Jitu Munda Sister Skeleton Video Story; Odisha Grameen Bank Case

11 Min Read


.

इसमें दिख रहे शख्स जीतू मुंडा हैं। उम्र 52 साल। बदन पर सिर्फ एक कपड़ा। कंधे पर बड़ी बहन कलरा का कंकाल। कलरा के बैंक अकाउंट में 19,400 रुपए जमा थे। उनकी मौत के बाद जीतू 27 अप्रैल को पैसे निकालने बैंक पहुंचे। आरोप है कि बैंक मैनेजर ने कहा कि बहन को लाओ, तभी पैसे मिलेंगे। जीतू ने कब्र से बहन का कंकाल निकाला और तीन किमी दूर बैंक लेकर आ गए। मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के दियानाली गांव का है।

दैनिक भास्कर की टीम जीतू मुंडा के घर पहुंची, तो दो सवाल साथ थे…

1. जीतू को ऐसा क्यों करना पड़ा? 2. उन्हें ऐसा करने के लिए किसने मजबूर किया?

पहले सवाल का जवाब ये फोटो है…

कभी भी टूटकर गिर जाने की हालत में पहुंच चुका ये मकान जीतू का घर है। कच्चा फर्श, सीलन भरी दीवारें, दरवाजे की चौखट तक उखड़ चुकी है। पहले जीतू और उनकी बहन कलरा इसी घर में रहते थे। दो गाय भी इसी में बंधती थीं। एक साल पहले कलरा को सरकारी घर मिल गया। जीतू के पास कोई काम नहीं है। कलरा को सरकार से मिलने वाले 1 हजार रुपए और 35 किलो चावल में गुजारा होता था।

पति की मौत के बाद से कलरा मायके में रह रही थीं। उन्होंने बछड़ा बेचकर 19,400 रुपए पटना ब्लॉक के मल्लीपासी ग्रामीण बैंक में जमा किए थे। जीतू और कलरा बीच-बीच में 100, 200, 500 रुपए निकालने बैंक जाते थे। एक दिन कलरा बीमार पड़ीं और 26 जनवरी को उनकी मौत हो गई। जीतू के गुजारे का सहारा खत्म हो गया। आखिरी आस बैंक में जमा पैसे थे। जीतू वही निकालने बैंक गए थे।

19 हजार के लिए बहन की कब्र खोदी, अब 15 लाख रुपए की मदद मिली

जीतू के घर में बहन के अलावा एक भाई और उनका परिवार है। जीतू की शादी नहीं हुई है। वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें बैंक में जमा पैसों के अलावा अलग-अलग संगठनों और पार्टियों से करीब 15 लाख रुपए की मदद मिल चुकी है। बहन के घर में बिजली कनेक्शन मिल गया है। जीतू अब उनके घर में ही रह रहे हैं।

जीतू का गांव क्योंझर से करीब 40 किमी दूर जंगलों में बसा है। हम उनके घर पहुंचे तो मीडिया और नेताओं की भीड़ लगी थी। जीतू, उनके भाई शंकर और बहन कलरा के घर पास-पास ही हैं, लेकिन जीतू और कलरा साथ में जीतू के घर में रहते थे। फिर कलरा नए घर में रहने लगीं। इसी घर के पास उनकी कब्र बनी है।

मुंडा समुदाय में शव को जलाने की बजाय दफनाया जाता है। जीतू मुंडा और परिवार ने बहन की मौत होने पर उन्हें घर के पास ही दफना दिया।

मुंडा समुदाय में शव को जलाने की बजाय दफनाया जाता है। जीतू मुंडा और परिवार ने बहन की मौत होने पर उन्हें घर के पास ही दफना दिया।

हमने जीतू से पूछा घर के पास बहन की कब्र क्यों बनाई है? जीतू बोले- मेरी बहन ही मेरा घर है। मुझे डर नहीं लगता। वह मेरे पास ही है। बहन के जाने के बाद अकेला हो गया हूं। माता-पिता के निधन के बाद वही मेरे लिए सब कुछ थीं। मेरे पास न राशन कार्ड है, न कोई कागज। सब बहन का ही था।

पति की मौत के बाद बहन मायके आई, कहती थी- भाइयों को छोड़कर नहीं जाऊंगी

जीतू इससे आगे नहीं बोल पाते। उनके छोटे भाई शंकर बताते हैं कि जिस दिन जीतू ने बहन की कब्र खोदी थी, मैं घर पर नहीं था। जीतू और कलरा के बीच बहुत अच्छा रिश्ता था। दोनों कई बातों में मुझे भी शामिल नहीं करते थे। मुझे बताए बिना ही बैंक जाते थे। हम चार भाई थे। दो भाइयों का निधन हो चुका है। पति की मौत के बाद कलरा भी हमारे पास आ गई। वह जीतू के साथ रहने लगी। वो कहती थी कि अब भाइयों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।

जीतू ने कब्र खोदी, बहन का कंकाल निकाला, तब आसपास के लोगों ने रोका क्यों नहीं? जवाब गांव के मंसूर ने दिया, ‘जीतू उस दिन सुबह करीब 10 बजे बैंक गया था। 11:30 बजे लौटा। 12 बजे के करीब कब्र खोदना शुरू किया। तेज गर्मी की वजह से आसपास सन्नाटा था, इसलिए कोई उसे देख नहीं पाया।’

कलरा की मौत कैसे हुई थी? पड़ोसी करुणाकर महंत बताते हैं, ‘तेज बुखार हुआ था। जीतू बैंक गया और 500 रुपए निकालकर लाया। कलरा को अस्पताल ले गया, लेकिन उसकी मौत हो गई। इसके तीन महीने बाद जीतू पैसे निकालने बैंक गया था। स्टाफ ने उससे कागज मांगे। जीतू पढ़ा-लिखा नहीं है, उसे कागजों के बारे में पता नहीं था। वो एक ही बात कहता रहा कि मेरी बहन के नाम पर पैसा है, मुझे दे दो। स्टाफ ने कहा कि जाओ, बहन को लेकर आओ, तब पैसा मिलेगा।’

‘हो सकता है बैंकवालों ने यह बात झुंझलाहट में कही हो, लेकिन जीतू उसे समझ नहीं पाया। वो गांव लौटा और कब्र खोदकर बहन का कंकाल निकाला। तीन किलोमीटर दूर बैंक ले गया। मैनेजर से कहा कि मैं बहन को ले आया हूं, अब मेरा पैसा दे दो। स्टाफ ने पुलिस बुला ली। पुलिसवालों ने जीतू को डांटा और कहा कि शव को फिर से दफनाओ। जीतू कंकाल कंधे पर रखकर वापस लाया और उसे फिर से दफना दिया।’

ये जीतू की बहन कलरा का घर है। एक साल पहले ही सरकार की तरफ से मिला था। अब जीतू इसी में रह रहे हैं।

ये जीतू की बहन कलरा का घर है। एक साल पहले ही सरकार की तरफ से मिला था। अब जीतू इसी में रह रहे हैं।

पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारी

बैंक मैनेजर: मैनेजर के मुताबिक, जीतू पैसे निकालने आया था, तभी उसे पहली बार देखा था। उससे डॉक्युमेंट मांगे थे, डेडबॉडी लाने के लिए नहीं कहा। हालांकि, जीतू का दावा है कि मैनेजर ने ही कहा था कि बहन को लेकर आओ, तब पैसा मिलेगा। जीतू के मुताबिक, मैंने मैनेजर को बताया भी था कि बहन मर चुकी है, तब भी उन्होंने कहा कि बहन को लेकर आओ, नहीं तो पैसा नहीं मिलेगा।

जांच में सामने आया है कि जीतू बहन के साथ कई बार बैंक आए थे। आखिरी बार दोनों 26 दिसंबर को 500 रुपए निकालने बैंक गए थे। हम मल्लिपासी ग्रामीण बैंक गए, जहां जीतू की बहन का अकाउंट है। बैंक मैनेजर मौजूद नहीं थे। सिर्फ दो कर्मचारी थे, जिनमें से एक डेपुटेशन पर हैं। उन्होंने बताया कि मैनेजर छुट्‌टी पर चले गए हैं।

ये मल्लिपासी ग्रामीण बैंक की ब्रांच है। ये ब्रांच पटना ब्लॉक में है। जीतू मुंडा की बहन कलरा का अकाउंट इसी बैंक में था।

ये मल्लिपासी ग्रामीण बैंक की ब्रांच है। ये ब्रांच पटना ब्लॉक में है। जीतू मुंडा की बहन कलरा का अकाउंट इसी बैंक में था।

पुलिस-प्रशासन: जीतू बहन का कंकाल लेकर वापस जा रहा था, तब पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौजूद थे। सभी पीछे-पीछे चलते रहे, लेकिन जीतू की मदद नहीं की। मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, शव का सम्मान के साथ अंतिम संस्कार प्रशासन का कर्तव्य है।

इस बारे में पता करने हम पटना पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां SI धनेश्वर पात्रा मिले। हमने उनसे पूछा कि डेडबॉडी ले जाने के लिए एंबुलेंस या कोई गाड़ी क्यों नहीं दी गई? उन्होंने जवाब दिया कि मैं उस दिन छुट्टी पर था। सब अचानक हुआ। स्टाफ तय नहीं कर पाया कि क्या करना है। जल्दबाजी में ऐसा हो गया।

जीतू मुंडा बहन का कंकाल लेकर आए और सीढ़ियों पर रख दिया। पुलिस ने उन्हें समझाकर यहां से वापस भेज दिया।

जीतू मुंडा बहन का कंकाल लेकर आए और सीढ़ियों पर रख दिया। पुलिस ने उन्हें समझाकर यहां से वापस भेज दिया।

डेथ सर्टिफिकेट जारी करने वाले अफसर: जीतू ने बहन की मौत के बाद 26 फरवरी को डेथ सर्टिफिकेट के लिए सरकारी वेबसाइट पर आवेदन किया गया था। 7 दिन में सर्टिफिकेट मिल जाना चाहिए था, लेकिन अप्रैल तक भी जारी नहीं हुआ। पटना मेडिकल कॉलेज के इंचार्ज सुवेंदु कुमार नायक कहते हैं, ‘कलरा की मौत 26 जनवरी 2026 को हुई थी। ये मामला उनके पास 17 अप्रैल को आया।’

‘नियम है कि 21 दिन में रजिस्ट्रेशन हो जाना चाहिए। मृत्यु के 7 दिनों के भीतर परिवार के लोग आवेदन करते हैं, तभी प्रक्रिया जल्दी पूरी हो पाती है। कलरा के परिवार ने समय पर आवेदन नहीं किया। बाद में उनकी भाभी गुरुबारी मुंडा ने 30 मार्च को डेथ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया।’

‘इसके लिए जो दस्तावेज दिए गए थे, वे स्पष्ट नहीं थे। इसलिए आवेदन वापस कर दिया गया। 25 अप्रैल को दोबारा सही दस्तावेजों के साथ आवेदन किया गया और 29 अप्रैल को डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया। हमारी ओर से लापरवाही नहीं हुई। गुरुबारी मुंडा ने एक एफिडेविट दिया था, जिसमें लिखा था कि मेरे अलावा कलरा मुंडा का कोई और वैध वारिस नहीं है। उन्हें जो दस्तावेज और प्रमाण दिए, उसी आधार पर हमने कार्रवाई की।’

ऐसा दावा है कि ये एफिडेविट गुरुबारी मुंडा ने डेथ सर्टिफिकेट के लिए दिया था। ये अंग्रेजी में है। नीचे अंगूठा लगा है। तारीख 26 मार्च, 2026 लिखी है। इसके एक महीने बाद 29 अप्रैल को सर्टिफिकेट जारी किया गया। 27 अप्रैल को जीतू मुंडा कंकाल लेकर बैंक पहुंचे थे।

ऐसा दावा है कि ये एफिडेविट गुरुबारी मुंडा ने डेथ सर्टिफिकेट के लिए दिया था। ये अंग्रेजी में है। नीचे अंगूठा लगा है। तारीख 26 मार्च, 2026 लिखी है। इसके एक महीने बाद 29 अप्रैल को सर्टिफिकेट जारी किया गया। 27 अप्रैल को जीतू मुंडा कंकाल लेकर बैंक पहुंचे थे।

गुरुबारी मुंडा ने भी एफिडेविट देने की बात मानी है। उन्होंने बताया कि अकाउंट से पैसे निकालने में दिक्कत हुई, तब किसी ने ऐसा करने का सुझाव दिया था। एफिडेविट परिवार की सहमति से दिया था।



Source link

Share This Article
Leave a Comment