Bengal Naxalbari Election 2026; Maoist CPI(ML) Vs TMC BJP

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पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी, यहां की गलियों में आज भी ‘लाल’ रंग बिखरा है, बस उस रंग की चमक फीकी पड़ गई है। ये लाल रंग नक्सल आंदोलन की निशानी है। सबसे बड़ी निशानी लाल चारदीवारी वाला एक घर है। झंडे लाल, छत भी लाल। दीवार पर अंग्रेजी में लिखा है- कानू सान्

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कानू सान्याल टीन की छत वाले इसी घर में रहते थे। ये जगह नक्सलवाद की शुरुआत की गवाह रही। यहीं 1967 में किसान आंदोलन की योजना बनी और 23 मार्च 2010 को इसी घर में कानू सान्याल की डेडबॉडी मिली थी।

कानू सान्याल टीन की छत वाले इसी घर में रहते थे। ये जगह नक्सलवाद की शुरुआत की गवाह रही। यहीं 1967 में किसान आंदोलन की योजना बनी और 23 मार्च 2010 को इसी घर में कानू सान्याल की डेडबॉडी मिली थी।

कानू सान्याल के घर के बगल में एक कच्चा घर और है। अंदर एक चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और कुछ पुराने बर्तन हैं। ये शांति मुंडा की कुल जमा पूंजी हैं। 84 साल की शांति कभी कानू सान्याल की भरोसेमंद सिपाही थीं। 1967 में जब पुलिस की गोलियां चल रही थीं, तब 25 साल की शांति पीठ पर बेटी को बांधकर इंकलाब के नारे लगा रही थीं।

शांति अब लाठी के सहारे चलती हैं। हाथ जोड़कर मिलती हैं, लेकिन आवाज में वही पुरानी ठसक है। वे कहती हैं, ‘मोदी हों या ममता, कोई नक्सल आंदोलन को मिटा नहीं सकता। रूस, जर्मनी, चीन में देखिए। बहुत लोग मरे, लेकिन कम्युनिस्ट कभी न खत्म हुआ, न कभी होगा।’

शांति मुंडा नक्सल आंदोलन में एक्टिव रहीं महिलाओं में से एक थीं। हालांकि, वे पार्टी में जमीनी स्तर की भूमिका से ऊपर नहीं उठ पाईं। 1982 और 1987 में चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।

शांति मुंडा नक्सल आंदोलन में एक्टिव रहीं महिलाओं में से एक थीं। हालांकि, वे पार्टी में जमीनी स्तर की भूमिका से ऊपर नहीं उठ पाईं। 1982 और 1987 में चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।

नॉर्थ बंगाल की 54 सीटों में 30 BJP के पास, नक्सलबाड़ी में आज वोटिंग

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च को लोकसभा में कहा कि नक्सलवाद अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। इस दावे के बाद नक्सलबाड़ी में पहला विधानसभा चुनाव है। 23 अप्रैल यानी आज वोटिंग है।

दार्जिलिंग से करीब 60 किमी दूर बसा नक्सलबाड़ी 2011 से पहले सिलीगुड़ी विधानसभा सीट में था। 2008 में परिसीमन हुआ और 2011 में अलग माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी सीट बनी। तीन बार चुनाव हुए, जिनमें दो बार कांग्रेस जीती। 2021 में पहली बार BJP को जीत मिली। BJP मौजूदा विधायक आनंदमय बर्मन को दोबारा टिकट दिया है। TMC की तरफ से शंकर मलकार मैदान में हैं।

चाय बागानों के लिए मशहूर ये एरिया नॉर्थ बंगाल में आता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने नॉर्थ बंगाल की 54 में से 30 सीटें जीती थीं। TMC को 23 सीटें मिली थीं। इस बार BJP 32 से 38 सीटों पर मजबूत है। पहले फेज की 152 सीटों में 80 से 90 सीटों पर BJP आगे दिख रही है।

शांति का दर्द: नेताओं के पास बड़ी गाड़ियां, नातिन के पास ‘चाकरी’ नहीं

शांति मुंडा नक्सली संगठन की महिला समिति में थीं। कानू सान्याल के साथी चारू मजूमदार से बहुत प्रभावित थीं। दो बार चुनाव लड़ीं, लेकिन जीती नहीं। शांति कानू सान्याल के घर के बगल में रहती हैं।

नक्सल आंदोलन के बारे में क्या याद है? शांति कहतीं हैं, ‘सब याद है। जमीन की लड़ाई से कहानी शुरू हुई थी। जमींदारों ने एक बिगुल नाम के एक किसान का सिर फोड़ दिया था। जमीन की लड़ाई तब भी थी, आज भी है। हर जगह जमीन बिक रही है, ये लड़ाई खत्म नहीं होगी।’

‘अब नेता बदल गए हैं। पहले अपना काम देखते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की सोच है कि पहले जनता होनी चाहिए और नेता उनके पीछे। आजकल तो नेता जनता से आगे हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं। अगर हम भी चुनाव जीत गए, तो रावण राजा बन जाएंगे। मैं अब भी कम्युनिस्ट पार्टी के बुलाने पर मीटिंग में जाती हूं, लेकिन विचार अब अलग हो गए हैं।’

‘मोदी कहते हैं कम्युनिस्ट को खत्म कर देंगे, लेकिन ये मरेगा नहीं’

नक्सलबाड़ी में कम्युनिस्ट पार्टी पीछे रह गई हैं। TMC और BJP में मुकाबला है। इस पर शांति कहती हैं, ‘अरे ममता-मोदी सब एक ही हैं। लोग कहते हैं कि कम्युनिस्ट खत्म हो जाएगा। नरेंद्र मोदी भी बोलते हैं कि खत्म कर देंगे। करिए। पब्लिक है न। हम नहीं करेंगे, नेता भी नहीं करेंगे, जनता फैसला करेगी। कम्युनिस्ट कभी नहीं मरता है।’

मार्क्स, माओ, लेनिन, स्टालिन की मूर्ति; लोग बोले- लाल पार्टी खत्म

नक्सलबाड़ी में 25 मई, 1967 को पुलिस फायरिंग में 11 लोग मारे गए, जिनमें 8 महिलाएं और दो बच्चे भी थे। इस जगह शहीद बेदी (वेदी) बनी है। बीच में चारू मजूमदार की मूर्ति है। आसपास कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओत्से तुंग की मूर्ति है।

नक्सलबाड़ी में 1967 के किसान आंदोलन की याद में शहीद बेदी बनाई गई थी। यह जगह नक्सलवाद की शुरुआत का प्रतीक है।

नक्सलबाड़ी में 1967 के किसान आंदोलन की याद में शहीद बेदी बनाई गई थी। यह जगह नक्सलवाद की शुरुआत का प्रतीक है।

यहां मिले सुनील 1967 के आंदोलन के गवाह हैं। तब वे 13 साल के थे। सुनील कहते हैं, ‘यहां सिर्फ 5-6 भारतीयों की मूर्ति लगी है। बाकी विदेशी हैं। ये लोग खत्म हो गए। साल में एक बार यहां लोग फूल चढ़ाने आते हैं। इन लोगों ने पहले काम किया है। इन्हीं का खून बहा। धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। अब यहां TMC और BJP में मुकाबला है। कांग्रेस और लाल पार्टी खत्म हो गई।

‘नक्सलबाड़ी नाम सुनते ही लोग हमें नक्सली समझ लेते हैं’

नक्सलबाड़ी के रेलवे स्टेशन से मार्केट की तरफ जाने वाले रास्ते में दोनों तरफ पार्टियों के झंडे लगे हैं। कई दुकानों पर BJP और TMC के झंडे साथ दिखे। मिठाई की दुकान चलाने वाले सायन कुंडू बताते हैं, ‘यहां से जिसकी रैली निकलती है, वही अपना झंडा लगा देते हैं। हम झंडे नहीं लगाते।’

नक्सलबाड़ी नाम से कभी कोई दिक्कत होती है? सायन जवाब देते हैं, ‘हां, अक्सर होती है। मैं पढ़ाई के लिए बेंगलुरू गया था। वहां दोस्तों को बताया कि मेरा घर नक्सलबाड़ी में है। वे अजीब तरह से देखने लगे। नक्सलबाड़ी नाम सुनते ही नक्सली पर ध्यान जाता है। वे अब भी ऐसा ही सोचते हैं।’

नक्सलबाड़ी के मुद्दे…

चाय बागान में मजदूरी नहीं बढ़ी, आदिवासी एरिया में वोट कटने से गुस्सा

नक्सलबाड़ी के पास 40 से ज्यादा चाय बागान हैं। सभी मैदानी इलाके में हैं। पहाड़ी एरिया में 80 से ज्यादा बागान हैं। यहां के दो मुद्दे हैं। पहला काम के बदले सिर्फ 250 रुपए मजदूरी और वोटर लिस्ट से नाम कटना।

यहां मिलीं अनिता भगत कहतीं हैं,

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मेरे पति और बेटे का नाम वोटर लिस्ट में है। मेरा और देवर का वोट कट गया। हम चकरमाणी में रहते हैं। दिनभर चाय बागान में काम करते हैं, तब 250 रुपए कमाते हैं।

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नाम कटने पर राजा मुर्मू कहते हैं, ‘आदिवासी का मतलब ही है सबसे पुराना वासी। इसलिए आदिवासियों का नाम कटना नहीं चाहिए। आसपास 4 से ज्यादा बस्तियां हैं। हर परिवार में किसी न किसी का नाम कटा है। नाम कटने का मतलब है कि हमारा अस्तित्व ही काट दिया।’

एक्सपर्ट की राय: पहले फेज में BJP आगे दिख रही, वजह आदिवासी वोट

  • देबांजन बनर्जी: पहले फेज की 152 सीटों में BJP आगे दिख रही है। खासकर कूच बिहार, अलीपुरद्वार, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी में पार्टी काफी मजबूत है। नॉर्थ बंगाल BJP के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है। नक्सलबाड़ी और सिलीगुड़ी में कम्युनिस्ट-कांग्रेस कमजोर हो चुकी हैं। पिछला चुनाव BJP जीती थी। इस बार भी मजबूत है।
  • प्रभाकर मणि तिवारी: नॉर्थ बंगाल में BJP की आदिवासियों में अच्छी पकड़ है। दार्जिलिंग में गोरखा लोगों में पैठ है। 2011 और 2016 में यहां TMC मजबूत थी। 2019 के लोकसभा चुनाव से BJP उभरकर आने लगी। इसका फायदा 2021 के विधानसभा चुनाव में मिला। तब पहले फेज की 152 सीटों में BJP ने 58 सीटें जीती थीं। इस बार सीटें बढ़ सकती हैं।

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पश्चिम बंगाल चुनाव पर ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें…

हिंदू बाप-बेटे को काट डाला, बंगाल में चुनावी मुद्दा नहीं

11 अप्रैल 2025 को वक्फ संशोधन कानून के विरोध में मुर्शिदाबाद के जाफराबाद में रैली निकाली गई। बेकाबू भीड़ ने पारुल के पति हरगोविंद दास और बेटे चंदन को घर के सामने ही काट डाला। जाफराबाद में लोग इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बता रहे हैं और TMC को हटाने की बात कर रहे हैं, जबकि यहां से 142 किमी दूर मालदा में इसकी चर्चा भी नहीं है। पढ़ें पूरी खबर…



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