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Mon, Oct 12, 2026Updated 8:59 AM IST
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भरवाड़ा में दुर्गा पूजा के दौरान मिथिला के विलुप्त होते लोकनृत्य झिझिया की भव्य प्रस्तुति, सिर पर जलते दीपक वाली मटकी लिए कलाकारों ने बांधा समा

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बिहार के दरभंगा जिले के सिंहवाड़ा प्रखंड अंतर्गत भरवाड़ा में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अद्भुत नजारा देखने को मिला। यहाँ आयोजित दुर्गा पूजा महोत्सव में मिथिला के पारंपरिक और वर्तमान में विलुप्त हो रहे लोकनृत्य ‘झिझिया’ की विशेष प्रस्तुति दी गई। इस अनूठे और आकर्षक लोकनृत्य को देखने के लिए स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुति ने उपस्थित सभी दर्शकों को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर दिया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि क्षेत्र की लुप्तप्राय सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और उसे जन-जन तक पुनः पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम भी साबित हुआ।

भरवाड़ा में आयोजित इस दुर्गा पूजा कार्यक्रम के दौरान जब स्थानीय कलाकारों ने मंच पर प्रवेश किया, तो पूरे माहौल में एक अलग ही ऊर्जा और उत्साह व्याप्त हो गया। झिझिया नृत्य की सबसे बड़ी पहचान और इसकी कठिन शैली यह है कि इसमें कलाकार अपने सिर पर मिट्टी की मटकी रखकर नृत्य करते हैं, जिसके अंदर दीपक जल रहा होता है। इस बार भी कलाकारों ने ठीक इसी पारंपरिक शैली में अपने सिर पर जलते हुए दीपक वाली मटकी को पूर्ण संतुलन के साथ रखकर नृत्य की प्रस्तुति दी। सिर पर रखी मटकी में जलता दीपक अंधेरे में एक अत्यंत दिव्य और आकर्षक दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। कलाकारों ने बिना किसी सहारे के, केवल अपने सिर के संतुलन पर टिकी जलती हुई मटकी के साथ जिस कुशलता, निपुणता और लय से नृत्य किया, वह वास्तव में अत्यंत कठिन और सराहनीय था। इस प्रस्तुति को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कलाकारों के पैर जमीन पर नहीं, बल्कि किसी अन्य ही लोक में थिरक रहे हों।

इस पारंपरिक नृत्य के साथ ही मिथिला का प्रसिद्ध और ऐतिहासिक लोकगीत भी गाया गया। कलाकारों ने “झिझिया झिझिया उगईले रे” की पारंपरिक धुन पर अपनी प्रस्तुति दी। इस गीत की लयबद्ध और सुरीली धुन ने नृत्य के प्रभाव को कई गुना अधिक बढ़ा दिया। गायकों और नर्तकों के बीच का तालमेल इतना सटीक और बेहतरीन था कि उपस्थित दर्शक खुद को तालियाँ बजाने से रोक नहीं पाए। यह लोकगीत मिथिलांचल की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। आज के आधुनिक दौर में, जब डिजिटल मनोरंजन और पश्चिमी संस्कृति का तेजी से प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे पारंपरिक गीतों और नृत्यों का सार्वजनिक मंच पर प्रदर्शन अत्यंत दुर्लभ होता जा रहा है। इसलिए, भरवाड़ा में आयोजित इस प्रस्तुति ने बुजुर्गों को उनकी पुरानी यादों में खो जाने का अवसर दिया, वहीं युवा पीढ़ी को अपनी मौलिक संस्कृति से सीधे रूबरू होने का एक सुनहरा मौका प्रदान किया।

झिझिया नृत्य की इस भव्य प्रस्तुति को देखने के लिए आसपास के गाँवों और कस्बों से बड़ी संख्या में लोग भरवाड़ा पहुँचे थे। पूजा पंडाल और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। लोगों ने इस लोकनृत्य को बड़े ही ध्यान, उत्साह और श्रद्धा के साथ देखा। कई दर्शकों ने अपने मोबाइल फोन से इस अद्भुत और दुर्लभ सांस्कृतिक दृश्य को कैद किया ताकि वे इसे संजो कर रख सकें और दूसरों को भी दिखा सकें। स्थानीय निवासियों का कहना था कि उन्होंने बहुत समय बाद इस प्रकार का जीवंत और शुद्ध पारंपरिक नृत्य देखा है। इस नृत्य ने न केवल उन्हें बल्कि हर देखने वाले को भावविभोर कर दिया। लोगों ने कलाकारों की इस मेहनत, लगन और कलात्मक प्रतिभा की खुलकर सराहना की और उनका उत्साहवर्धन किया।

लोकनृत्य की इस शानदार प्रस्तुति के बाद, संध्या के समय दुर्गा पूजा की नियमित धार्मिक विधियाँ भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ संपन्न हुईं। संध्या आरती के दौरान पूरे माहौल में भक्तिमय और पवित्र वातावरण छा गया। ढोल, नगाड़े, मंजीरे और शंख की गूँजती मधुर ध्वनि के बीच माता रानी की जयकारे लगाए गए। “माता रानी की जय” और “जयकारा शेरों वाली” जैसे उद्घोषों से पूरा भरवाड़ा गूँज उठा। आरती के समय श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह चरम पर था। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने हाथ जोड़कर और आँखें बंद करके माता दुर्गा से अपने परिवार, समाज और पूरे क्षेत्र की शांति, सुख और समृद्धि की कामना की।

यह उल्लेखनीय है कि मिथिलांचल का झिझिया नृत्य मुख्य रूप से दुर्गा पूजा और अन्य शुभ त्योहारों के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह मिथिला की गहरी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का एक जीवंत दस्तावेज है। हालाँकि, बदलते समय, शहरीकरण और नई पीढ़ी की प्राथमिकताओं में आए बदलाव के कारण यह लोकनृत्य अब तेजी से विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुका है। ऐसे में भरवाड़ा के दुर्गा पूजा आयोजन में स्थानीय कलाकारों द्वारा इसकी भव्य प्रस्तुति देना एक अत्यंत सकारात्मक, प्रेरणादायक और आवश्यक कदम माना जा रहा है। इस पहल से जहाँ एक ओर आम जनता को अपनी भूली-बिसरी संस्कृति को फिर से जीवंत होते देखने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कलाकारों को भी अपनी कला का प्रदर्शन करने और सम्मान प्राप्त करने का एक उचित मंच उपलब्ध हुआ।