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Mon, Oct 12, 2026Updated 7:22 PM IST
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रायपुर सिनेमा हॉल आत्महत्या मामला: सुसाइड नोट और परिजनों की गवाही से साबित हुई प्रताड़ना, हाईकोर्ट ने 5 साल की सजा बरकरार रखी

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वन्दे भारत न्यूज़, रायपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में एक महिला द्वारा की गई आत्महत्या के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने इस मामले में दोषी करार दिए गए आरोपी की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई पांच साल की सजा को यथावत बरकरार रखा है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने दोषी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का स्पष्ट आदेश दिया है, ताकि वह अपनी शेष सजा भुगत सके। यह मामला लगातार प्रताड़ना और उसके कारण महिला द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम से जुड़ा हुआ था, जिसमें सुसाइड नोट और परिजनों की गवाही ने निर्णायक भूमिका निभाई।

पूरा मामला राजधानी रायपुर के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र 36 सिटी मॉल से जुड़ा है। इस मॉल में स्थित एक सिनेमा हॉल में एक महिला ने आत्महत्या कर ली थी। इस घटना ने उस समय पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी। महिला की मौत के बाद जब पुलिस ने जांच शुरू की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच के दौरान यह बात स्पष्ट हुई कि महिला किसी न किसी रूप में लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार हो रही थी। इसी प्रताड़ना से तंग आकर महिला ने सिनेमा हॉल जैसे सार्वजनिक स्थान पर अपनी जीवनलीला समाप्त करने का कठोर कदम उठाया था। पुलिस ने मामले की गहनता से जांच करते हुए प्राथमिकी दर्ज की और आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने सहित अन्य सुसंगत धाराओं में मामला दर्ज कर विवेचना पूरी की।

इस मामले की सुनवाई के दौरान सबसे अहम साक्ष्य के रूप में मृतका द्वारा छोड़ा गया सुसाइड नोट सामने आया। सुसाइड नोट में महिला ने अपनी तकलीफों और उसे मिल रही प्रताड़ना का विस्तृत जिक्र किया था। इस दस्तावेजी साक्ष्य ने अभियोजन पक्ष के दावों को बेहद मजबूत बनाया। इसके अलावा, मृतका के परिजनों ने भी अदालत में गवाही दी। परिजनों ने अपने बयानों में पुष्टि की कि आरोपी द्वारा महिला को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। सुसाइड नोट और परिजनों की सुसंगत गवाही को मिलाकर देखने पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं, जिसके चलते पीड़िता को आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ा।

ट्रायल कोर्ट ने सभी साक्ष्यों, गवाहियों और दलीलों को सुनने के बाद आरोपी को दोषी करार दिया था। निचली अदालत ने सुसाइड नोट और परिजनों की गवाही को आधार मानते हुए आरोपी को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर दोषी ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का रुख किया और सजा के खिलाफ अपील दायर की। आरोपी की ओर से उच्च न्यायालय में यह दलील दी गई कि उसे इस मामले में फंसाया गया है और निचली अदालत का फैसला तथ्यों के विपरीत है।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने के बाद अपीलकर्ता की किसी भी दलील को स्वीकार नहीं किया। उच्च न्यायालय ने माना कि सुसाइड नोट एक ठोस दस्तावेजी साक्ष्य है जो सीधे तौर पर प्रताड़ना की ओर इशारा करता है। इसके साथ ही परिजनों की गवाही ने इस बात पर मुहर लगा दी कि आरोपी का व्यवहार लगातार प्रताड़नापूर्ण था। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और सजा सुनाने में कोई त्रुटि नहीं की है। इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई पांच साल की सजा को पूरी तरह से बरकरार रखने का आदेश पारित किया और आरोपी की अपील को खारिज कर दिया।

अपील खारिज होने के साथ ही उच्च न्यायालय ने दोषी को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि वह चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरेंडर करने के बाद दोषी को अपनी शेष सजा भुगतनी होगी। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर दोषी सरेंडर नहीं करता है, तो कानून के अनुसार उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी। उच्च न्यायालय का यह आदेश उन सभी लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो किसी व्यक्ति को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं और उन्हें आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने के लिए मजबूर करते हैं।

भारतीय न्यायिक प्रणाली में आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में सुसाइड नोट को बहुत महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। जब सुसाइड नोट के साथ परिजनों की गवाही भी मिल जाती है, तो यह अभियोजन पक्ष के मामले को और अधिक मजबूत कर देता है। रायपुर के इस मामले में भी दोनों साक्ष्यों ने मिलकर यह साबित कर दिया कि आरोपी की हरकतों के कारण ही महिला की जान गई। 36 सिटी मॉल जैसे व्यस्त स्थान पर हुई इस घटना ने उस समय समाज को झकझोर कर रख दिया था। अब उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद और बढ़ गई है। वन्दे भारत न्यूज़ की यह रिपोर्ट उच्च न्यायालय के आदेश और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है।