‘मुझे बांदा जेल में जान का खतरा है। नसों में दर्द है, हाथ-पैर ठंडे पड़ गए हैं। स्टाफ मुझे खाने में स्लो पॉइजन दे रहा है। लग रहा है कि किसी भी पल मौत आ जाएगी।’
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माफिया और विधायक रहे मुख्तार अंसारी की यूपी की बाराबंकी सिविल कोर्ट में दाखिल ये आखिरी अर्जी थी। 21 मार्च, 2024 को अर्जी अदालत पहुंची और 28 मार्च को मुख्तार की मौत हो गई। उस वक्त वे बांदा जेल में बंद थे।
मुख्तार को गुजरे 2 साल हो गए। परिवार अब भी केस लड़ रहा है। उनके वकील रणधीर सिंह सुमन दावा करते हैं कि जेल स्टाफ ने साजिश करके मुख्तार की जान ली। वे मौत से पहले की फोटो, कोर्ट में दिए बयान और दस्तावेज का हवाला देते हैं। मजिस्ट्रियल जांच को फर्जी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
172 दिन चली जांच में मुख्तार की मौत की वजह हार्ट अटैक को बताया गया। कानूनी प्रक्रिया की वजह से जेल में मुख्तार के कपड़ों से लेकर बैरक तक, सब सील है। उनके बड़े भाई और गाजीपुर से सपा सांसद अफजाल अंसारी भी मौत को सरकार और जेल प्रशासन की मिलीभगत मानते हैं।

पहली तस्वीर सितंबर 2022 की है, जब मुख्तार मऊ कोर्ट में पेशी पर आया था। दूसरी फोटो 28 मार्च 2024, मौत के वक्त की है ।
पॉइंट 1: मुख्तार की मौत नेचुरल डेथ या प्लांड मर्डर मुख्तार की मौत के अगले दिन 29 मार्च, 2024 को यूपी सरकार ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए थे। जांच टीम में बांदा की DM दुर्गा शक्ति नागपाल और एसपी अंकुर अग्रवाल शामिल थे। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट गरिमा सिंह इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनाई गईं। टीम ने 5 महीने जांच की। 16 सितंबर, 2024 को आई रिपोर्ट में बताया गया कि मुख्तार की मौत हार्ट अटैक यानी Myocardial Infarction से हुई।

ये मजिस्ट्रियल जांच में शामिल की गई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसमें मुख्तार की मौत का समय और वजह बताई गई।
जांच रिपोर्ट से 3 बातें साफ हुईं… 1. जेल के खाने में जहर नहीं था। बैरक नंबर-16 में मिले गुड़, चने और नमक के सैंपल में जहर के सबूत नहीं मिले। 2. जेल मैनुअल के मुताबिक कैदियों को खाना देने से पहले स्टाफ और रसोइए उसे चखते हैं। 3. मौत वाले दिन और उससे 2-3 दिन पहले तक जेल में जिन लोगों ने खाना खाया, उनमें से किसी की भी तबीयत खराब नहीं हुई थी।
मुख्तार पक्ष का काउंटर: वकील रणधीर सुमन इन दावों को काउंटर करने के लिए 2 तर्क देते हैं।
पहला: मौत के 2 हफ्ते पहले से मुख्तार की तबीयत खराब थी। 20 मार्च को पेशी थी। तब उसने पहली बार कहा कि 19 मार्च की रात उसे खाने में जहर दिया गया। दूसरा: मुख्तार ने मौत से 7 दिन पहले 21 मार्च को बाराबंकी सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि उसे 40 दिन पहले खाने में स्लो पॉइजन दिया गया। ये खाना बांदा जेल स्टाफ बनाता था। स्टाफ ने भी खाना खाया था, जिसके बाद कई कर्मचारियों और मुख्तार की तबीयत बिगड़ गई थी।

ये 21 मार्च, 2024 को बाराबंकी सिविल कोर्ट में दाखिल मुख्तार की आखिरी अर्जी है।
पॉइंट 2: मौत से पहले जेल में मुख्तार की सुरक्षा मजिस्ट्रियल जांच के मुताबिक, जेल का हर CCTV फुटेज खंगाला गया। रिपोर्ट में मिनट-दर-मिनट का ब्यौरा है कि 28 मार्च, 2024 की शाम मुख्तार बैरक में बेहोश हुआ। जेल प्रशासन ने गोल्डन आवर, यानी जेल से अस्पताल ले जाने तक के वक्त में कोई देरी नहीं की।
मुख्तार पक्ष का काउंटर 16 अगस्त, 2021 को मुख्तार ने बाराबंकी की MP/MLA कोर्ट में बताया था कि बांदा जेल में उसकी हत्या की साजिश रची जा रही है। अधिकारी और संदिग्ध लोग CCTV कैमरों का मुंह मोड़कर अंदर आते हैं। कुछ कैदियों को मेरी हत्या के बदले 5 करोड़ रुपए और सभी मुकदमों से रिहाई दिलाने की बात कही गई थी।

मुख्तार ने 16 अगस्त, 2021 को एप्लिकेशन देकर जेल में सुरक्षा की मांग की थी।
पॉइंट 3: बैरक नंबर-16 में मुख्तार की मेडिकल कंडीशन जांच टीम के मुताबिक, मजिस्ट्रियल जांच सिर्फ डॉक्टरों के मेडिकल रिपोर्ट पर आधारित नहीं थी, बल्कि इसमें मुख्तार के साथ बंद कैदियों समेत 100 से ज्यादा लोगों के बयान और विसरा की लैब रिपोर्ट शामिल है। मुख्तार के हार्ट की मसल्स में येलो स्पॉट और ब्लॉकेज मिला। ये सबूत है कि मौत अचानक नहीं हुई, बल्कि पुरानी बीमारी बढ़ने से हुई।
मुख्तार पक्ष का काउंटर मुख्तार के बेटे उमर अंसारी ने कोर्ट में कहा था कि पिता की डेडबॉडी पर चोट के निशान थे। नाक-कान से निकला खून साफ दिख रहा था। आंखें सूजी हुई और पेट गुब्बारे जैसा फूला था। इसलिए मौत हार्ट अटैक से हुई नहीं लगती।

मुख्तार अंसारी की मौत के बाद उनकी डेडबॉडी के साथ बेटे उमर अंसारी।
भाई अफजाल बोले- मौत का सच सामने लाएंगे गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘मुख्तार की मौत से पहले उनसे फोन पर बात हुई थी। उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही थी। वो सिर्फ इतना कह रहे थे कि जेल में जहर दिया गया है, जिससे शरीर टूटता जा रहा है।’

वकील बोले- मजिस्ट्रियल जांच खानापूर्ति, केस फिर खुलेगा एडवोकेट रणधीर कहते हैं, ‘मौत से करीब 10 दिन पहले मुख्तार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कोर्ट में पेश हुए थे। उसने जेल में स्लो पॉइजन देने का आरोप लगाया था। मैंने 19 मार्च को उनकी सुरक्षा के लिए कोर्ट में एप्लिकेशन दी, लेकिन आदेश के बावजूद जेल स्टाफ और प्रशासन की लापरवाही जारी रही।’
नेचुरल डेथ के दावे पर वे कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में कस्टोडियल डेथ पर जितनी भी मजिस्ट्रियल जांच होती हैं, वे खानापूर्ति हैं। मुख्तार जिंदा थे, तब उन्हें परेशान करने के लिए दिन में चार से पांच बार बैरक की चेकिंग होती थी। जांच के बहाने खाना और पर्सनल सामान बाहर फेंक दिया जाता था। रात में 1 बजे भी जांच होती थी। ये शारीरिक शोषण जैसा ही था।’

एडवोकेट रणधीर मुख्तार की मौत का जिम्मेदार बांदा के तत्कालीन जेल सुपरिटेंडेंट विरेश राज शर्मा और जेल स्टाफ को मानते हैं। वे कहते हैं कि विरेश राज ने कोर्ट में मौत को लेकर जिरह के वक्त हर सवाल का गोलमोल जवाब दिया। इससे साबित होता है कि वे सच छिपा रहे थे।
हमने बांदा जेल सुपरिटेंडेंट रहे विरेश राज से फोन पर बात की। उन्होंने कहा कि केस अभी सुप्रीम कोर्ट की प्रोसेस में है, इसलिए कुछ बोलना सही नहीं। इसके बाद हमने मौजूदा सुपरिटेंडेंट आलोक कुमार से बात की।
आलोक कहते हैं, ‘जांच के लिए बैरक नंबर-16, मुख्तार के कपड़े, किताबें और पर्सनल सामान सील रखा गया है। हमने उनका पर्सनल सामान परिवार को हैंडओवर करने के लिए कहा था, लेकिन कोई लेने नहीं आया है। दो साल बाद भी बैरक उसी कंडीशन में है। ये प्रोटोकल केस की इन्वेस्टिगेशन का हिस्सा है।’

2021 से 2024 तक मुख्तार अंसारी बांदा जेल में बंद रहे।
क्रिमिनल लॉयर बोले- जहर देने और सुपारी के दावे कमजोर मुख्तार के वकील रणधीर के दावों की पड़ताल के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिनल लॉयर शाश्वत आनंद से बात की।
1. क्या मुख्तार को खाने में जहर दिया गया होगा? जवाब: मुख्तार के वकील कोर्ट में उनकी एप्लिकेशन दिखा रहे हैं। ये देखना जरूरी है कि मुख्तार की अर्जी पर क्या एक्शन लिया गया। जहर देने की शिकायत से लेकर मौत के बीच 9 दिन का समय था।
ये बड़ा अंतर है। इस दरमियान उनके वकील जेल प्रशासन से ‘स्टमक फूड पंपिंग’ की रिक्वेस्ट करते तो मुख्तार की बॉडी से खराब खाना निकालकर उसे चेक किया सकता था कि उन्होंने कौन सा जहर दिया गया है। मौत के बाद उनकी कोर्ट एप्लीकेशन दिखाने का कोई मतलब नहीं दिखता।
2. मुख्तार को मारने के लिए जेल में सुपारी दी गई जवाब: सिर्फ ये कह देना, बड़ा कमजोर पक्ष है कि जेल में हत्या की सुपारी दी जा रही या बैरक में कोई आ-जा रहा है। क्या उनके वकीलों के पास कोई सबूत हैं। मुख्तार हाई सिक्योरिटी बैरक में थे। इसकी निगरानी जेल के साथ-साथ पुलिस हेडक्वार्टर तक होती है। लिहाजा उन्हें सुपारी देकर जेल में मार देना कम मुमकिन लगता है।
3. मुख्तार के शरीर पर चोट के निशान जवाब: अगर डेडबॉडी पर चोट के निशान या कुछ दिख रहा था, तो हाईकोर्ट में दूसरे पोस्टमॉर्टम की अपील करनी चाहिए थी। हाईकोर्ट दूसरे राज्य के डॉक्टर और पुलिस से पोस्टमॉर्टम करवा सकता था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
अब भी अगर परिवार या वकील के पास डेडबॉडी पर चोट की फोटो है, तो इसे आधार बनाकर हाईकोर्ट में नई पिटीशन डाल सकते हैं। हालांकि सवाल अब भी उठेंगे कि अगर पहले से सबूत थे, तो अब तक कुछ क्यों नहीं किया।

पूर्व IPS अधिकारी बोले- मुख्तार का चैप्टर खत्म, मौत बीमारी से हुई यूपी के पूर्व IPS अधिकारी राजेश कुमार पांडे ने 2016 में मुख्तार पर पत्रकार को पीटने का केस दर्ज कराया था। वे मुख्तार गैंग के खिलाफ चले ऑपरेशन में शामिल रहे हैं। राजेश कहते हैं, ‘ये केस पूरी तरह खुल चुका है। जहर देने जैसी कोई बात सामने नहीं आई है। मुख्तार के भाई अफजाल जहर देने की बात कई बार कह चुके हैं, लेकिन सच यही है कि मुख्तार की मौत बीमारी की वजह से हुई।’

हालांकि, 1972 बैच के रिटायर्ड IPS अधिकारी एसआर दारापुरी राजेश पांडे की बात पर सहमति नहीं जताते। वे कहते हैं, ‘अगर कोई कैदी मौत के कुछ दिन पहले हत्या होने की आशंका जताता है और हफ्ते भर बाद उसकी मौत हो जाती है, तो इससे साबित होता है कि कुछ गड़बड़ है। सरकार ने मजिस्ट्रेट जांच करवाई, वो बेमतलब थी।‘
दारापुरी आगे कहते हैं कि अमूमन देखा गया है कि मजिस्ट्रेट राज्य सरकार के दबाव में काम करते हैं। सबको पता है कि योगी सरकार का रुख मुख्तार को लेकर कैसा था। जांच किसी इंडिपेंडेंट जांच एजेंसी को देनी चाहिए थी।


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