अररिया के सिकटी में 169 साल पुराना ढेंगड़ी दुर्गा मंदिर: सप्तमी पर सफेद और अष्टमी पर काले पाठे की बलि की प्राचीन परंपरा, 60 साल से एक ही पुरोहित करा रहे पूजा

बिहार के अररिया जिले में स्थित सिकटी प्रखंड का ढेंगड़ी गांव अपनी एक अनूठी और ऐतिहासिक धार्मिक पहचान के लिए जाना जाता है। इस गांव में मां दुर्गा का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थापित है, जिसका इतिहास करीब 169 साल पुराना है। वर्ष 1857 में स्थापित यह दुर्गा मंदिर आज भी आसपास के क्षेत्रों सहित दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के पावन पर्व पर इस मंदिर की रौनक और भक्तों की भीड़ देखते ही बनती है। इस मंदिर की विशेषता केवल इसकी प्राचीनता नहीं है, बल्कि यहां सदियों से चली आ रही अनूठी पूजा परंपराएं और अनुष्ठान भी हैं, जो इसे बिहार के अन्य दुर्गा मंदिरों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट बनाते हैं।
ढेंगड़ी गांव में स्थित इस मां दुर्गा के मंदिर की स्थापना वर्ष 1857 में हुई थी। भारतीय इतिहास के लिहाज से यह वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी वर्ष देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला सुलग रही थी। उस ऐतिहासिक कालखंड में स्थापित यह मंदिर आज भी अपनी उसी प्राचीन गरिमा और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ विद्यमान है। लगभग 169 वर्षों के लंबे सफर में इस मंदिर ने कई बदलाव देखे हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की मां दुर्गा के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि समय के साथ इस मंदिर की ख्याति और अधिक बढ़ी है। आज भी स्थानीय ग्रामीण और दूर-दराज से आने वाले भक्त इस मंदिर में माथा टेकने के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां दुर्गा से प्रार्थना करते हैं। मंदिर की वास्तुकला और वहां का शांत वातावरण भक्तों को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी और चर्चित विशेषता यहां नवरात्रि के दौरान दी जाने वाली बलि की परंपरा है। यह परंपरा अत्यंत विशिष्ट है और इसमें निश्चित नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है। मंदिर में प्राप्त जानकारी के अनुसार, नवरात्रि के महासप्तमी के दिन मां दुर्गा को सफेद रंग के पाठे (नर बकरे) की बलि दी जाती है। इसके बाद, महाअष्टमी के दिन काले रंग के पाठे की बलि देने की प्राचीन परंपरा है। सप्तमी और अष्टमी के दिनों में बलि के लिए पाठे के रंग का यह निर्धारण इस मंदिर की एक बहुत ही पुरानी और अटूट मान्यता का हिस्सा है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा और नियम-कायदे के साथ निभाया जा रहा है, जिस तरह से इसकी शुरुआत हुई थी। बलि की यह प्रथा स्थानीय आस्था का एक अभिन्न अंग मानी जाती है और हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस विशेष अनुष्ठान को देखने और मां का आशीर्वाद लेने के लिए इन दोनों दिनों में मंदिर परिसर में उमड़ पड़ते हैं।
ढेंगड़ी दुर्गा मंदिर की एक और बेहद खास बात यहां के पुरोहित हैं, जो पिछले छह दशकों से लगातार इस मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य कर रहे हैं। करीब 60 सालों से एक ही पुरोहित द्वारा पूजा कराए जाने का यह क्रम अपने आप में एक अनूठा उदाहरण है, जो मंदिर की परंपराओं के प्रति उनके समर्पण और गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। इतने लंबे समय से पूजा करने के कारण इन पुरोहित को मंदिर के हर एक रीति-रिवाज, अनुष्ठान और प्राचीन विधि-विधान की पूरी और गहन जानकारी है। वे बिना किसी चूक के सभी पूजा पाठ और अनुष्ठानों को उसी प्राचीन विधि के अनुसार संपन्न कराते हैं, जैसा कि पूर्वजों के समय से होता आ रहा है। पुरोहित की इस निरंतरता और समर्पण ने मंदिर की प्राचीन परंपराओं को जीवित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं का पुरोहित के प्रति गहरा सम्मान है, क्योंकि उनकी उपस्थिति में ही मंदिर की असली पहचान और पूजा की पूर्णता मानी जाती है।
अररिया जिले के सिकटी प्रखंड में स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ढेंगड़ी गांव के लिए यह मंदिर आस्था का सबसे बड़ा आधार है। नवरात्रि के नौ दिनों तक पूरा गांव और आसपास का क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूबा रहता है। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है और श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से लोग यहां मां दुर्गा के दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में मां दुर्गा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और उनकी हर विपत्ति को दूर करती हैं। यही कारण है कि 169 साल बीत जाने के बाद भी इस मंदिर की महत्ता और श्रद्धालुओं का जनसैलाब कम नहीं हुआ है।
वर्तमान समय में जब कई जगहों पर प्राचीन परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं या उनमें बदलाव आ रहे हैं, ऐसे में ढेंगड़ी के इस दुर्गा मंदिर ने अपनी मूल पहचान और सदियों पुरानी विधियों को पूरी तरह से संरक्षित करके रखा है। सप्तमी और अष्टमी पर निर्धारित रंग के पाठे की बलि हो या फिर 60 वर्षों से एक ही पुरोहित द्वारा पूजा का संचालन, ये सभी तथ्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि सिकटी प्रखंड के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं के प्रति कितने जागरूक और समर्पित हैं। वंदे भारत न्यूज़ की इस रिपोर्ट में प्रस्तुत जानकारी स्रोत सामग्री पर आधारित है, जो इस ऐतिहासिक मंदिर की अटूट आस्था और प्राचीन रीति-रिवाजों की जीवंतता को रेखांकित करती है।

