लोगों का ध्यान खींच लिया। स्थानीय लोग भी इस बात को लेकर हैरान और आश्चर्यचकित थे कि एक श्वान ने बिना किसी पूर्व परिचय के इतनी लंबी दूरी तय की और लगातार जत्थे के साथ बना रहा। खरगोन में इस घटना की चर्चा तेजी से फैली और लोगों ने इसे माता की कृपा और भैरव बाबा की उपस्थिति के रूप में स्वीकार किया।
धार्मिक मान्यताओं और आस्था का प्रतीक
भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां जानवरों को देवी-देवताओं का रूप या उनका वाहन मानकर पूजा जाता है। पावागढ़ माता का धाम गुजरात के सबसे प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है, जहां देश भर से श्रद्धालु दर्शन और ज्योत लेने आते हैं। खरगोन के श्रद्धालुओं द्वारा लाई गई ज्योत के साथ इस काले श्वान की 300 किलोमीटर की यात्रा ने स्थानीय आस्था को और अधिक मजबूती दी है। श्रद्धालुओं ने इस पूरी घटना को अपने जीवन का एक अत्यंत पुण्य और दुर्लभ अनुभव बताया है।
इस पूरे मामले में यह बात स्पष्ट है कि श्वान का साथ निभाना श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। हालांकि, यह पूरी घटना श्रद्धालुओं की व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक विश्वास से जुड़ी है। खरगोन में माता की ज्योत के साथ 300 किलोमीटर पैदल चले इस काले श्वान की कहानी अब स्थानीय लोगों और भक्तों के बीच आस्था और श्रद्धा का एक जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

