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Mon, Oct 12, 2026Updated 4:02 PM IST
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अमृतसर के दुर्ग्याणा तीर्थ में लंगूर मेला शुरू: संतान की मन्नत पूरी होने पर बच्चे बनते हैं लंगूर, 10 दिन तक निभाएंगे कठोर नियम

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पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में स्थित ऐतिहासिक दुर्ग्याणा तीर्थ के बड़े हनुमान मंदिर में रविवार से वार्षिक लंगूर मेले का शुभारंभ हो गया है। यह मेला अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और आस्था के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस मेले में वे बच्चे लंगूर का रूप धारण करके मंदिर पहुंचते हैं, जिनके माता-पिता ने संतान प्राप्ति की कामना को लेकर भगवान हनुमान से मन्नत मांगी थी और उनकी वह मनोकामना पूरी हुई थी। वंदे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, यह धार्मिक आयोजन लगातार दस दिनों तक चलेगा, जिस दौरान बच्चे अत्यंत कठोर नियमों और अनुशासन का पालन करते हुए अपनी आस्था प्रकट करेंगे।

दुर्ग्याणा तीर्थ अमृतसर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है, जिसे छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है। इस तीर्थ स्थल में स्थित बड़े हनुमान मंदिर में हर वर्ष लंगूर मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष भी रविवार से इस मेले की विधिवत शुरुआत हो गई है। मेले के पहले दिन से ही श्रद्धालुओं और विशेषकर उन परिवारों की भारी भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ पड़ी, जिन्होंने अपनी संतान को लंगूर के रूप में सजाने की तैयारी की थी। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बनी हुई है।

इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिन दंपतियों को संतान नहीं होती, वे दुर्ग्याणा तीर्थ के बड़े हनुमान मंदिर में आकर मन्नत मांगते हैं। जब उनकी संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे अपने बच्चों को लंगूर का रूप देकर मंदिर में लाते हैं। इन बच्चों को भगवान हनुमान के भक्त और उनके गणों के रूप में माना जाता है। बच्चों को लंगूर की तरह सजाने के लिए उन्हें विशेष प्रकार के कपड़े पहनाए जाते हैं, चेहरे पर लंगूर जैसी श्रृंगार की जाती है और उनके हाथों में डंडे या अन्य प्रतीकात्मक वस्तुएं दी जाती हैं। इसके बाद ये बच्चे लंगूर की भांति व्यवहार करते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं और भगवान हनुमान के समक्ष अपना शीश नवाते हैं।

लंगूर मेले में शामिल होने वाले बच्चों को दस दिनों तक अत्यंत कठोर नियमों का पालन करना होता है। यह अवधि उनके लिए साधना और अनुशासन का समय होती है। इन दस दिनों में बच्चों को कई प्रकार के नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता है, जो इस परंपरा का अभिन्न अंग हैं। हालांकि स्रोत में इन सभी विशिष्ट नियमों का विस्तृत ब्योरा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह दस दिवसीय अवधि बच्चों और उनके परिवारों के लिए पूर्ण आस्था और समर्पण का प्रतीक है। परिवार के सदस्य भी इन दिनों में बच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं ताकि कोई नियम न टूटे और धार्मिक परंपरा का सम्मान बना रहे।

अमृतसर शहर अपनी धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। जहां एक ओर स्वर्ण मंदिर सिख धर्म का प्रमुख केंद्र है, वहीं दूसरी ओर दुर्ग्याणा तीर्थ हिंदू धर्म की गहरी आस्था का प्रतीक है। लंगूर मेला इसी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक जीवंत उदाहरण है। यह मेला न केवल अमृतसर बल्कि पंजाब और आसपास के राज्यों से भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से यहां आते हैं ताकि वे इस ऐतिहासिक आयोजन का हिस्सा बन सकें और भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

मेले के दौरान मंदिर परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में उत्सव का वातावरण रहता है। धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का दौर लगातार चलता रहता है। बड़े हनुमान मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं। भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। संतान की मन्नत पूरी होने की खुशी में परिवार मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हैं और गरीबों तथा जरूरतमंदों में भोजन वितरित करते हैं, जो इस मेले की एक और महत्वपूर्ण सामाजिक परंपरा है।

यह दस दिवसीय लंगूर मेला समाज में आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को एक साथ जोड़ने का कार्य करता है। बच्चों द्वारा लंगूर का रूप धारण करना और कठोर नियमों का पालन करना यह दर्शाता है कि कैसे भारतीय समाज में धार्मिक प्रतिज्ञाओं और मन्नतों का कितना अधिक महत्व है। दुर्ग्याणा तीर्थ का यह मेला हर वर्ष इस बात की पुष्टि करता है कि बदलते समय के बावजूद लोगों की आस्था और सदियों पुरानी परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं। अमृतसर के इस ऐतिहासिक मेले का समापन दस दिन पूरे होने पर होगा, जिसके बाद बच्चे अपने सामान्य जीवन में लौट आएंगे, लेकिन उनके परिवारों के लिए यह अनुभव जीवन भर की आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक बना रहेगा।