Tamil Protest Station Name Hindi

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‘अगर हिम्मत है, तो गोली चलाओ।’ हिंदी के विरोध में प्रोटेस्ट कर रहे लड़के ने सेंट्रल फोर्स के जवान को ललकारते हुए कहा। जवान ने उसके पैर में गोली मार दी। आसपास मौजूद लोग लड़के को अस्पताल ले गए। मरहम-पट्टी हुई, लेकिन वो लंगड़ाते हुए फिर सड़क पर आ गया। कुछ

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तमिलनाडु में इस लड़के को ‘अनडेड प्रोटेस्टर’ यानी जिंदा आंदोलनकारी माना जाता है। 1965 में ऑफिशियल लेंग्वेज एक्ट के विरोध में मदुरै से लेकर चेन्नई तक लोग सड़कों पर उतर आए थे। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेंट्रल फोर्स भेज दी। फायरिंग में 70 लोग मारे गए। विरोध में तीन लोगों ने खुद को आग लगा ली। ये प्रोटेस्ट ‘हिंदी विरोध’ और पोलाची नरसंहार के तौर पर जाना जाता है। इसके बाद तमिलनाडु से कांग्रेस खत्म हो गई और DMK ने अपनी जगह बना ली।

23 अप्रैल को तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग है। प्रचार के बीच एक रिपोर्टर ने CM स्टालिन से पूछा- केंद्र सरकार CBSE स्कूलों में 3 लैंग्वेज पॉलिसी लागू करेगी, हिंदी भाषा पढ़ना भी अनिवार्य होगा… स्टालिन ने फौरन जवाब दिया- ‘जब तक DMK है, तमिलनाडु में ऐसा नहीं होने देंगे।’

तो क्या तमिलनाडु में हिंदी विरोध अब भी है? पढ़िए ये रिपोर्ट…

केंद्र की प्रॉपर्टी पर हिंदी, राज्य की बिल्डिंग से गायब

भारत के 28 राज्यों में तमिलनाडु इकलौता है, जिसने अपने यहां तीन भाषा फॉर्मूला लागू नहीं किया। इसका असर चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही दिखने लगता है। बिल्डिंग पर तीन भाषाओं तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में बोर्ड लगा है। बड़े-बड़े अक्षरों में हिंदी में लिखा है- पुरट्चि तलैवर डॉ. एमजी रामचंद्रन सेंट्रल रेलवे स्टेशन। यहां से करीब आधा किमी दूर चेन्नई कॉर्पोरेशन की बिल्‍डिंग है। इस पर लगे बोर्ड से हिंदी गायब है, सिर्फ तमिल और अंग्रेजी लिखी है।

तमिलनाडु में भाषाई बंटवारे के दो प्रतीक, रेलवे स्टेशन का नाम हिंदी में लिखा है, लेकिन राज्य सरकार की बिल्डिंग का नाम अंग्रेजी और तमिल में है।

तमिलनाडु में भाषाई बंटवारे के दो प्रतीक, रेलवे स्टेशन का नाम हिंदी में लिखा है, लेकिन राज्य सरकार की बिल्डिंग का नाम अंग्रेजी और तमिल में है।

मैं रिपोर्टिंग के लिए भारत के ज्यादातर नॉन हिंदी राज्यों में गया हूं। थोड़ी बहुत हिंदी सभी को आती है। तमिलनाडु की सड़कों पर घूमते हुए हिंदी बिल्कुल नहीं सुनाई देती। ऑटो ड्राइवर से लेकर दुकानदार तक, किसी से बात करनी हो, तो बस अंग्रेजी विकल्प है।

चेन्नई सेंट्रल के ठीक सामने एक और रेलवे स्टेशन है चेन्नई पार्क। स्टेशन केंद्र सरकार की प्रॉपर्टी है, इसलिए यहां तीन भाषाओं में बोर्ड लगे हैं। यहां हिंदी में जो लिखा है, उस पर काला पेंट पोतने के निशान हैं। 11 मार्च को PM मोदी के तमिलनाडु दौरे के पहले हिंदी शब्दों पर ब्लैक पेंट स्प्रे कर दिया गया। नारे लगे ‘तमिल वाज्गा, हिंदी ओझिगा’ मतलब ‘तमिल जिंदाबाद, हिंदी मुर्दाबाद..’

चेन्नई पार्क रेलवे स्टेशन के हिंदी में लिखे नाम से ब्लैक स्प्रे साफ कर दिया गया है, लेकिन इसके निशान अब भी बाकी हैं।

चेन्नई पार्क रेलवे स्टेशन के हिंदी में लिखे नाम से ब्लैक स्प्रे साफ कर दिया गया है, लेकिन इसके निशान अब भी बाकी हैं।

भाषा को लेकर उग्र विरोध और कालिख पोतने की घटनाओं के पीछे राजनीतिक पार्टियां सीधे तौर पर शामिल नहीं होतीं, बल्कि छोटे प्रॉक्सी संगठनों का सहारा लेती हैं। चेन्नई पार्क की घटना के पीछे ‘मई-17’ नाम के संगठन की भूमिका थी। कहने को ये श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर काम करता है, लेकिन इस तरह के संगठन का सिर्फ नाम इस्तेमाल होता है। DMK इन घटनाओं का खुलकर समर्थन तो नहीं करती, लेकिन उसके कार्यकर्ताओं की भूमिका होती है।

चेन्नई पार्क रेलवे स्टेशन पर प्रोटेस्ट करने वाले लोगों की टी-शर्ट पर मई-17 लिखा हुआ था। मई-17 तमिल राष्ट्रवादी संगठन है। 17 मई, 2009 को श्रीलंका के गृहयुद्ध में तमिल संगठन लिट्टे की हार हुई थी। इसी तारीख पर संगठन का नाम है।

चेन्नई पार्क रेलवे स्टेशन पर प्रोटेस्ट करने वाले लोगों की टी-शर्ट पर मई-17 लिखा हुआ था। मई-17 तमिल राष्ट्रवादी संगठन है। 17 मई, 2009 को श्रीलंका के गृहयुद्ध में तमिल संगठन लिट्टे की हार हुई थी। इसी तारीख पर संगठन का नाम है।

तमिलनाडु में हिंदी विरोध 100 साल पुराना, लोग बोले- हिंदी बोझ है, ढोएंगे नहीं

इस तरह के प्रोटेस्ट में शामिल रहे DMK के एक कार्यकर्ता से हमने बात की। वे पार्टी की लेंग्वेज विंग में एक्टिव हैं। नाम नहीं बताना चाहते थे। सुरेश (बदला हुआ नाम) कहते हैं ‘तमिलनाडु के लोग अपनी भाषा को लेकर जज्बाती हैं। हम तमिल के अलावा कोई दूसरी भाषा पसंद नहीं करते। हिंदी थोपने को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।’

लेकिन सिर्फ तमिल से तो काम नहीं चलेगा, तमिलनाडु के बाहर कैसे बात करेंगे? सुरेश जवाब देते हैं, ‘हम अंग्रेजी से बाकी दुनिया से जुड़ सकते हैं। हिंदी बोझ है। इसे ढोने के लिए मजबूर किया जा रहा है।’

तमिलनाडु में हिंदी के विरोध की राजनीति करीब 90 साल पुरानी है। 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी के CM सी राजगोपालाचारी ने स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की थी। इसके खिलाफ तमिलनाडु में आंदोलन खड़ा हो गया। जस्टिस पार्टी के पेरियार ने पहली बार ‘हिंदी थोपना’ जुमले का इस्तेमाल किया। ये सबसे बड़ा नारा बन गया। 1965 में फिर लैंग्वेज एक्ट के विरोध में आंदोलन हुआ। तमिलनाडु में हिंदी हमेशा से वैकल्पिक भाषा ही रही।

DMK हो या थलापति सपोर्टर, हिंदी की जबरदस्ती के खिलाफ

चेन्नई में मिलीं 40 साल की विजयलक्ष्मी मदुरै के पास तिंदिवरन की रहने वाली हैं। तमिल भाषा को लेकर काफी इमोशनल हैं। कहती हैं, ‘तमिल मां की तरह है। हम इसमें स्वाभिमान देखते हैं।’

55 साल के केवी राजन चेन्नई से करीब 500 किमी दूर तिरुपुर में कार एसेसरीज का बिजनेस करते हैं। DMK को पसंद नहीं करते। सुपरस्टार थलापति विजय के समर्थक राजन कहते हैं, ‘तमिलनाडु में कोई पार्टी हिंदी लागू करने की वकालत करेगी, तो उसका कोई समर्थन नहीं करेगा।’

76 साल के रिटायर्ड कर्मचारी एम मुनियांडि भी ‘अनिवार्य हिंदी’ के विरोध में हैं। वे कहते हैं, ‘सेंटर के लोग हिंदी के साथ अनिवार्य लगाते हैं, ये उन्हें छोड़ना पड़ेगा। हिंदी बोलना ही भारतीय होने की इकलौती शर्त नहीं है।’

‘हिंदी सीखने से कॉन्फिडेंस आया, बोलने में मजा आता है’

ऐसा भी नहीं है कि तमिलनाडु में लोग हिंदी नहीं सीख रहे हैं। 1918 में महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में हिंदी को लिंक लैंग्वेज (जुड़ाव की भाषा) बनाने के लिए ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ की शुरुआत की। हम चेन्नई में इस संस्था के कैंपस पहुंचे। यहां हिंदी सीख रहीं तनुजा 8 साल से चेन्नई में रह रही हैं। हिंदी प्रचार सभा में बीएड की पढ़ाई कर रही हैं। हिंदी बोलती हैं, लेकिन अटकती जुबान से।

मद्रास यूनिवर्सिटी के MA हिंदी में सिर्फ 4 स्टूडेंट

हमने हिंदी प्रचार सभा में प्रोफेसर डॉ. मंजूनाथ से पूछा कि तमिलनाडु में तो टू लैंग्वेज पॉलिसी है, तो लोग क्यों हिंदी पढ़ने आते हैं? वे कहते हैं, ‘ये तमिलनाडु सरकार की पॉलिसी है। इस पर मेरा बात करना अच्छा नहीं होगा। मैंने महसूस किया है कि हर कोई हिंदी भाषा पढ़ना चाहता है। इससे बाकी देश के लोगों से जुड़ने में मदद हो सकती है।’

हालांकि, मद्रास यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग की हालत खराब है। मास्टर्स के कोर्स में सिर्फ 4 स्टूडेंट हैं। विभाग प्रमुख प्रोफेसर अन्नपूर्णा कहती हैं कि युवा पीढ़ी इंजीनियरिंग-मेडिकल की पढ़ाई करना चाहती है। कोई भाषा नहीं पढ़ना चाहता। हिंदी तो बहुत दूर की बात है, लोग तमिल तक पढ़ना नहीं चाहते।

‘हिंदी न बोलने वालों को दोयम दर्जे का नागरिक नहीं बना सकते’

हिंदी से जुड़े सवालों पर हमने DMK नेता एसएएस हफीजुल्लाह से बात की। वे बताते हैं, ‘हिंदी थोपने की कोशिश 90 साल से हो रही है। आप हिंदी न बोलने वालों को दोयम दर्जे का नागरिक नहीं बना सकते। थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के तहत यही कोशिश हो रही है।’

स्टेशन पर कालिख पोतना और उग्र प्रदर्शन करने से तमिलनाडु की क्या छवि बनेगी, क्या पार्टी इसके समर्थन में है? DMK नेता जवाब देते हैं,

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हम तीन भाषा फॉर्मूला का विरोध करने वाले हर लोकतांत्रिक विरोध का समर्थन करते हैं। आप तमिलनाडु में आकर हिंदी थोपने की कोशिश करेंगे, तो जवाब मिलेगा। अगर कोई कानून के खिलाफ जाता है, तो सरकार उसके खिलाफ एक्शन लेती है।

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क्या 80 हजार मंदिरों वाला तमिलनाडु सनातन विरोधी भी है?

CM स्टालिन के बेटे उदयनिधि 2023 में सनातन विरोधी बयान की वजह से विवादों में आ गए थे। उन्होंने कहा था, ‘सनातन का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे खत्म करना चाहिए… जैसे डेंगू, मलेरिया, कोरोना जैसी बीमारियों को खत्म किया जाता है।’ बाद में उन्होंने सफाई दी कि मैं किसी धर्म का दुश्मन नहीं हूं। मैं सनातन प्रथा के खिलाफ हूं।

क्या आम तमिल भी सनातन को लेकर ऐसा ही सोचते हैं, जबकि तमिलनाडु में देश के सबसे ज्यादा हिंदू मंदिर हैं। इस सवाल के जवाब में कारोबारी केवी राजन कहते हैं, ‘हम उदयनिधि के बयान के साथ नहीं है। ये सब राजनीति है। तमिलनाडु के लोग किसी धर्म के खिलाफ नहीं हैं। हम हिंदू हैं, लेकिन बच्चों के साथ वेलांकनी चर्च जाते हैं। दूसरे धर्म के लोग हमारे मंदिरों में भी आते हैं।’

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उदयनिधि हों या स्टालिन, सब पॉलिटिक्स की वजह से बयानबाजी करते हैं। उनके घर में पूजा होती है। घर के सामने श्रीवेणुगोपाल मंदिर हैं, उनकी मां इसी मंदिर में जाया करती थीं।

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सेलम के रहने वाले कारोबारी कनकराज कहते हैं, ‘हम हिंदू धर्म को मानने वाले लोग हैं। उदयनिधि ने ऐसा क्यों कहा हमें नहीं पता। लेकिन किसी भी धर्म को डेंगू, मलेरिया नहीं कहा जाना चाहिए। ये इलेक्शन का मुद्दा नहीं है। बात होगी सरकार के काम पर और हम उसी पर वोट करेंगे।’

तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग…

चेन्नई में मारवाड़ियों के इलाके से ग्राउंड रिपोर्ट… राजस्थानी बोले- हम तमिल बोलते हैं, तमिलों को हिंदी सिखा दी

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की मिंट स्ट्रीट पर एक बाजार है- सौकार पेठ। यहां राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के करीब डेढ़ लाख लोग रहते हैं। हिंदी विरोध की राजनीति करने वाली DMK ने यहां से मारवाड़ी को पार्षद का टिकट दिया, वे जीते भी। यहां रहने वालीं निर्मला राजपुरोहित राजस्थान से हैं। वे कहती हैं, हमने यहां तमिलों को हिंदी और मारवाड़ी सिखा दी। हमारे घर में नाश्ता भी इडली-सांभर ही होता है।’ पढ़िए पूरी खबर…



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