1952 में जब देश में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए, तब संसद में 489 सीटें थीं और आबादी थी करीब 36 करोड़। आज आबादी 140 करोड़ पार कर चुकी है, लेकिन पिछले 50 साल से सीटें 543 पर जमी हैं।
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अब सरकार ने सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है और एक साथ तीन बड़े काम करने की तैयारी में है- लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करना, देश का नया चुनावी नक्शा खींचना (यानी परिसीमन), और 2023 में पास हुए महिला आरक्षण कानून को असल में लागू करना।
लेकिन यह इतना सीधा नहीं है। दक्षिण के राज्यों को डर है कि उनकी सीटें घटेंगी। विपक्ष पूछ रहा है कि बंगाल चुनाव से ठीक पहले इतनी हड़बड़ी क्यों और सबसे बड़ा सवाल- महिला आरक्षण असल में लागू कब से होगा?
ऐसे ही 8 जरूरी सवालों के जवाब, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: महिला आरक्षण का कानून 2023 में ही पास हो गया था, तो अब तीन नए बिल क्यों लाने पड़े?
जवाबः केंद्र सरकार ने 19 सितंबर 2023 को संविधान (128वां संशोधन) विधेयक पेश किया था। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था।
20 सितंबर को लोकसभा, 21 सितंबर को राज्यसभा और 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह बिल कानून बन गया। लेकिन लागू नहीं हो सका।
क्यों? क्योंकि उस कानून में शर्त थी कि आरक्षण नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। नई जनगणना का डेटा आने में करीब दो साल और लग सकते हैं। यानी परिसीमन 2034 के चुनाव तक टल सकता था।
इसी को बदलने के लिए सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है और तीन नए बिल ला रही है:
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026
- परिसीमन विधेयक, 2026
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026
इन बिलों के तीन मकसद हैं…
- पहला: 2027 की जनगणना का इंतजार न करके 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन और महिला आरक्षण लागू किया जाए, ताकि 2029 के चुनाव से यह शुरू हो सके।
- दूसरा: आर्टिकल 81(1) में संशोधन, जो अभी संसद में अधिकतम 550 सीटों की सीमा तय करता है। लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने के लिए यह बदलाव जरूरी है। इसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें होंगी।
- तीसरा: आर्टिकल 82 को हटाना। यह आर्टिकल हर जनगणना के बाद परिसीमन को अनिवार्य बनाता है। सरकार इसे हटाकर परिसीमन को अपनी जरूरत और समय के हिसाब से लचीला बनाना चाहती है।

सितंबर 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित होने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने महिला सांसदों से मुलाकात की थी।
सवाल 2: लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
जवाबः मौजूदा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना पर आधारित है। तब एक सांसद औसतन 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, जो अब बढ़कर 25 लाख से ऊपर पहुंच गया है।
लेकिन राजनीतिक जानकार एक और बात भी कहते हैं। लोकसभा में अभी 74 महिला सांसद हैं, यानी सिर्फ 13.6%। 543 सीटों पर 33% आरक्षण लागू होता, तो 181 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होतीं और कई पुरुष सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़तीं। इससे पार्टियों के भीतर बगावत का खतरा था।
अनुमान है कि परिसीमन के बाद 816 सीटें हो जाएंगी, यानी 273 नई सीटें जुड़ेंगी। लगभग इतनी ही सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी मौजूदा पुरुष सांसदों पर सीधा असर कम होगा।
सवाल 3: परिसीमन के लिए 2011 का पुराना डेटा क्यों, नई जनगणना का इंतजार क्यों नहीं?
जवाबः लोकतांत्रिक मानकों के हिसाब से परिसीमन हमेशा ताजा जनगणना के आधार पर होना चाहिए। लेकिन अगर 2027 की जनगणना का इंतजार किया गया, तो महिला आरक्षण 2034 तक लागू नहीं हो पाएगा।
पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की महिलाओं को पत्र लिखा- ‘महिलाओं का अधिकार अब और टाला नहीं जा सकता और 2029 के चुनाव से इसे लागू होना चाहिए।’
लेकिन मोदी सरकार की इस जल्दबाजी पर सवाल भी उठ रहे हैं-
- सीनियर पत्रकार आरती जेरथ मानती हैं कि यह सब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश है, जहां 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग है।
- राजनीतिक विश्लेषक राहुल वर्मा कहते हैं कि अगर इससे महिलाओं के 10% वोट का रुझान भी बदला, तो जहां चुनाव 3-4% के अंतर से जीते जाते हों, वहां 1-2% एक्स्ट्रा वोट भी नतीजा पलट सकते हैं।
- लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि जब सभी दल चुनाव प्रचार में व्यस्त हों, यह विशेष सत्र बुलाने का सही वक्त नहीं है। परिसीमन और सीटें बढ़ाने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत बहस होनी चाहिए। चुनाव बाद भी सत्र बुलाया जा सकता था।
इन सवालों को लेकर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, ‘यह विधेयक 2023 में पास हुआ था। अब बात वादे को पूरा करने की है। संसद ने देश की महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया है। इस वादे को जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए।’

14 अप्रैल को देहरादून में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘4 दशकों से महिला-बेटियां अपने हक का इंतजार कर रही है। अब वह समय आ गया है। हम 2029 के चुनावों में उनका हक देकर रहेंगे।’
सवाल-4: दक्षिण के राज्यों ने आबादी काबू में रखी, तो क्या अब उनकी सीटें घटेंगी और हिंदी भाषी राज्यों की बढ़ेंगी?
जवाबः यह डर नया नहीं है। 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था।
आज भी यही चिंता है। दक्षिण के राज्यों ने परिवार नियोजन अपनाया, आबादी काबू में रखी, लेकिन जनसंख्या आधारित परिसीमन में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है।
तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर परिसीमन से राज्य को नुकसान हुआ तो 1950-60 के दशक जैसा आंदोलन होगा।
तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने दक्षिण के सभी मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर एकजुट होने और पीएम मोदी से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
इलेक्शन एनालिस्ट से पॉलिटिकल एक्टिविस्ट बने योगेंद्र यादव का कहना है कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर आनुपातिक परिसीमन हुआ तो केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पंजाब को नुकसान होगा, जबकि हिंदी भाषी राज्यों को फायदा। इससे संघीय ढांचे का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है।
केंद्र सरकार बार-बार भरोसा दे रही है कि राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं होगी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सीटों का बंटवारा परिसीमन आयोग करेगा और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होगा। इससे दक्षिण को नुकसान नहीं, फायदा होगा।
अनुपातिक प्रतिनिधित्व, यानी लोकसभा में राज्यों की मौजूदा हिस्सेदारी की हिसाब से परिसीमन में सीटें बांटी जाएंगी। उदाहरण से समझते हैं-
तमिलनाडु में अभी लोकसभा की 39 सीटें हैं, यानी अनुपातिक हिस्सेदारी हुई- (39/543) × 100 = 7.18%। अगर लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी, तो इस फॉर्मूले से तमिलनाडु की लोकसभा सीटें बढ़कर 61 हो जाएंगी।

सवाल-5: महिलाओं को आरक्षण कब से मिलेगा और परिसीमन कब लागू होगा?
जवाबः इसके लिए पहले परिसीमन आयोग बनेगा। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होते हैं। हर राज्य के लिए 5 लोकसभा और 5 विधानसभा सदस्य सहयोगी सदस्य होते हैं। हालांकि इन्हें वोट देने का हक नहीं होता।
भारत के पिछले चार परिसीमन आयोगों को अंतिम आदेश जारी करने में 3 से साढ़े 5 साल लगे थे। 2002 में शुरू हुआ परिसीमन 2008 में पूरा हुआ, यानी 6 साल में।
सरकार की कोशिश है कि यह सब 2029 के लोकसभा चुनाव तक लागू हो जाए। आरक्षित सीटें हर चुनाव में बारी-बारी बदलती रहेंगी। SC/ST कोटे की भी एक-तिहाई सीटें उसी वर्ग की महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी।
सवाल-6: क्या विधानसभाओं में भी महिला आरक्षण लागू होगा?
जवाबः हां। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) के तहत लोकसभा के साथ-साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
ज्यादातर राज्यों की विधानसभा सीटें 2001 की जनगणना पर आधारित हैं, असम और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर। पूर्वोत्तर के 4 राज्यों- नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल और मिजोरम में तो विधानसभा क्षेत्र 2001 से भी पुराने आधार पर हैं। इसलिए इन सभी जगहों पर भी नए सिरे से परिसीमन होगा।
सवाल-7: अगर परिसीमन आयोग का फैसला गलत लगे, तो क्या कोर्ट जा सकते हैं?
जवाबः परिसीमन आयोग के आदेश कानून की तरह लागू होते हैं। आर्टिकल 329 और परिसीमन अधिनियम 2002 की धारा 10 के तहत इनके खिलाफ अदालत में नहीं जाया जा सकता। संसद और विधानसभाएं भी इनमें बदलाव नहीं कर सकतीं।
हालांकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने किशोरचंद्र छगनलाल राठौर बनाम भारत सरकार मामले में एक अहम फैसला दिया।
कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 329 न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह खत्म नहीं करता। अगर कोई आदेश स्पष्ट रूप से मनमाना हो, समानता और निष्पक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हो या गलत इरादे से लिया गया हो, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट उसकी जांच कर सकते हैं। छोटे-मोटे सीमा बदलाव जैसे मुद्दों पर कोर्ट दखल नहीं देगा और यह भी ध्यान रखेगा कि उसकी वजह से चुनाव में देरी न हो।
हालांकि मीडिया रिपोर्ट है कि 2026 का परिसीमन आयोग ज्यादा ताकतवर होगा, जिसके फैसलों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

15 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर INDIA अलायंस की बैठक और प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। इसमें महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर पेश होने वाले बिलों पर चर्चा हुई।
सवाल-8: संसद में तीनों बिल पास होना कितना आसान या मुश्किल है?
जवाबः संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में ‘विशेष बहुमत’ चाहिए। यानी कुल 543 में से कम से कम आधे यानी 272 सांसद उपस्थित होने चाहिए। जितने भी सांसद उपस्थित हों, उनके दो-तिहाई का समर्थन। मान लीजिए सभी 543 सांसद मतदान करें, तो बिल पारित कराने के लिए 362 वोट चाहिए।
अभी NDA के पास 292 सांसद हैं। विपक्ष के 233। यानी अकेले NDA बिल नहीं पास करा सकता। विपक्ष का सहयोग जरूरी है।
BJP, कांग्रेस, JDU, LJP(R) समेत कई दलों ने व्हिप जारी कर दिया है। माना जा रहा है कि जैसे 2023 में महिला आरक्षण बिल बिना विरोध के पास हुआ था, वैसा इस बार होने की उम्मीद कम है।
क्योंकि विपक्षी गठबंधन INDIA का कहना है कि हम महिला आरक्षण के समर्थन में तो है, लेकिन परिसीमन के खिलाफ है। इसका हम संसद में विरोध करेंगे।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा, सरकार जो प्रस्ताव पेश कर रही है, उसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। जाति जनगणना को नजरअंदाज कर OBC, दलित और आदिवासियों के हक की चोरी हो रही है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर जैसे राज्यों के साथ किसी भी तरह का अन्याय हम बर्दाश्त नहीं करेंगे।
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जैसे बंगाली रसगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छूटती नहीं है। वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है। आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है। कांग्रेस ने 20 साल, CPI(M) ने 34 साल और TMC ने 15 साल। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। पूरी खबर पढ़िए…















