Andhra Pradesh Birth Rate Policy; Chandrababu Naidu

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आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू ने 16 मई को कहा, ‘राज्य में तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार रुपए और चौथे के जन्म पर 40 हजार रुपए दिए जाएंगे। एक समय मैंने जनसंख्या कंट्रोल करने के लिए बहुत मेहनत की थी, लेकिन अब जन्म दर बढ़ाने की जरूरत है।’

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आखिर आंध्र प्रदेश सरकार क्यों चाहती है कि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें, क्या पैसे देने से जन्म दर बढ़ जाएगी और भारत जैसे सबसे बड़ी आबादी वाले देश में ये कितना सही; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: आंध्र प्रदेश में बच्चे पैदा होने पर पैसा मिलने की नई पॉलिसी क्या है?

जवाब: 16 मई को CM नायडू ने श्रीकाकुलम जिले में एक जनसभा के दौरान बच्चे पैदा करने पर पैसे देने की योजना की घोषणा करते हुए कहा, ‘बच्चों को बोझ नहीं, बल्कि देश की संपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। जनसंख्या ही भविष्य की असली दौलत है। जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों में घटती आबादी और बुजुर्ग होती जनसंख्या का इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ा है। इसीलिए मैं लंबे समय से जनसंख्या बढ़ाने पर जोर दे रहा हूं।’

दरअसल, आंध्र प्रदेश सरकार ने 5 मार्च को विधानसभा में एक नई पॉलिसी पेश की थी। इसे ‘जनसंख्या प्रबंधन नीति’ कहा गया। इसमें प्रस्ताव दिया था कि दूसरा बच्चा पैदा होने पर परिवार को 25 हजार रुपए मिलेंगे। अब तीसरे और चौथे बच्चे के पैदा होने पर पैसे की घोषणा को इसी नीति का विस्तार बताया जा रहा है। यानी अब 4 बच्चे पैदा होने पर कुल 95 हजार रुपए मिलेंगे।

नायडू ने अप्रैल 2025 में भी महिलाओं से ज्यादा बच्चों को जन्म देने की अपील की थी। साथ ही घोषणा की थी कि सरकारी महिला कर्मचारियों के बच्चों की संख्या चाहे जितनी हो, हर बच्चे पर 26 हफ्ते यानी 6 महीने की मैटरनिटी लीव मिलेगी।’

इसके पहले तक 6 महीने का मातृत्व अवकाश सिर्फ पहले दो बच्चों पर मिलता था। दो से ज्यादा होने पर 3 महीने की छुट्टी का नियम था।

नायडू सरकार की जनसंख्या प्रबंधन नीति के मुताबिक, 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को पैसे के अलावा कई दूसरी सुविधाएं भी मिलेंगी…

  • तीसरे बच्चे के लिए 5 साल तक हर महीने 1 हजार रुपए का पोषण भत्ता।
  • तीसरे बच्चे के लिए 18 साल की उम्र तक मुफ्त शिक्षा।
  • पिता के लिए अनिवार्य 2 महीने की पैटरनिटी लीव और जरूरत पड़ने पर 12 महीने तक की छुट्टी।
  • इनफर्टिलिटी यानी बच्चे को जन्म न दे पाने की समस्या से जूझ रहे दंपतियों के लिए राज्य समर्थित फर्टिलिटी क्लिनिक्स।

आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार ने बताया कि ‘सहायता राशि देने का मकसद प्रेग्नेंसी के दौरान हेल्थ फैसिलिटी, बच्चे की देखभाल और डिलीवरी के बाद कामकाजी महिलाओं को नौकरी या काम करने में मदद करना है।

इसके अलावा नायडू सरकार मौजूदा ‘तल्लीकी वंदनम योजना’ के विस्तार का भी प्लान बना रही है, जिसके तहत अभी स्कूल जाने वाले बच्चों की मांओं को हर साल 15 हजार रुपए दिए जाते हैं।

आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू ने 16 मई को श्रीकाकुलम जिले में एक जनसभा के दौरान बच्चे पैदा करने पर पैसे देने की घोषणा की।

आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू ने 16 मई को श्रीकाकुलम जिले में एक जनसभा के दौरान बच्चे पैदा करने पर पैसे देने की घोषणा की।

सवाल-2: नायडू सरकार क्यों चाहती है कि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें?

जवाब: CM नायडू के इस फैसले के पीछे आंध्र प्रदेश की आबादी से जुड़े तीन फैक्टर हैं…

1. बच्चे पैदा होने की दर 3 दशकों में आधी हुई

  • दरअसल, किसी राज्य या देश में औसतन एक महिला अपने जीवन में जितने बच्चों को जन्म देती है, उसे उस राज्य या देश की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) कहा जाता है।
  • अगर किसी राज्य में प्रति महिला TFR 2.1 हो, यानी अगर औसतन एक महिला 2.1 बच्चों को जन्म दे, तो इसे सामान्य ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ माना जाता है।
  • TFR का कॉन्सेप्ट 20वीं सदी में मॉडर्न डेमोग्राफी के विकास के साथ आया। तब यूरोप और अमेरिका के जनसंख्या वैज्ञानिकों ने माना कि अगर हर महिला सिर्फ 2 बच्चों को जन्म दे, तो वे माता-पिता को रिप्लेस कर देंगे, यानी उनकी जगह लेंगे।
  • हालांकि, कई बच्चे पैदा होने के कुछ महीनों या सालों के अंदर मर जाते हैं, कुछ महिलाएं बच्चों को जन्म नहीं दे पातीं या अपने प्रजनन की उम्र तक जिंदा नहीं रह पातीं। इसीलिए जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए TFR 2 से थोड़ा ज्यादा यानी 2.1 को ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ माना गया।
  • TFR 2.1 से ऊपर हो, तो इसे जनसंख्या वृद्धि माना जाता है और अगर इससे नीचे हो, तो ये माना जाता है कि राज्य में पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं।
  • जनसंख्या पर भारत सरकार की हालिया रिपोर्ट सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के मुताबिक, फिलहाल भारत का TFR 1.9 है। वहीं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश का मौजूदा TFR 1.5 के लेवल तक आ गया है, जो 1993 में 3.0 था।

2. महिलाओं की प्रजनन क्षमता कम हुई

  • 18 से 49 साल की उम्र वाली प्रति एक हजार महिलाओं पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या को किसी राज्य का जनरल फर्टिलिटी रेट, यानी GFR कहा जाता है।
  • आंध्र प्रदेश में GFR भी कम हुआ है। 2008-10 के बीच ये 63.8 था, वो 2018-20 में घटकर 52.9 रह गया। यानी 10 सालों में करीब 17% की कमी।

3. राज्य के लोगों की औसत आयु देश से 4 साल कम

  • आंध्र प्रदेश के लोगों की मौजूदा उम्र औसतन 32.5 साल है, जो राष्ट्रीय औसत आयु 28.4 साल से कम है। यानी आंध्र प्रदेश के लोग देश के मुकाबले ज्यादा बुजुर्ग है।
  • एक अनुमान के मुताबिक, अगर आंध्र प्रदेश की जनसंख्या नहीं बढ़ी, तो 2047 तक राज्य की 23% आबादी की उम्र 60 साल से ज्यादा हो सकती है।
  • आंध्र प्रदेश की श्री वेंकटेश्वर यूनिवर्सिटी में जनसंख्या विभाग के प्रोफेसर टी. चंद्रशेखरय्या के मुताबिक, ‘शहरी इलाकों की महिलाएं अब कम बच्चे पैदा कर रही हैं।’
  • सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड सोशल स्टडीज के मुताबिक, ‘आंध्र प्रदेश की 15 से 69 साल की कामकाजी आबादी भी 1981 के बाद से लगातार घट रही है।’

सवाल-3: क्या नायडू के इस फैसले के पीछे कोई राजनीतिक वजह?

जवाब: नायडू के इस फैसले को देश में संभावित लोकसभा सीटों के नए परिसीमन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार अप्रैल 2026 में परिसीमन बिल, 2026 ला चुकी है। हालांकि ये पास नहीं हो पाया था।

तब गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि सभी राज्यों की लोकसभा में कुल सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी। राज्यों में कुल सीटों में 50% की आनुपातिक बढ़ोत्तरी होगी। यानी जिस राज्य में जितनी सीटें हैं, उससे करीब डेढ़ गुना सीटें हो जाएंगी। हालांकि ये बात किसी बिल में नहीं थी।

वहीं दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन अपनाकर आबादी काबू में रखी है। उत्तरी राज्यों के मुकाबले इनकी आबादी कम है। इसलिए इन राज्यों को डर है कि जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से लोकसभा में उनकी सीटें उत्तरी राज्यों के मुकाबले कम हो जाएंगी। क्योंकि 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था।

2011 की जनगणना के मुताबिक, हिंदीभाषी राज्यों की औसत जनसंख्या वृद्धि दर 21.6%, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों में ये आंकड़ा 12.1% है।

दिलचस्प बात ये है कि जब केंद्र सरकार परिसीमन बिल लाई, तो नायडू ने इसका समर्थन किया। क्योंकि वो केंद्र सरकार में बीजेपी के साथ साझेदार हैं। जबकि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन, तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी और कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया इसका विरोध किया था।

केंद्र सरकार में शामिल होने के कारण नायडू की पार्टी टीडीपी ने परिसीमन बिल के समर्थन में वोट दिया, लेकिन नायडू राज्य की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं…

  • आंध्र प्रदेश में 1994 में दो बच्चों की सीमा लागू की गई थी। 2015 में नायडू जापान यात्रा से लौटने के बाद कहने लगे कि जापानी सरकार अपने लोगों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित कर रही है।
  • 2016 में उन्होंने कहा, ‘आंध्र प्रदेश पर जनसंख्या संकट मंडरा रहा है। अगर आप शादी नहीं करते और बच्चे पैदा नहीं करते, तो देश को रोबोट्स पर निर्भर रहना पड़ेगा, जो इंसानों का विकल्प नहीं बन सकते।’
  • दिसंबर 2024 में आंध्र प्रदेश सरकार ने वो कानून खत्म कर दिए, जिनके तहत दो से ज्यादा बच्चे वाले कैंडिडेट निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते थे। फिर 16 जनवरी 2025 को नायडू ने एक और प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के दो से कम बच्चे हैं, उन्हें स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाए।

इसके अलावा बीते महीने ही अमरावती आंध्र प्रदेश की आधिकारिक राजधानी बन गई है। नायडू अमरावती को मेगा सिटी बनाने के लिए यहां आबादी बढ़ाना चाहते हैं। ये उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है।

दरअसल, 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग हुए तेलंगाना को बतौर राजधानी हैदराबाद मिल गया। तब नायडू की सरकार ने विजयवाड़ा के पास कृष्णा नदी के किनारे एक नई राजधानी बनाने का फैसला किया और इसका नाम रखा- अमरावती।

इसमें 2050 तक 35 लाख लोगों को बसाने का टारगेट है। 2024 में टीडीपी के दोबारा सत्ता में आने के बाद अमरावती प्रोजेक्ट तेज हुआ है।

सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड सोशल स्टडीज, हैदराबाद के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. चिगुरुपाटी रामचंद्रैया कहते हैं, ‘नायडू की राज्य की जनसंख्या बढ़ाने की चिंता का संबंध उनके अमरावती को मेगासिटी बनाने के प्रोजेक्ट से प्रेरित है।’

हालांकि डॉ. रामचंद्रैया कहते हैं कि अमरावती की आबादी तेजी से बढ़ना आसान नहीं है। क्योंकि अमरावती जिन दो जिलों- गुंटूर और कृष्णा में बसा है, वहां जनसंख्या वृद्धि दर दो दशकों में तेजी से घटी है। अभी अमरावती शहर की आबादी सिर्फ 2.7 लाख है। पूरे कैपिटल रीजन की आबादी 58.1 लाख है। सिंगापुर के सलाहकारों का अनुमान है कि ये आबादी 20 साल में 1.01 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इतनी बढ़ोत्तरी होना बेहद मुश्किल है।

2024 में चंद्रबाबू नायडू चौथी बार आंध्र प्रदेश के CM बने। पिछले 3 कार्यकालों में उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण का समर्थन किया, लेकिन 2024 के बाद से वे जन्म दर बढ़ाने पर जोर देने लगे।

2024 में चंद्रबाबू नायडू चौथी बार आंध्र प्रदेश के CM बने। पिछले 3 कार्यकालों में उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण का समर्थन किया, लेकिन 2024 के बाद से वे जन्म दर बढ़ाने पर जोर देने लगे।

सवाल-4: क्या पैसे देकर जन्म दर बढ़ाई जा सकती है?

जवाब: भारत में प्रजनन दर बढ़ाने के लिए परिवारों को सीधे कैश बांटने की स्कीम पहली बार आंध्र प्रदेश में ही लाई गई है। हालांकि, दुनिया के कई देशों में ऐसे एक्सपेरिमेंट्स किए जा चुके हैं…

1. दक्षिण कोरिया: 26 हजार करोड़ खर्च, नतीजा उल्टा

  • 2021-25 के बीच नकद पैसे और मेडिकल फैसिलिटी जैसी स्कीम पर 280 करोड़ डॉलर यानी करीब 26 हजार 800 करोड़ रुपए खर्च किए। बच्चों के जन्म पर 3 लाख कोरियन वॉन यानी लगभग 19,200 रुपए तक दिए।
  • हालांकि, कोई फायदा नहीं हुआ। 2024 में प्रजनन दर 1.1 से गिरकर 0.72 पर आ गई।

2. हंगरी: GDP का 6% खर्च, फिर भी ज्यादा असर नहीं

  • हंगरी ने 2001 में अपनी GDP का करीब 6% हिस्सा इन योजनाओं पर खर्च करना शुरू किया।
  • इससे 2020 तक TFR 1.23 से बढ़कर 1.61 तक पहुंच गया। लेकिन 2024 में ये गिरकर 1.39 पर आ गया।

3. सिंगापुर: पहले बच्चे के जन्म पर 8 लाख रुपए से ज्यादा बांटे

  • 2001 में ‘बेबी बोनस स्कीम’ के तहत पहले और दूसरे बच्चे पर करीब 8.23 लाख रुपए मिलते हैं।
  • तीसरे बच्चे पर 13 हजार सिंगापुरी डॉलर, यानी करीब 9.73 लाख रुपए दिए जाते हैं।
  • हालांकि इससे प्रजनन दर में महज 0.1-0.2 की ही बढ़त हुई।

अमेरिका के विल्सन मेटरनल हेल्थ सेंटर की डायरेक्टर सारा बार्न्स के मुताबिक, ‘अगर सरकारें महिलाओं की शिक्षा, नौकरी और काम के अवसर करें, तो उसका असर सिर्फ ‘ज्यादा बच्चे पैदा करो’ जैसी नीतियों से ज्यादा अच्छा होगा।

दिसंबर 2024 में नीदरलैंड्स में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, ‘जब सरकार बच्चे पैदा करने पर आर्थिक मदद देती है, तो ज्यादातर लोग दोबारा बच्चे पैदा करने का फैसला नहीं करते, बल्कि जो लोग बच्चा चाहते थे, वे सिर्फ थोड़ा जल्दी बच्चा प्लान कर लेते हैं। इससे कुछ समय के लिए TFR बढ़ाता है, लेकिन लंबे समय में कोई खास फर्क नहीं पड़ता।’

सवाल-5: आबादी बढ़ाने के लिए नकद स्कीम का देश पर क्या असर होगा?

जवाब: भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। अप्रैल 2024 में इसने 141.26 करोड़ की आबादी वाले चीन को पीछे छोड़ दिया था।

संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था UNFPA के मुताबिक, अप्रैल 2025 तक भारत की जनसंख्या 146.39 करोड़ थी। रियल टाइम डेटा वेबसाइट वर्ल्डोमीटर के मुताबिक, मौजूदा समय में ये आंकड़ा 147 करोड़ से ज्यादा है। इसमें से करीब 68% आबादी युवा है।

भारत में UNFPA की प्रतिनिधि एंड्रिया एम. वोजनार के मुताबिक, ‘यहां बेहतर शिक्षा और मेटरनिटी हेल्थ केयर की मदद से प्रजनन दर कम करने में सफलता पाई है। 1970 में पांच बच्चे प्रति महिला से भारत आज लगभग दो बच्चे प्रति महिला पर खड़ा है।’

आंध्र प्रदेश में हर साल करीब 6.7 लाख बच्चे जन्म लेते हैं। जनसंख्या बढ़ने से पानी, घर और मेडिकल फैसिलिटीज जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा अभी राज्य के वर्कफोर्स में कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 31% हैं। ये हिस्सेदारी और घट सकती है। इस स्कीम को दूसरे दक्षिणी राज्य भी लागू कर सकते हैं। इससे देश की जनसंख्या और बढ़ सकती है, जिससे सरकार को योजनाओं पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा।

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रिसर्च- प्रथमेश व्यास

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