बिहार में इस बार नहीं पड़ेगी कड़ाके की ठंड: 1950 के बाद आ रहा सबसे विनाशकारी ‘सुपर अल-नीनो’, मौसम चक्र पर गहरा असर

पटना। बिहार सहित पूरे देश के मौसम चक्र को लेकर एक बड़ी और चिंताजनक जानकारी सामने आई है। प्रशांत महासागर (पैसिफिक ओशन) में एक बेहद शक्तिशाली ‘सुपर अल-नीनो’ का निर्माण हो रहा है, जिसका सीधा और व्यापक असर भारत के मौसम पैटर्न पर देखने को मिल सकता है। मौसम वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह सुपर अल-नीनो वर्ष 1950 के बाद अब तक का सबसे विनाशकारी साबित हो सकता है। इस वैश्विक जलवायु घटना के कारण बिहार में इस बार सर्दियों के मौसम का मिजाज पूरी तरह से बदला हुआ रहने की संभावना जताई जा रही है। राज्य में इस बार आम वर्षों की तुलना में कड़ाके की ठंड नहीं पड़ने का अनुमान है। तापमान में अपेक्षित गिरावट नहीं होने से न केवल आम जनजीवन प्रभावित होगा, बल्कि रबी सीजन की फसलों पर भी इसके गंभीर परिणाम देखे जा सकते हैं।
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्री सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति को दर्शाती है। जब यह गर्माहट अपने सामान्य स्तर से काफी अधिक बढ़ जाती है, तो इसे ‘सुपर अल-नीनो’ की श्रेणी में रखा जाता है। वर्तमान में प्रशांत महासागर में जो हलचल देखी जा रही है, वह पिछले कई दशकों में सबसे तीव्र मानी जा रही है। मौसम विभाग के अनुसार, 1950 के बाद से वैश्विक स्तर पर इतने शक्तिशाली सुपर अल-नीनो का निर्माण नहीं देखा गया था। इसका प्रभाव केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि यहां की खेती और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा मानसून और सर्दियों के मौसम पर निर्भर करता है।
बिहार के संदर्भ में बात करें तो इस सुपर अल-नीनो का सबसे प्रत्यक्ष असर आगामी सर्दियों के मौसम पर पड़ने वाला है। आमतौर पर बिहार में नवंबर के मध्य से लेकर फरवरी तक कड़ाके की ठंड पड़ती है, लेकिन इस बार मौसम का मिजाज कुछ अलग रहने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुपर अल-नीनो के कारण वायुमंडलीय दबाव और हवाओं के रुख में बदलाव आएगा, जिससे उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) की सक्रियता प्रभावित हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप बिहार में न्यूनतम तापमान में वह भारी गिरावट दर्ज नहीं होगी, जो आम तौर पर सर्दियों के दौरान देखी जाती है। दिन और रात के तापमान में अंतर कम रहेगा और ठंड की तीव्रता अपेक्षाकृत कम महसूस की जाएगी। हालांकि, मौसम विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि यह एक पूर्वानुमान है और स्थानीय भौगोलिक कारकों के आधार में तापमान में कुछ उतार-चढ़ाव संभव है।
सर्दियों में कड़ाके की ठंड न पड़ने का सबसे बड़ा खतरा बिहार की रबी फसलों पर मंडरा रहा है। बिहार में रबी सीजन के तहत गेहूं, चना, मसूर, सरसों, मटर और अन्य दलहन-तिलहन फसलों की बुवाई की जाती है। इन फसलों के बेहतर विकास, वानस्पतिक वृद्धि और अच्छी पैदावार के लिए सर्दियों में निश्चित अवधि तक ठंड पड़ना अत्यंत आवश्यक होता है। ठंड का मौसम फसलों को पोषक तत्वों को सोखने और उनके दानों को पुष्ट बनाने में मदद करता है। यदि इस बार पर्याप्त ठंड नहीं पड़ी, तो गेहूं की बालियां समय से पहले पक सकती हैं, जिससे दानों का आकार छोटा रह जाएगा और उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। इसी प्रकार, मसूर, चना और सरसों जैसी फसलों की उपज भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की आशंका है। किसानों के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि रबी फसलों की आय पर ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा टिका होता है।
इस विनाशकारी सुपर अल-नीनो के मद्देनजर कृषि वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। किसानों से अपील की गई है कि वे अपनी फसलों की बुवाई और देखभाल के तरीकों में आवश्यक बदलाव करें। ऐसे बीजों का चयन करने की सलाह दी जा रही है जो कम ठंड और बदलते तापमान के प्रति अधिक सहनशील हों। इसके अलावा, सिंचाई के समय और खाद-पानी के उपयोग में भी वैज्ञानिक मार्गदर्शन अपनाना जरूरी होगा। प्रशासन और कृषि विभाग से भी उम्मीद की जा रही है कि वे किसानों तक सटीक मौसम जानकारी समय-समय पर पहुंचाएं ताकि फसल नुकसान को कम से कम किया जा सके।
कुल मिलाकर, प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा यह सुपर अल-नीनो बिहार के लिए एक गंभीर जलवायु चेतावनी लेकर आया है। 1950 के बाद पहली बार आ रही इस विनाशकारी स्थिति ने न केवल मौसम वैज्ञानिकों बल्कि कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता भी बढ़ा दी है। बिहार में इस बार कड़ाके की ठंड न पड़ना केवल एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह रबी फसलों की सुरक्षा और किसानों की आजीविका के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। ऐसे में सभी संबंधित एजेंसियों और किसानों को इस वैश्विक जलवायु घटना के प्रभावों से निपटने के लिए अभी से पूरी तरह तैयार रहने की जरूरत है।

