ईरान की सरकारी शिपिंग कंपनी के दो जहाज चीन के गाओलान पोर्ट से रवाना हुए हैं। भीषण जंग के बीच ईरान की तरफ बढ़ते जहाजों से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक इन पर ऐसा मिलिट्री केमिकल लदा हो सकता है, जो रॉकेट बनाने में इस्तेमाल होगा। अगर ऐसा हुआ तो ईरानी हमले जारी रह सकते हैं और जंग लंबी खींच सकती है।
क्या वाकई इन जहाजों में रॉकेट बनाने का सामान, ईरान की मदद क्यों कर रहे जिनपिंग और क्या अमेरिका इन कंटेनर्स को रास्ते में ही उड़ा सकता है; भास्कर एक्सप्लेनर में 5 जरूरी सवालों के जवाब…
सवाल-1: चीन से रवाना हुए ईरानी जहाजों में क्या लदा है?
जवाब: ईरान की सरकारी कंपनी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान शिपिंग लाइन्स यानी IRISL के 2 जहाज- शब्दीस और बर्जिन चीन के गाओलान पोर्ट से रवाना हुए हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से इसकी पुष्टि हुई…
- गाओलान पोर्ट चीन के दक्षिण-पूर्वी तट के झूहाई शहर में मौजूद है। ये केमिकल लोडिंग पोर्ट है, जहां से हथियार और मिसाइल वैगरह बनाने के केमिकल भी लोड होते हैं।
- अमेरिकी न्यूजपेपर द वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, शब्दीस और बर्जिन जहाजों में करीब 20 फीट लंबे करीब 21 हजार कंटेनर ले जा सकते हैं। इन पर चीन से सोडियम परक्लोरेट केमिकल लदे होने की संभावना है।
- सोडियम परक्लोरेट एक हाई-पावर ऑक्सीडाइजर है। इसका इस्तेमाल अमोनियम परक्लोरेट बनाने के लिए किया जाता है, जिससे मिसाइलों के लिए सॉलिड फ्यूल बनाया जाता है।
- अमेरिका ने भी IRISL पर आरोप लगाया है कि ये तेहरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के जरूरी समान की सप्लाई कर रहा है। इसी के चलते IRISL पर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन ने प्रतिबंध लगाए हैं।
- 2026 की शुरुआत में IRISL के कम से कम 12 जहाज चीन के इसी पोर्ट के उसी टर्मिनल पर पहुंचे थे, जहां से शब्दीस और बर्जिन रवाना हुए हैं। इनमें से 11 जहाजों ने माल उठाया। इन पर भी मिलिट्री केमिकल्स और रॉ मटेरियल्स लदे थे।

सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि 19 फरवरी को IRISL का हमौना और शब्दीस जहाज गाओलान पोर्ट के पास थे। (पहली और दूसरी तस्वीर) इससे पहले बाश्त और अर्जिन गाओलान पोर्ट पहुंच चुके थे। (तीसरी और चौथी तस्वीर)
सवाल-2: क्या अमेरिका इन जहाजों को ईरान तक पहुंचने देगा?
जवाब: फिलहाल दोनों जहाज साउथ चाइना सी पार करके मलक्का स्ट्रेट के करीब पहुंच गए हैं…
- बर्जिन मलेशिया के पास लंगर डाले खड़ा है, जो करीब 6,400 किमी दूर ईरान के बंदर अब्बास पोर्ट जा सकता है।
- शब्दीस वियतनाम के पास समुद्र में आगे बढ़ रहा है, जिसे करीब 7,200 किमी दूर चाबहार पोर्ट पहुंचना है।

दोनों को ईरान पहुंचने के लिए होर्मुज स्ट्रेट पार करना होगा, जहां अमेरिकी और ईरानी बेड़े तैनात हैं। यहां हमले भी हो रहे हैं। वहीं, चाबहार पोर्ट पर भी हमले हुए हैं। हाल ही में बंदर अब्बास के आसपास काले धुएं के गुबार देखे गए हैं।
इसके अलावा 4 मार्च को अमेरिकी नेवी की एक पनडुब्बी ने श्रीलंका के पास हिंद महासागर में ईरान के युद्धपोत IRIS Dena को Mk-48 टॉरपीडो से डुबो दिया। ये फ्रिगेट युद्धक्षेत्र से करीब 3 हजार किमी दूर था और जंग में शामिल भी नहीं था। फिर भी ऐसा हुआ।
अमेरिकी थिंकटैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में एशिया मैरीटाइम ट्रांसपिरेंसी इनिशिएटिव के डिप्टी डायरेक्टर हैरिसन प्रेटैट के मुताबिक, जंग शुरू होने के बाद से हॉर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद है। पहले रोजाना औसतन 153 जहाज गुजरते थे, लेकिन 1 मार्च के बाद से ये आंकड़ा 13 हो गया है। चीन तक के दर्जनों जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हैं।
यानी अगर शब्दीस और बर्जिन हॉर्मुज स्ट्रेट की ओर बढ़े तो अमेरिकी नेवी इन पर हमला कर सकती है। इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि अगर इन जहाजों पर लदा समान ईरान के लिए इतना अहम है तो फिर संभावना है कि IRGC की नेवल फ्लीट इन्हें एस्कॉर्ट करें। ऐसा हुआ तो अगले हफ्ते तक दोनों जहाज ईरानी बंदरगाहों तक सुरक्षित पहुंच सकते हैं।
हाल ही में बंदर अब्बास पोर्ट की ओर जा रहे 3 ईरानी जहाजों- हमुना, अबियान और अर्जिन ने रास्ता बदला है। उन्होंने तय रास्तों से इतर खुले समुद्री रास्तों का इस्तेमाल किया। 7 मार्च को ये ईरान के पास मंडराते हुए दिखे।
हालाकिं इसको लेकर अमेरिका के डिफेंस डिपार्टमेंट ‘पेंटागन’, ट्रेजरी डिपार्टमेंट और व्हाइट हाउस ने कोई बयान जारी नहीं किया है।
सवाल-3: जंग के बीच ईरान को सोडियम परक्लोरेट क्यों दे रहा है चीन?
जवाब: जंग के बीच में चीन की ओर से सोडियम परक्लोरेट की खेप ईरान भेजने के पीछे 4 बड़ी वजहें हो सकती हैं…
- ईरान को मिसाइलें कम न पड़े: ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के कच्चे माल की कमी हो गई है। चीन इस कमी को पूरा कर रहा है, ताकि ईरान का मिसाइल प्रोडक्शन न रुके और उसकी मारक क्षमता बनी रहे।
- 25 साल की साझेदारी: 2021 में चीन और ईरान के बीच 25 साल के लिए स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप हुई। इसके तहत चीन को सस्ता ईरानी तेल मिलता है। वहीं चीन उसे टेक्नोलॉजी और रॉ मटेरियल सप्लाई करता है। हथियार, जेट्स, गोला-बारूद वगैरह भी देता है।
- एनर्जी सिक्योरिटी: ईरान का 80% तेल चीन खरीदता है, वो भी सस्ते दाम पर। ये चीन की तेल खपत का करीब 15% है। अगर ईरान कमजोर पड़ा तो वहां अमेरिका का दबदबा बढ़ेगा और सत्ता बदल जाएगी। इससे चीन के तेल कारोबार और इकोनॉमी पर असर पड़ेगा।
- अमेरिका को उलझाए रखना: चीन चाहता है कि अमेरिका मिडिल-ईस्ट के इस दलदल में लंबे समय तक फंसा रहे। अमेरिका का पूरा फोकस अगर मिडिल-ईस्ट में रहा, तो चीन अपने इलाके में दबदबा बढ़ाएगा और ताइवान कब्जाने की कोशिश करेगा।
अमेरिकी थिंकटैंक वाशिंगटन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो ग्रांट रमली के मानते हैं कि चीन के लिए ईरान केवल एनर्जी सोर्स नहीं, बल्कि रणनीतिक ढाल भी है। अगर ईरान से तेल सप्लाई रुकी, तो चीन की निर्भरता सऊदी अरब या रूस पर बढ़ेगी। ऐसा चीन नहीं चाहता।
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27 मार्च 2021 को चीन के विदेश मंत्री वांग यी और ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने तेहरान में स्ट्रैटजिक डील साइन की थी।
सवाल-4: तो क्या चीन ने जंग में खुलकर ईरान का खेमा चुन लिया है?
जवाब: अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हुए हमले की चीन ने निंदा की थी। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सीजफायर करने और बातचीत से मामला सुलझाने की अपील की थी। ऐसे में चीनी खेप का ईरान के लिए रवाना होना सवाल उठता है कि क्या चीन खुलकर ईरान के साथ है?
अमेरिकी थिंकटैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में चाइना स्टडीज के सीनियर फेलो आइसैक कार्डन के मुताबिक, ‘चीन इन जहाजों को कुछ और दिन पोर्ट पर रोक सकता था। उनकी वापसी में प्रशासनिक देरी कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। चीन सभी के सामने कहता है कि वो शांति चाहता है, लेकिन युद्ध के समय ऐसे फैसले ले रहा है।’
ग्रांट रमली मानते हैं कि चीन ऐसा रुख असमान्य और साहसिक है। क्योंकि अभी ईरान खाड़ी देशों पर मिसाइले दाग रहा है। ऐसे समय में ईरान की मदद करने से चीन के अरब देशों से रिश्ते खराब होने की आशंका है।
सवाल-5: आखिर चीन की मिडिल-ईस्ट को लेकर क्या स्ट्रैटजी है?
जवाब: चीन की ज्यादा दिलचस्पी इसमें नहीं है कि ईरान की मौजूदा सत्ता बनी रहे। वो ईरान और मिडिल ईस्ट में अपने निवेश सुरक्षित रखना चाहता है। उसकी एनर्जी सप्लाई प्रभावित न हो।
चीन का आधा तेल मिडिल ईस्ट से आता है। वो सउदी अरब, कुवैत, इराक, ईरान और UAE से तेल खरीदता है। चीन को चिंता है कि ईरान पूरे मिडिल ईस्ट में रीजनल वॉर छेड़ देगा। इससे खाड़ी देशों से आने वाला तेल प्रभावित होगा। यहां चीन का काफी निवेश है। ईरान के हमलों से इन्हें भी नुकसान होगा।
इसके अलावा चीन ने खुद को दुनिया के समाने अमेरिका का ऑप्शन बताया है। दोनों का टकराव किसी से छिपी नहीं है। मिडिल-ईस्ट में चीन ने ईरान से रिश्ते इसलिए बनाए क्योंकि अमेरिका के बाकी अरब देशों से मजबूत हैं और ईरान उसके लिए सबसे बड़ी दिक्कत है।
हालांकि चीन कभी खुलकर अमेरिका की निंदा नहीं करता, बल्कि उससे डिप्लोमैटिक रिश्ते बनाकर चलता है। अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन का दौरा करने वाले हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आखिरी मुलाकात अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई थी।
ईरान जंग के चलते अमेरिका की मिलिट्री और फंड्स मिडिल-ईस्ट में शिफ्ट हो गए हैं। चीन यही चाहता है।
ब्रिटिश थिंकटैंक चैटम हाउस में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम के असोसिएट फेलो अहमद अबूदू के मुताबिक, ‘चीन, ईरान की मिसाइल और ड्रोन स्ट्रैटजी मजबूत करने के लिए जरूरी तकनीक साझा कर सकता है। वो अमेरिका और चीन के मौजूदा रिश्ते खराब किए बिना ईरान की मदद करना चाहता है, जिससे उसके लॉन्ग टर्म गोल पूरे हो सकें।’
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