बिहार के सांख्यिकी स्वयंसेवकों के लिए जगी उम्मीद: 12-13 साल पुराने रिकॉर्ड जुटा रहा विभाग, प्रशिक्षण और भुगतान का मांगा ब्योरा

सहरसा (बिहार)। वंदे भारत न्यूज़। बिहार में पिछले कई वर्षों से अपनी नियुक्ति, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक भुगतान को लेकर इंतजार कर रहे सांख्यिकी स्वयंसेवकों के लिए एक बार फिर उम्मीद की किरण जागती दिख रही है। राज्य सरकार के अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय ने अब इन स्वयंसेवकों से जुड़े पुराने आंकड़ों और रिकॉर्ड को खंगालना शुरू कर दिया है। इसके तहत सहरसा सहित पूरे बिहार में लगभग 12 से 13 साल पुराने रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। इस पहल से उन हजारों स्वयंसेवकों में उत्साह का माहौल है, जिन्होंने वर्षों पहले विभाग के लिए सर्वेक्षण और आंकड़ा संग्रहण का कार्य किया था, लेकिन उन्हें उचित मान्यता या भुगतान नहीं मिल सका था।
अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार, राज्यभर के सभी जिला सांख्यिकी अधिकारियों से सांख्यिकी स्वयंसेवकों के कार्यों, उनके द्वारा प्राप्त किए गए प्रशिक्षण और उन्हें दिए गए भुगतान का विस्तृत ब्योरा मांगा गया है। निदेशालय ने यह स्पष्ट किया है कि यह जानकारी किसी भी हालत में अधूरी नहीं होनी चाहिए। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने जिलों में कार्यरत रहे सभी स्वयंसेवकों की पूरी सूची तैयार करें और उसमें हर जरूरी दस्तावेज संलग्न कर रिपोर्ट समय पर मुख्यालय को उपलब्ध कराएं।
निदेशालय ने जिला सांख्यिकी अधिकारियों को जो दिशा-निर्देश दिए हैं, उनमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है। सबसे पहले, अधिकारियों को सभी स्वयंसेवकों के नाम और उनके वर्तमान पते की सटीक जानकारी देनी होगी। इसके साथ ही, जब इन स्वयंसेवकों का चयन हुआ था, तब उनकी मेधा सूची में क्या क्रमांक था, इसकी भी पुष्टि करनी होगी। मेधा क्रमांक की यह जानकारी इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि भविष्य में यदि कोई नीतिगत फैसला लिया जाता है, तो वरीयता तय करने में इसका सीधा उपयोग हो सकता है।
इसके अलावा, स्वयंसेवकों को विभाग की ओर से कब, कहां और कितने दिनों का प्रशिक्षण दिया गया था, इसका पूरा लेखा-जोखा भी मांगा गया है। सांख्यिकी के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवकों के लिए प्रशिक्षण एक अनिवार्य हिस्सा होता है, ताकि वे सरकारी सर्वेक्षणों और आंकड़ा संग्रहण की सही विधि को समझ सकें। निदेशालय ने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि प्रशिक्षण अवधि की जानकारी में कोई विसंगति न रहे।
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा ध्यान पंचायतवार किए गए कार्यों के विवरण पर देने को कहा गया है। यानी किस स्वयंसेवक ने किस पंचायत में जाकर आंकड़ा संग्रहण का काम किया, कितने घरों या प्रतिष्ठानों का सर्वेक्षण किया और उसका वास्तविक स्तर क्या था, इन सभी बातों का जिक्र रिपोर्ट में होना अनिवार्य है। पंचायत स्तर पर किए गए इस कार्य का सत्यापन ही भविष्य में स्वयंसेवकों के दावों को सही ठहराने का मुख्य आधार बनेगा।
स्वयंसेवकों के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा उनके पारिश्रमिक का रहा है। कई मामलों में यह शिकायत सामने आती रही है कि काम करने के बावजूद उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिला। इसी समस्या को देखते हुए अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय ने जिला सांख्यिकी अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया है कि वे पारिश्रमिक भुगतान के ठोस सबूत भी अपनी रिपोर्ट में शामिल करें। यदि किसी स्वयंसेवक को उसके काम के बदले राशि दी गई थी, तो उसका बैंक स्टेटमेंट, रसीद या कोई अन्य वैध दस्तावेज पेश करना होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन स्वयंसेवकों को भुगतान हो चुका है और किनका भुगतान अभी लंबित है।
सहरसा जिले में भी इस डेटा संग्रहण और सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जिला सांख्यिकी कार्यालय के अधिकारी पुराने अभिलेखों को खंगालने और स्वयंसेवकों की सूची को अपडेट करने में जुटे हुए हैं। सहरसा के अलावा बिहार के अन्य सभी जिलों में भी यह अभियान एक साथ चलाया जा रहा है, ताकि राज्य स्तर पर एक एकीकृत और सटीक डेटाबेस तैयार किया जा सके।
बता दें कि बिहार में सांख्यिकी स्वयंसेवकों का मामला काफी पुराना है। लगभग 12 से 13 साल पहले इन स्वयंसेवकों की नियुक्ति विभिन्न सरकारी सर्वेक्षणों, जनगणना संबंधी कार्यों और आर्थिक आंकड़ों के संग्रहण के लिए की गई थी। उस दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में युवाओं ने इस काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। हालांकि, काम पूरा होने के बाद इन स्वयंसेवकों के नियमितीकरण, मानदेय और भविष्य की रूपरेखा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई थी। इसके बाद से ये स्वयंसेवक लगातार अपनी मांगों को लेकर विभाग और सरकार के सामने गुहार लगाते रहे हैं।
अब अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय द्वारा 12-13 साल पुराने रिकॉर्ड जुटाने की इस कवायद को जानकारों और स्वयंसेवकों द्वारा एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। विभाग द्वारा इतने विस्तृत ब्योरे की मांग किए जाने से यह संकेत मिलता है कि सरकार इन स्वयंसेवकों के लंबित मामलों का कोई स्थायी समाधान निकालने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि, अभी तक विभाग की ओर से इस बात की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है कि इन रिकॉर्ड के सत्यापन के बाद स्वयंसेवकों के लिए ठोस नीति क्या होगी।
फिलहाल, सभी जिला सांख्यिकी अधिकारियों को निर्धारित समय सीमा के भीतर यह विस्तृत रिपोर्ट निदेशालय को सौंपनी है। जैसे-जैसे सहरसा सहित पूरे बिहार से यह आंकड़े मुख्यालय पहुंचेंगे, उसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। सांख्यिकी स्वयंसेवकों को उम्मीद है कि इस बार उनका पुराना रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता बनकर नहीं रह जाएगी, बल्कि इससे उन्हें उनके द्वारा किए गए श्रम का उचित सम्मान और लाभ मिल सकेगा। वंदे भारत न्यूज़ इस मामले में आगे आने वाले अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए है।

