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Sat, Oct 10, 2026Updated 8:23 AM IST
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औरंगाबाद मेडिकल कॉलेज विवाद: मठ की जमीन पर निजी मेडिकल कॉलेज नहीं बनने देंगे, भाजपा नेता प्रवीण कुमार सिंह ने सरकार से की सरकारी कॉलेज निर्माण की मांग

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बिहार के औरंगाबाद जिले में प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पाटलगंगा मेडिकल कॉलेज से जुड़े इस मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता प्रवीण कुमार सिंह ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मठ की जमीन पर किसी भी हालत में निजी (प्राइवेट) मेडिकल कॉलेज नहीं बनने दिया जाएगा। उन्होंने राज्य सरकार से सीधी मांग की है कि जब जिले में सरकारी मेडिकल कॉलेज बनाने की घोषणा पहले ही की जा चुकी है, तो उसी घोषणा के अनुरूप यहां निर्माण कार्य कराया जाना चाहिए। यह पूरा मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

भाजपा नेता प्रवीण कुमार सिंह ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी है और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिले की जनता को स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अगर सरकार ने औरंगाबाद में सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने का वादा किया था, तो उसे उस वादे पर खरा उतरना होगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि मठ की भूमि पर निजी मेडिकल कॉलेज का निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके लिए वे हर स्तर पर विरोध करने को तैयार हैं। प्रवीण कुमार सिंह ने सरकार से आग्रह किया है कि वह अपनी पुरानी घोषणा के अनुसार ही काम करे और जिले को एक बेहतर सरकारी चिकित्सा संस्थान उपलब्ध कराए।

इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। औरंगाबाद जिले में पाटलगंगा क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज बनाने की योजना काफी समय से चर्चा में रही है। शुरुआती दौर में यह घोषणा की गई थी कि जिले में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना की जाएगी, ताकि स्थानीय लोगों को इलाज के लिए दूर-दराज के शहरों में न जाना पड़े। हालांकि, बाद में यह चर्चा सामने आई कि इस अस्पताल या मेडिकल कॉलेज का निर्माण पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर किया जा सकता है। पीपीपी मोड का मतलब है कि सरकार और निजी कंपनियां मिलकर इस परियोजना को पूरा करेंगी। लेकिन जैसे ही यह खबर फैली कि मठ की जमीन पर निजी मेडिकल कॉलेज बनाया जा सकता है, स्थानीय स्तर पर और राजनीतिक हलकों में विरोध शुरू हो गया।

पीपीपी मोड पर अस्पताल निर्माण की चर्चा ने इस पूरे मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है। भाजपा नेता प्रवीण कुमार सिंह ने इसी बदलाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को अपने फैसले में पारदर्शिता बरतनी चाहिए। यदि जिले की जनता के हित में सरकारी मेडिकल कॉलेज बनाने का फैसला लिया गया था, तो अब उसे निजी हाथों में देने या पीपीपी मोड के नाम पर मूल योजना से भटकने का कोई औचित्य नहीं है। उनका मानना है कि निजी मेडिकल कॉलेज बनने से आम जनता को महंगी स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी, जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेज होने से गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को सस्ती और बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी।

मठ की जमीन का मुद्दा भी इस विवाद में अहम भूमिका निभा रहा है। धार्मिक और सामाजिक महत्व वाली इस भूमि पर निजी संस्थान के निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों में भी असंतोष की भावना देखी जा रही है। भाजपा नेता ने इस बात पर जोर दिया है कि मठ की जमीन का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए जो जनहित में हो। निजी मेडिकल कॉलेज के निर्माण से न केवल जमीन के मूल स्वामित्व और उसके उद्देश्य पर असर पड़ेगा, बल्कि यह स्थानीय आस्था और भावनाओं के भी खिलाफ होगा। इसलिए उन्होंने साफ शब्दों में ऐलान किया है कि वे ऐसा नहीं होने देंगे।

औरंगाबाद जिला बिहार के उन क्षेत्रों में आता है जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को पटना या अन्य बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, जिसमें समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। कई बार रास्ते में ही मरीजों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। ऐसे में जिले में एक पूर्ण रूप से सुसज्जित सरकारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना स्थानीय जनता की सबसे बड़ी मांग है। जनता चाहती है कि सरकार अपनी घोषणा के मुताबिक जल्द से जल्द यहां सरकारी मेडिकल कॉलेज का निर्माण शुरू करे, ताकि उन्हें बुनियादी और उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं अपने ही जिले में मिल सकें।

भाजपा नेता प्रवीण कुमार सिंह द्वारा उठाए गए इन सवालों के बाद अब राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या पाटलगंगा मेडिकल कॉलेज का निर्माण पूरी तरह से सरकारी तंत्र के तहत होगा या फिर इसे पीपीपी मोड पर निजी एजेंसियों को सौंपा जाएगा। फिलहाल, इस विवाद ने औरंगाबाद की राजनीति को गर्मा दिया है। भाजपा नेता के इस कड़े तेवर और स्पष्ट घोषणा के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और मठ की जमीन पर प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज का भविष्य क्या होगा। जनता और राजनीतिक दल दोनों की नजरें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।