डब्ल्यूएचओ (WHO) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में करीब 25% डॉक्टर 55 वर्ष या उससे अधिक उम्र के हैं। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य क्षेत्र के कर्मियों की बढ़ती संख्या के बावजूद देशों के बीच भारी असमानता और कार्यबल के बूढ़े होने को एक प्रमुख चुनौती के रूप में स्पष्ट किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भले ही स्वास्थ्य सेवाओं में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी कई देशों के लिए डॉक्टरों और नर्सों की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है।
भारत वाले समूह के संदर्भ में, जिसमें 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी के बारे में विचार किया गया है, 2024 से 2030 के बीच इस आबादी की संख्या में 26% की वृद्धि की भविष्यवाणी की गई है। इसके साथ ही, स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ेगी। रिपोर्ट में इन चार मुख्य बिंदुओं को रेखांकृत किया गया है।
पहला सकारात्मक पहलू यह है कि पिछले 20 सालों में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में 52% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2006 में प्रति 10 हजार आबादी पर 44.8 स्वास्थ्यकर्मी थे, जो 2025 में 67.9 हो गए। यह एक महत्वपूर्ण सुधार है, लेकिन इसे देखते हुए भी कि आबादी की वृद्धि और स्वास्थ्य संकटों की प्रवृत्ति बढ़ रही है, इस वृद्धि को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
दूसरा चुनौती यह है कि 2030 तक करीब 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का अनुमान है। इसमें डॉक्टरों और नर्सों दोनों की कमी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, 67 देशों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी एक गंभीर समस्या है। इन देशों में से कई ऐसे देश हैं जहां सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं अपनाने में असमर्थ हैं और नागरिकों को निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर मजबूर करना पड़ता है।
डॉक्टरों की कमी का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। विशेषकर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के कारण लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। निजी अस्पतालों की भारी-भरकम फीस आम आदमी की जेब पर सीधा और बड़ा आर्थिक बोझ डालती है। इसके अलावा, अस्पतालों में भीड़ की वजह से मरीजों को इलाज के लिए घंटों या कई दिनों तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
डॉक्टरों पर काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि वे हर मरीज को पर्याप्त समय और आवश्यक देखभाल नहीं दे पाते। इससे इलाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है और मरीजों के लिए सुरक्षा कमजोर होती है। गांवों और देहाती इलाकों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। इस वजह से ग्रामीण आबादी को मामूली और बुनियादी इलाज के लिए भी मीलों दूर शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
भारत में विशेष रूप से, 55 वर्ष और उससे अधिक उम्र के डॉक्टर्स केवल 12% हैं। यह दर्शाता है कि भारत जैसे विकासशील देशों में डॉक्टरों की औसत उम्र अपेक्षाकृत कम है, लेकिन भले ही डॉक्टरों की संख्या बढ़ रही है, उनके वितरण और उपलब्धता में गंभीर असमानता है। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी और शहरी क्षेत्रों में उनके अधिशेष के बीच का अंतर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवता और पहुंच को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
WHO की रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया जाता है, तो भविष्य में स्वास्थ्य संकट और भी गंभीर हो सकता है। विशेषकर उन देशों के लिए जहां सरकारी स्वास्थ्य निधि सीमित है और नागरिकों को निजी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना मुश्किल है, इन समस्याओं का सीधा प्रभाव पड़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए देशों को न केवल स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती बढ़ानी चाहिए, बल्कि उनके कार्य स्थलों के बंटरण, उनके प्रशिक्षण और रिटायरमेंट की नीतियों को भी सुधारना चाहिए। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि डॉक्टरों की रिटायरमेंट की दर बढ़ने से पहले ही उनके कार्यकाल के दौरान ही उनके प्रतिस्थापन की योजना बनानी जानी चाहिए। इससे स्वास्थ्य सेवाओं के विकृतियों को दूर किया जा सकता है और नागरिकों को बेहतर और समय से पहले इलाज प्राप्त कर सकते हैं।
भारत में डॉक्टरों की कमी के मुद्दे पहले से ही एक बड़ा मुद्दा रहा है। विशेषकर केरल जैएसएम में डॉक्टरों की सैलरी ₹20 हजार और सफाईकर्मियों की सैलरी उतनी ही होने की घटना सामने आई थी। इसके बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने चेतावनी दी थी कि 66% डॉक्टरों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी हो रही है। इस प्रकार की स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक गंभीर चुनौती है और इसे देखते हुए कि भारत दुनिया के सबसे बड़े डॉक्टर उत्पादक देशों में से एक है, इसके लिए एक स्पष्ट रणनीति की आवश्यकता है।
WHO की रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को दूर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य नीतियों के सुधार आवश्यक हैं। इसके साथ ही, स्वास्थ्य शिक्षा और प्रशिक्षण के अवसरों के विस्तार से भरोसेमंद और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की दिशा में बढ़ते हुए एक मजबूत आधार रखा जा सकता है।


















