ब्लैकबोर्ड-जान बचानी थी, तो सिर पर बांध ली भगवा पट्टी:दंगे की तस्वीर ने मेरी जिंदगी बर्बाद की- हिंदुत्व का चेहरा बना, लेकिन मिला कुछ नहीं

21 Min Read




2002 गुजरात दंगे के दो पोस्टर बॉय की कहानी, जिनमें हिंदुत्व का चेहरा बने मोची अशोक परमार आज दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात सड़क पर सोते हैं। वे उस वक्त 27 साल के थे। आज 51 साल के हैं। उनसे मिलने मैं अहमदाबाद के शाहपुर इलाके पहुंचा- ‘केटी देसाई स्कूल’। बगल में एक नीम के पेड़ नीचे अशोक परमार की दुकान है- एक बंद अलमारी और नीचे रखा पतला, मटमैला गत्ता। आसपास के लोगों से पता चला कि वे सिविल हॉस्पिटल गए हैं- कुछ दिन पहले उन्हें लकवा मार गया है। मैं दुकान पर उनका इंतजार करता हूं। वह दो घंटे बाद लौटे- दुबले-पतले, फटी टी-शर्ट और पैंट पहने। लंगड़ाते हुए हाथ में दवाइयों से भरी थैली है। मैंने पूछा- आप ही अशोक परमार हैं? लाल आंख, काले-मुरझाए चेहरे से वो तेज आवाज में बोले- हां… वही, जिसे 2002 में हिंदुत्व का चेहरा बनाया गया था। अब भोजन से ज्यादा दवाइयां खाता हूं। थैली से दवाएं दिखाते हुए कहते हैं- ये दवाइयां तो सरकारी अस्पताल से मिल जाती हैं… लेकिन खाना? वह फ्री में नहीं मिलता। अब तो बस मौत का इंतजार है। पहले तो जूते-चप्पल सिलकर किसी तरह 50-100 रुपए कमा लेता था… अब लकवे ने वह भी छीन लिया’, इतना कहकर वे चुपचाप दुकान के बाहर झाड़ू लगाने लगते हैं। ब्लैकबोर्ड में आज अशोक परमार और कुतुबुद्दीन अंसारी की कहानी, जिन्हें 2002 गुजरात दंगे का पोस्टर बॉय बनाया गया। अशोक परमार को हिंदुत्व का चेहरा और कुतुबुद्दीन अंसारी को मुस्लिम दर्द का चेहरा, लेकिन उन तस्वीरों की वजह से आज दोनों की जिंदगी स्याह बन चुकी है। झाड़ू लगाने के बाद अशोक गमछा बिछाते हैं। मैं उनके साथ बातचीत के लिए बैठ जाता हूं। वे कहते हैं- जो बात करनी है, जल्दी कर लीजिए। यहां आप जैसे मीडिया वालों को देखकर लोग जुटने लगते हैं। मुझे खाना खाने भी जाना है। आज का खाना आप खिला देंगे क्या? मुझे तो रोज दो वक्त का खाना दूसरों से मांगना पड़ता है। पिछले साल दिसंबर में लकवा मार गया था, तो दो महीने दुकान बंद रही। पिछले महीने से ही इसे खोला है। मैंने कहा- चलिए, पहले खाना खा लेते हैं, फिर बात करेंगे। कहते हैं- नहीं-नहीं, पहले बात कर लीजिए। अब मुझे भूख कम लगती है। बस जिंदा हूं। इस जिंदगी से तंग आकर कई बार खुद को मारने की कोशिश की। डिप्रेशन की दवाइयों की ओवरडोज ली, लेकिन मरा नहीं। सांस है कि निकलती नहीं। अब सोचता हूं, खुद से नहीं मरूंगा, वर्ना लोग कहेंगे- अशोक कितना कायर था। उनकी हालत देखकर ताज्जुब होता है। दिमाग में गुजरात दंगे की वही तस्वीर उभर आती है- पीछे आग का गुबार और सामने काली शर्ट में माथे पर भगवा पट्टी बांधे और गुस्से में लोहे की रॉड उठाए यही अशोक परमार थे। अब मैं उन्हें पोस्टर बॉय बनाने वाली उस तस्वीर को दिखाते हुए पूछता हूं- इस तस्वीर में आप ही हैं? अशोक गुस्से में बोल पड़ते हैं- इसी फोटो ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। पता नहीं, उस मुंबई के पत्रकार को मैंने क्यों फोटो खींचने को कहा। दरअसल, यह गोधरा कांड के अगले दिन 28 फरवरी 2002 की बात है। सुबह के 10 बज रहे थे। शहर की सारी दुकानें बंद थीं। पता चला कि शाहपुर चौराहे के पास दंगाई तांडव मचा रहे हैं। मुस्लिम बस्तियों को आग के हवाले किया जा रहा है। चौराहे और सड़कों पर जलते टायर बिखरे हैं। यह पूरा इलाका मुसलमानों का है। थोड़ी देर बाद हल्ला मचा कि दंगाई मेरी दुकान की तरफ आ रहे हैं। उनके हाथ में पेट्रोल और जलते टायर हैं। मैंने तुरंत दुकान बंद की और अपने भाई के घर की तरफ भागा। उधर भी भीड़ थी। रास्ते में मुझे एक भगवा पट्टी गिरी दिखी। भीड़ से बचने के लिए मैंने उसे माथे पर बांध लिया, ताकि दंगाई समझ सकें कि मैं भी हिंदू हूं। जैसे ही शाहपुर चौराहे पर पहुंचा, एक फोटो पत्रकार मिला। वह बेचैन था। मुझे देखकर बोला, ‘मैं काफी देर से एक गुस्सैल चेहरे की तलाश में हूं, जो हिंदुत्व का गुस्सा दिखा सके। आपका चेहरा वैसा ही लग रहा है। पीछे आग की लपटें उठ रही थीं। मैंने सड़क पर पड़ी एक लोहे की रॉड उठाई और दोनों हाथ ऊपर उठाए और कहा- ‘मेरी फोटो खींच लो।’ उसने मेरी फोटो खींची और चला गया। मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि उस फोटो की वजह से मैं गुजरात दंगे का चेहरा बन जाऊंगा। अगले दिन मेरी वह फोटो टीवी पर गुजरात दंगाई के रूप में दिखाई जाने लगी। उस समय इलाके के लोगों को छोड़कर किसी को पता नहीं था कि वह शख्स मैं ही हूं। ‘आपके परिवार में कौन-कौन हैं?’ कोई नहीं। तभी तो 24 साल से इस सड़क पर जिंदगी बिता रहा हूं। इसी जगह चबूतरे पर सोता हूं। कोई खाना दे दे, तो भूख मिटा लेता हूं। अभी दो दिन पहले ही मेरी भाभी की मौत हुई है। वही भाभी, जिन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था। 1990 की बात है। 7वीं में पढ़ता था। पिताजी मोची का काम करते थे, लेकिन बीमार रहते थे। अचानक उनकी मौत हो गई। मां पहले ही गुजर गई थीं। कुछ समय तक भाई ने पिताजी का काम संभाला। हम दो भाई और दो बहनें हैं। दोनों की शादी हो चुकी थी। भाभी मुझे घर पर देखकर गाली-गलौज करती थीं। खाना नहीं देती थीं। कहतीं- जाओ, रुपए कमाकर लाओ, तब खाना मिलेगा। तुम पढ़ोगे और तुम्हारा भाई काम करेगा? उनकी बातें सुन-सुनकर परेशान हो गया था। एक दिन उनसे खूब लड़ा। भाई घर आए, तो उन्हें पता चला। उस दिन उन्होंने मुझे मारा और घर से निकाल दिया। गाली देते हुए बोले- तुम्हारी वजह से मेरी बीवी मुझे मारती है। अब लौटकर मत आना। उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और पिताजी की दुकान पर बैठने लगा। 5-10 रुपए की कमाई हो जाती, किसी तरह खाना खा लेता था। तब से इसी सड़क पर हूं। थोड़ा बड़ा हुआ, तो एक दूसरी बिरादरी की लड़की से प्यार हो गया। हम दोनों 5 साल साथ रहे। लड़की के घर वालों को जब पता चला, तो उन्होंने उसकी शादी कहीं और कर दी। मेरे पास कुछ था भी नहीं, शादी करके लाता, तो रखता कहां? इसलिए उसे जाने दिया। उसके बाद यह दंगा हो गया। ‘2002 गुजरात दंगे के बाद क्या हुआ?’ क्या बताऊं, उसके बाद तो जिंदगी दो जोड़ी कपड़ों में आ गई। टी-शर्ट, पैंट, जो अभी पहने हूं और एक जोड़ी इस अलमारी में है। रात में एक शख्स यहां अपनी ऑटो खड़ी करते हैं, उसी में सोता हूं। 2012 में दुकान के साथ मेरी एक तस्वीर वायरल हुई, तब पुलिस पकड़कर मुझे ले गई। मैंने सब सच-सच बता दिया। 14 दिन साबरमती जेल में रखा, उसके बाद छोड़ दिया। बाहर आया तो कुछ लोगों ने मुझे मारने की कोशिश की। गोली चलाई, लेकिन बच गया। अब सोचता हूं, मर ही गया होता, तो आज मौत का इंतजार न करना पड़ता। 2012 में मुझे खोजते हुए मीडिया के लोग यहां पहुंचे, तब से उनका तांता लगने लगा। मीडिया वाले आकर एक ही बात पूछते हैं। मन करता था कि भाग जाऊं, लेकिन कहां जाता? टीवी पर, नेताओं के भाषणों में, जहां भी गुजरात दंगे का जिक्र होता, मेरी तस्वीर दिखाई जाती। कई बार मैं हिंदू नेताओं के पास गया और कहा- हिंदुत्व के नाम पर मेरी तस्वीर इस्तेमाल करते हो, रहने के लिए एक छत ही दे दीजिए। कोई काम दे दीजिए, ताकि घर बसा सकूं। वे कहते- तुम्हें अपनी जाति का पता है…? और भगा देते। उसके बाद मैंने हिंदुओं के धार्मिक कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया। इस बातचीत के दौरान अब यहां लोग जमा होने लगे हैं। अशोक कई बार कह चुके हैं- अब रहने दीजिए। चलिए, खाना खिला दीजिए, वर्ना 3 बजे के बाद होटल बंद हो जाएंगे। हम दोनों ऑटो से खाना खाने निकल जाते हैं। वह बताते हैं- आप लोगों से बात करते हुए मुझे पुरानी बातें याद आने लगती हैं। सोचकर पागल हो जाता हूं। यहां लोग मुझे दो वक्त खाना खिला देते हैं। जरूरत पड़ने पर 50-100 रुपए भी दे देते हैं। राजस्थानी और मुस्लिम मेरी काफी मदद करते हैं। सोचिए, मुझे 5 करोड़ गुजरातियों का चेहरा बताया गया, लेकिन कोई पूछता नहीं। ऑटो रुकते ही एक होटल में जाते हैं। दोनों यहां खाना खाते हैं। लौटते हुए अशोक कहते हैं, ‘कुछ पैसे हों तो दे दीजिए, जेब में सिर्फ 20 रुपए हैं।’ मैं कुछ पैसे उनकी जेब में डालते हुए ‘सोनी की चाली’ इलाके की ओर निकल पड़ता हूं। गुजरात दंगे के दूसरे ‘पोस्टर बॉय’ कुतुबुद्दीन अंसारी के घर। कुतुबुद्दीन उस वक्त 28 साल के थे। यहां पहुंचने पर पता चला कि वह ऊपरी माले पर सिलाई का काम कर रहे हैं। एक पतली सीढ़ी से ऊपर पहुंचता हूं। मुझे देखते ही वह कहते हैं- जब कोई मुझे गुजरात दंगे का पोस्टर बॉय कहता है, तो दुख होता है। मेरा अपना नाम है। चाहता हूं कि लोग उसी नाम से बुलाएं। अब उन बातों पर चर्चा नहीं करना चाहता। मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं। जो बेटा दंगे के वक्त मेरी पत्नी की कोख में था, उसकी हाल ही में शादी हुई है। अब बेटा-बहू डांटते हैं कि अब्बू कब तक उन बातों को दोहराते रहोगे। अच्छा नहीं लगता… इसलिए अब उन सब के बारे में बात नहीं करना चाहता। कई बार गुजारिश करता हूं, तब वे बातचीत के लिए राजी होते हैं। ऊपर माले से नीचे आकर एक कमरे में बैठते हैं। बातचीत शुरू करते ही कहते हैं- उस तस्वीर ने मेरी पूरी जिंदगी चौपट कर दी। अब अल्लाह के करम से दो वक्त की रोटी खा रहा हूं और परिवार के साथ शांति से हूं। दरअसल, यहां नरोडा हाईवे के एक तरफ दंगा भड़का। उसके बाद जगह-जगह लाशें बिछ गईं। उनके हाथों में बम-बारूद, पेट्रोल और जलते हुए टायर थे- भयावह मंजर था। दंगाई सड़क पर मुसलमान को देखते ही तलवार से काट रहे थे। उस दिन अच्छा था कि पुलिस की एक गाड़ी पहुंची और हमें किसी तरह एक राहत कैंप में लेकर गई। वहां रहने-खाने की सुविधा नहीं थी। उस समय मेरी पत्नी 5 महीने की गर्भवती थी। गोद में डेढ़ साल की बेटी भी थी। ऐसा लग रहा था कि दंगाई कभी भी यहां आ सकते हैं। खैर, एक-दो दिन में दंगा थोड़ा शांत हुआ। लगा कि शायद सब ठीक हो रहा है। मैं पत्नी-बेटी को लेकर राहत कैंप से घर लौट आया। बस्ती में बमुश्किल दो-चार घरों में ही लोग बचे थे। कुछ मारे गए थे, बाकी भाग चुके थे। लेकिन 1 मार्च 2002 को दोपहर 2 बजे अचानक फिर से दंगाई पेट्रोल बम और तलवार लेकर बस्ती में पहुंचे। वे दुकानों में आग लगाने लगे। मुसलमान मिलता तो उसे मार देते। गर्भवती महिलाओं के पेट में तलवार घोंप रहे थे। मैं यह सब घर की दूसरी मंजिल की दीवार के एक झरोखे से देख रहा था। अब तय हो गया था कि दंगाई हमारे घर में भी घुसेंगे और मार देंगे। आखिरी वक्त में बस अल्लाह का नाम ले रहा था। तभी सामने से पुलिस की गाड़ी दिखी, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी बैठे थे। मैं झरोखे से जोर-जोर से चीख रहा था- साहब, बचा लो! जब लगा कि मेरी आवाज उन तक नहीं पहुंच रही, तो बालकनी में आकर चिल्लाने लगा। उसके बाद कुछ पुलिसकर्मी तुरंत गाड़ी से उतरे और मेरे पास पहुंचे। मैं उनके सामने हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगने लगा। उसी गाड़ी में बैठे एक पत्रकार ने मेरी रोती-बिलखती, हाथ जोड़े तस्वीर खींच ली। उसके बाद पुलिस हमें राहत कैंप में ले गई। अगले दिन मेरी तस्वीर पीड़ित मुसलमानों के चेहरे के रूप में अखबारों में छपी। एक-दो दिनों में यही तस्वीर हर जगह फैल गई। उसके बाद पत्रकार इस तस्वीर के जरिए मुझे खोजने लगे। राहत कैंप में कुछ पत्रकारों ने मुझे पहचान लिया। इसके बाद मेरी तस्वीर लगातार छपने लगी- एक तरफ हिंदुत्व के चेहरे के रूप में अशोक परमार की और दूसरी तरफ पीड़ित मुसलमान के रूप में मेरी। ‘आप उस वक्त भी सिलाई करते थे?’ हां, यह हमारा खानदानी काम है। दंगे से पहले मैं अहमदाबाद की एक बड़ी फैक्ट्री में काम करता था। वहां सुनील नाम का एक दोस्त था। वह मुझे घर से लेकर जाता और वापस छोड़ता भी था। 27 फरवरी को जब गोधरा कांड हुआ, तो शाम में फैक्ट्री में घोषणा हुई कि बाहर माहौल ठीक नहीं है। सभी घर चले जाएं। दंगा रुकने तक फैक्ट्री बंद रहेगी। उसके बाद मैं घर आ गया। जब मेरी फोटो आई, तो मीडिया और पार्टियों के नेता मेरे पास आने लगे। उस दौरान कई महीने तक इलाके में कर्फ्यू लगा रहा। यह नया घर 2008 में बनवाया था। इससे कुछ ही दूर मेरे हिंदू दोस्त सुनील का घर था, लेकिन उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया। फैक्ट्री में करीब एक साल काम किया था, लेकिन मालिक ने निकाल दिया। उनका कहना था- मीडिया वाले तुम्हारा इंटरव्यू ले रहे हैं, भीड़ लग रही है, इसलिए तुम्हें नहीं रख सकते। नौकरी गई, तो सोचा था कि काश उस दंगे में मर गया होता, तो यह न होता। दिन-रात मीडिया वाले घर के बाहर जमे रहते थे। काम-धंधा चौपट हो गया था, जहां भी गुजरात दंगों में मारे गए मुसलमानों की बात होती, मेरी ही तस्वीर दिखाई जाती। तंग आकर मैंने शहर छोड़ दिया और कोलकाता चला गया। तीन-चार साल वहां रहा, फिर चुपके से अहमदाबाद लौट आया। इसी बीच कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने बुलाकर कहा- गुमनाम रहने से कुछ नहीं होगा। जिंदा बचे हो, तो लोग पूछेंगे ही, इसी में जिंदगी बिताओ। इसके बाद मैंने 5,000 रुपए में पांच सिलाई मशीनें खरीदीं और घर पर काम शुरू कर दिया। लेकिन 13 सितंबर 2008 की बात है। दिल्ली में बम धमाका हुआ था। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने ली थी। उसने सरकार को एक मेल भेजा था, जिसमें लिखा था- ‘आंख के बदले आंख’, यानी गुजरात दंगों में मारे गए मुसलमानों का बदला लेंगे। मेल के नीचे मेरी फोटो लगा दी थी। अगले दिन सुबह 7 बजे से ही मीडिया के लोग मेरे घर जमा हो गए। पत्नी और बच्चे डर गए। शाम होते-होते मुझे पुलिस उठा ले गई, लेकिन कुछ स्थानीय लोगों की कोशिश से छोड़ दिया गया। 2013 में ‘राजधानी एक्सप्रेस’ फिल्म आई। उसमें मुझे आतंकवादी की तरह दिखाया गया। उसमें एक सीन में एक पुलिस अफसर के दफ्तर में मेरी फोटो लगी है, सामने एक आतंकी खड़ा है। पहले पुलिस मेरी तस्वीर पर बंदूक तानती है, फिर आतंकी को गोली मार देती है। फिल्म के बारे में दोस्तों ने बताया, तब मुझे पता चला। मैंने डायरेक्टर पर केस कर दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ और 2019 में मामला बंद कर दिया गया। मैंने उस पत्रकार से भी सवाल किया, जिसने मेरी फोटो खींची थी। उसके पास माफी के अलावा कोई जवाब नहीं था। नहीं पता था कि एक तस्वीर मेरी जिंदगी इस तरह बर्बाद कर देगी। खैर… मेरी बेटी के बच्चे की तबीयत खराब है, अब मुझे जाना होगा। शाम हो चुकी है।’ कहते-कहते वह सहम जाते हैं। कैमरा बंद करते ही कहते हैं, ‘सच कहूं, तो मुझे मोबाइल से भी डर लगता है। उस पर ऐसी ही खबरें देखकर परेशान हो जाता हूं। मेरी हालत तो फिर भी कुछ ठीक है, लेकिन अशोक का सब खत्म हो गया। वह महीने-पंद्रह दिन में खाना खाने मेरे घर आ जाता है। उसे कुछ पैसे दे देता हूं। अब क्या कर सकता हूं, मेरे भी बाल-बच्चे हैं। अब मैं 52 साल का हूं। ———————————————- 1- ब्लैकबोर्ड-वो बेटी जैसी थी, उसके पिता बोले-तूने इसका रेप किया: 25 साल बाद जेल से बरी, आज भी लगता है कोई मारने आ रहा है 57 साल के आजाद खान अपने भाई की किराने की दुकान पर बेसुध बैठे हुए हैं। तीन महीने पहले ही 25 साल बाद जेल से बाइज्जत बरी होकर आए हैं। अकेले में कुछ बुदबुदा रहे हैं। पूछने पर कहते हैं- पूरी जिंदगी काल-कोठरी में गुजार दी। अब किसी से क्या ही बात करूं, क्या ही बचा है! पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-हट्टा-कट्टा भर्ती हुआ, फौज ने विकलांग बनाकर भेज दिया:8 महीने कोमा में रहा, होश आया तो पता चला- मुझे आर्मी से निकाल दिया ‘डेढ़ महीने से मुझे ‘महाराजा’ पनिशमेंट दी जा रही थी, जिसमें सिर के बल डेढ़-डेढ़ घंटे रहना होता था। एक दिन मैं बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहा था। तभी एक जोरदार पंच मेरे सिर पर लगा और मैं गिर पड़ा। अफसर चिल्लाए- चेतन, उठो और लड़ो। मैंने कहा- अब नहीं लड़ पाऊंगा, सर। लेकिन उन्होंने कहा- नहीं चेतन, तुम्हें भिड़ना होगा। पूरी कहानी यहां पढ़ें



Source link

Share This Article
Leave a Comment