बंगाल में बीजेपी की जीत के अलावा इस समय लोगों के मन में तीन बड़े सवाल हैं। असम में तीसरी बार बीजेपी की सरकार बनती क्यों दिख रही है, तमिलनाडु में सुपरस्टार विजय ने पहले ही चुनाव में इतना बड़ा करिश्मा कैसे कर दिखाया और चारों राज्यों में हार रही कांग्रे
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इन तीनों सवालों के जवाब और नतीजों का असर; जानेंगे इलेक्शन एक्सप्लेनर में…

असम में बीजेपी 95 सीटों पर जीतती दिख रही है। लेटेस्ट टैली ये रही-

असम में BJP की जीत के 4 बड़े फैक्टर
1. परिसीमन के बाद 36% मुस्लिम बहुल सीटें घटीं
- 2023 में असम में परिसीमन हुआ और विधानसभा सीटों की बाउंड्री दोबारा तय की गई। ST, SC की रिजर्व सीटें और बोडोलैंड ट्राइबल रीजन की सीटें बढ़ीं, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटें 41 से घटकर 26 रह गईं।
- 2011 की जनगणना में असम में 34% मुसलमान थे। अनुमान के मुताबिक यह अब 40% के करीब हो गए हैं। फिर भी उनकी सीटें घट गई हैं।
- बीजेपी नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ चुनाव में उतरी। बीजेपी के 90 उम्मीदावारों में कोई मुस्लिम नहीं था। साथी पार्टियों ने 36 में से 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोत गठबंधन ने 22 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे।
- राजनीतिक विश्लेषक अशोक मलिक के मुताबिक, ‘नई सीमाओं ने मुस्लिम बहुल इलाकों के प्रभाव को सीमित कर दिया। साथ ही उन सीटों को भी फिर से व्यवस्थित किया जहां असमिया मुसलमान कम हो रहे थे। इससे हिमंत को उन सीटों पर बढ़त मिली जहां पहले भाजपा कमजोर थी।’
2. कांग्रेस और AIUDF के मुस्लिम वोट बंटे, बीजेपी को फायदा
- 2021 में कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF ने साथ चुनाव लड़ा था। उन्हें बंगाली मुसलमानों के 89% तो असमी मुसलमानों के 65% वोट मिले थे। 2026 में यह दोनों धड़े अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं।
- बीजेपी की स्ट्रैटजी साफ थी कि मुस्लिम वोट बांटकर विपक्ष को होने वाले फायदे को घटाया जाए। बीजेपी ने असम के मूल मुसलमानों को भी अपने पाले में करने की कोशिश की।
- राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जयदीप बरुआ के मुताबिक, ‘हिमंता मुस्लिम समुदाय के भीतर दो गुट पैदा करने में सफल रहे हैं। पहले उन्होंने बांग्लादेश से आए ‘मियां मुसलमानों’ को असमी मुसलमानों के लिए खतरा बताया। फिर असमी मुसलमानों को विशेष दर्जा देकर, उन्हें अपने पाले में सुरक्षित कर लिया।’
3. हिमंता बिस्व सरमा की पॉपुलैरिटी और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
- हिमंता बिस्वा सरमा की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ वोट में कन्वर्ट हो गई। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाया। इससे असमी संस्कृति, परंपरा और भाषा को खतरा बताया। उन्होंने दावा किया कि हर हफ्ते 35-40 बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेज रहे हैं। इससे हिंदू वोटों में बीजेपी की पकड़ मजबूत होती चली गई।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट अदिप फुकन के मुताबिक, असम में पहली बार पूरा चुनाव हिमंता के चेहरे पर लड़ा गया। वे अपने तीखे बयानों से खुद को योगी जैसे कट्टर नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल हुए।
- अरुनोदोई योजना के तहत बांटे गए करीब 60 लाख कैश और चाय बागान की महिलाओं को एकमुश्त 5000 रुपए जैसी योजनाओं से महिलाओं ने बीजेपी को खुलकर सपोर्ट किया। इसके अलावा 15 लाख घर और 2 लाख नौकरियों के वादे ने भी जनता पर खासा असर डाला।
- 26 साल से असम में पत्रकारिता कर रहे राजीव दत्ता के मुताबिक, 10 साल सरकार में रहने के बाद भी बीजेपी के खिलाफ राज्य में खास एंटी-इनकम्बेंसी नहीं थी। कुछ सीटों पर पुराने विधायकों से लोग जरूर नाराज थे, लेकिन इससे खास अंतर नहीं पड़ा।
4. कांग्रेस के सीनियर नेता बीजेपी में आए
- चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के दो सीनियर नेता भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई ने बीजेपी जॉइन कर ली। इससे कांग्रेस का अंदरूनी कलह और राजनीतिक कमजोरी सामने आई।
- सरमा बार-बार कहते रहे कि कांग्रेस के अच्छे नेताओं को बीजेपी में लाना है। कांग्रेस नेता एक शेड्यूल के मुताबिक बीजेपी में शामिल होंगे।
- कांग्रेस ने इस बार पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई की लीडरशिप में चुनाव लड़ा। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मई 2025 में असम कांग्रेस अध्यक्ष बने गौरव हिमंता के सामने खुद को स्थापित नहीं कर पाए।
असम नतीजों का क्या असर होगा?
पूरे नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की पकड़ मजबूत होगी: हिमंता पहले ही अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय में BJP के विस्तार का काम कर चुके हैं। मेघालय, नागालैंड और सिक्किम में बीजेपी सहयोगी पार्टी है, जबकि मिजोरम में अभी एक छोटी पार्टी है। तीसरी बार असम जीतने का मतलब होगा कि नॉर्थ ईस्ट में उनका ‘हिंदुत्व मॉडल’ स्थापित हो रहा है।
हिमंता की राष्ट्रीय छवि चमकेगी: हिमंता बिस्वा सरमा का कद बढ़ेगा। अभी तक उन्हें नॉर्थ-ईस्ट की ही जिम्मेदारियां और अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार का काम दिया गया है। इस जीत के बाद केंद्र में भी उनकी भूमिका बढ़ सकती है।
नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट: कांग्रेस के सीनियर नेता लगातार बीजेपी में जा रहे हैं। इससे ग्राउंड कैडर और कार्यकर्ताओं में मोटिवेशन कम हो रहा है। ऐसे में नॉर्थ-ईस्ट में फिर से पार्टी को रिवाइव करना मुश्किल होगा।

तमिलनाडु में TVK 105 सीटों पर जीतती दिख रही है। मौजूदा टैली ये रही-

तमिलनाडु में TVK की जीत के 4 बड़े फैक्टर
1. फिल्म करियर के पीक पर रहते हुए राजनीति में एंट्री
- थलपति विजय तमिल फिल्मों के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में से एक हैं। मौजूदा दौर में वे अपने करियर के शिखर पर हैं। इसी स्टारडम के रहते उन्होंने 2024 में तमिलगा वेत्री कड़गम पार्टी (TVK) बनाई और 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा।
- तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से फिल्मी सितारों का प्रभाव रहा है। एम.जी. रामचंद्रन, शिवाजी गणेशन, जे. जयललिता, एम. करुणानिधि के बाद अब विजय भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं।
- विजय की पार्टी के ज्यादातर नेता DMK और AIADMK के बागी हैं। इससे ये साफ दिखा कि TVK को इतनी सीटें विजय के स्टारडम के बूते ही मिली हैं।
2. युवा और महिला वोटरों को साधने में सफल हुए विजय
- चुनाव प्रचार के दौरान युवाओं और महिलाओं में विजय को लेकर अलग तरह की दीवानगी देखने को मिली थी। ज्यादातर फर्स्ट टाइम और सेकंड टाइम वोटर्स उनकी फिल्में देखकर बड़े हुए हैं।
- विजय के चुनावी वादों ने भी इस वर्ग पर प्रभाव डाला, जिनमें दुल्हनों को 8 ग्राम सोना, नवजात बच्चों को सोने की अंगूठी, राज्य में 10 लाख नौकरी और प्राइवेट सेक्टर जॉब्स में 80% आरक्षण जैसी घोषणाएं शामिल थीं।
- तमिलनाडु में युवा और महिला वोटर्स की कुल संख्या लगभग 2 करोड़ बनती है, जो करीब 20-30 सीटों पर सीधा असर डालती है। TVK इन्हें अपने पाले में करने में सफल हुई है।
- राजनीतिक विश्लेषक आर रंगराज कहते, ‘विजय ने चुनाव के पहले 2-3 महीने जबरदस्त मेहनत की। उन्होंने टिकट बांटने में भी काफी चतुराई से काम लिया उन्होंने ना तो कोई योजना बताई, ना विचारधारा। अगर एक लाइन में कहें तो विजय ने सिर्फ अपने चेहरे और अपील के दम पर ये चुनाव जीता है।’
3. DMK के गढ़ में सेंधमारी की, वोट काटे
- DMK अब तक तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी थी। 2021 के चुनाव में उसे राज्य के तीन हिस्सों- सेंट्रल, नॉर्थ और कावेरी डेल्टा रीजन से सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
- इन तीनों इलाकों की सीटों पर उसका वोट प्रतिशत 45% से ज्यादा रहा था। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि विजय ने DMK के इन्हीं वोटों में सेंधमारी की है। इनमें से ज्यादातर शहरी सीटें हैं, जहां युवा और महिला वोटरों की खासी आबादी है।
- एक्सपर्ट्स ये भी मानते हैं कि TVK ने इन क्षेत्रों में दलित और अल्पसंख्यक (ईसाई और मुस्लिम) वोटरों में ज्यादा पकड़ बनाई है, जो कुल वोटर्स का लगभग 26% हैं।
4. पारंपरिक पार्टियों से ऊबे वोटर्स के लिए तीसरा विकल्प बनकर उभरे
- विजय चुनाव के पहले त्रिची के सेंट एंथोनी चर्च गए, महाबलीपुरम में क्रिसमस इवेंट कराया। वे चुनाव के बाद मुरुगन मंदिर और शिर्डी भी गए। विजय की धार्मिक यात्राओं में उनका साथ सबसे ज्यादा साथ युवाओं और फर्स्ट टाइम वोटर्स ने दिया।
- इनमें से ज्यादातर वो लोग हैं, जो तमिलनाडु में 70 के दशक से चली आ रही दो पार्टियों की राजनीति से ऊब चुके हैं। विजय इन वोटर्स के लिए एक ‘तीसरा विकल्प’ बनकर उभरे हैं।
- तमिलनाडु के लगभग 2 दशक से पत्रकारिता कर रहे शब्बीर अहमद बताते हैं, ‘DMK और AIADMK ने शुरुआत में TVK को बड़ा किरदार नहीं माना। हालांकि, अंदरखाने उन्होंने दोनों पार्टियों से असंतुष्ट वोटरों को साधा, जिससे उनकी सीटें बढ़ीं।’

तमिलनाडु नतीजों का क्या असर होगा?
- INDIA गठबंधन कमजोर होगा: तमिलनाडु INDIA गठबंधन का सबसे मजबूत गढ़ रहा है, जहां DMK और कांग्रेस का वोट शेयर 2021 में 45% से अधिक था। विजय की जीत से केंद्र में अलायंस को मिलने वाली 39 लोकसभा सीटों की ताकत घट सकती है।
- तमिलनाडु में त्रिकोणीय राजनीति का उदय: तमिलनाडु में पहली बार तीन ध्रुवीय चुनाव देखने को मिला और तीनों पार्टियों ने 30 फीसदी के आस-पास वोट हासिल किए हैं। इससे राज्य में नए गठबंधन बन सकते हैं और मौजूदा गठबंधन टूट भी सकते हैं।
- 2029 लोकसभा चुनाव और परिसीमन: अगले लोकसभा चुनाव में DMK-कांग्रेस और BJP दोनों विजय को अपने पाले में करना चाहेंगी। विजय पहले ही केंद्र के परिसीमन प्रस्ताव का विरोध कर चुके हैं, जिससे वे दक्षिण की सीटों के समीकरण को करेंगे।

केरलम में कांग्रेस की अगुआई वाली UDF 60 सीटों पर जीतती दिख रही है। मौजूदा टैली ये रही-

केरलम में UDF की जीत के 4 बड़े फैक्टर
1. LDF की 10 साल की एंटी-इनकम्बेंसी
- केरलम में 1977 से 2016 तक हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ है। 2021 में यह ट्रेंड बदला और लगातार दो बार लेफ्ट की सरकार बनी।
- लेकिन 10 साल एक ही सरकार रहने के बाद ट्रेंड फिर वापस आ गया। इसकी झलक पहले लोकसभा इलेक्शन में दिखी, जहां UDF ने 18 और LDF ने सिर्फ 1 सीट जीती थी।
- फिर दिसंबर 2025 के लोकल बॉडी इलेक्शन में भी UDF को 38.81% वोट के साथ बढ़त मिली। LDF को 33.45% वोट मिले।
- LDF ने 81 साल के हो चुके पिनरई विजयन के नाम पर ही चुनाव लड़ा, जिससे यह मैसेज भी गया कि लेफ्ट के पास विजयन के अलावा और कोई चेहरा नहीं है।
2. मुस्लिम और ईसाई वोटों का एकजुट होना
- 2011 की जनगणना के मुताबिक केरलम में 26.6% मुस्लिम आबादी है और 18.4% ईसाई यानी दोनों मिलकर करीब 45% वोटर्स।
- जिस पार्टी ने इन्हें साध लिया समझो चुनाव जीत गए। मुस्लिम वोटर्स का झुकाव हमेशा से UDF की तरफ रहा है। 2021 में 58% मुस्लिम वोट UDF और 37% LDF को मिले थे।
- हिंदू वोटर्स को साधने के चक्कर में LDF के हाथों से मुस्लिम वोटर्स भी निकल गए।
- लोकल बॉडी इलेक्शन में यह ट्रेंड देखने मिला था कि मुस्लिम और ईसाई वोटर्स ने एक जुट होकर UDF का समर्थन किया। विधानसभा चुनाव में ही यह ट्रेंड कांग्रेस की जीत की चाबी बना।
- सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के डायरेक्टर डॉ. धनुराज बताते हैं, ‘कई सर्वे बता रहे हैं कि इस बार माइनॉरिटी एकजुट होकर UDF को वोट किया है। पिछले इलेक्शन में यही वोट LDF को मिला था, जिससे UDF कमजोर पड़ गई थी।
3. LDF विवादों में घिरी
- केरलम के सीएम पिनरई विजयन के परिवार पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं।
- सबरीमाला मंदिर से सोने की चोरी मामले में अब तक 9 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। इसमें CPI(M) नेता ए. पद्मकुमार भी शामिल है।
- राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में यह मुद्दा उठाकर कहा था कि जो सरकार भगवान अयप्पा का सम्मान नहीं कर सकती, केरलम के लोगों का सम्मान क्या करेगी?
4. BJP ने हिंदू और ईसाई वोट काटे
- 2021 के केरलम विधानसभा चुनाव में 21% हिंदुओं ने बीजेपी को वोट दिया था। 49% ने LDF और सिर्फ 25% ने UDF को। कांग्रेस हिंदुओं की पहली पसंद नहीं रही, लेकिन बीजेपी के आने से LDF को मिलने वाले हिंदू वोट कट गए।
- ऐसे ही 2021 में LDF को 37% और UDF को 57% ईसाई वोट मिले थे। बीजेपी ने यहां भी सेंध मारी, जिसका फायदा कांग्रेस को हुआ।
केरलम नतीजों का क्या असर होगा?
देश में एक भी लेफ्ट नेतृत्व की सरकार नहीं रहेगी: पूरे देश में केरलम इकलौता राज्य है जहां लेफ्ट सत्ता में है। LDF की हार से देश में वामपंथ के अस्तित्व पर खतरा होगा।
बीजेपी के लिए स्कोप बनेगा: इस चुनाव में बीजेपी बड़ा नंबर नहीं ला पाई, लेकिन उसने वोट काटने का काम किया है। बीजेपी ने हिंदुओं और ईसाइयों को साधकर लेफ्ट और UDF दोनों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। लेफ्ट के कमजोर होने से बीजेपी को यहां पैर जमाने का मौका मिलेगा।
दक्षिण में कांग्रेस मजबूत होगी: दक्षिण भारत में अभी कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस सरकार है। अब केरलम में भी जीत के साथ दक्षिण में कांग्रेस और मजबूत होगी। ——————-
ग्राउंट इनपुट्स
- केरलम से गौरव पांडे
- तमिलनाडु से वैभव पलनीटकर
- असम से उदय भटनागर
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पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार होगी। दोपहर 1 बजे तक के रुझानों में बीजेपी 184 सीटों के साथ बहुमत से कहीं आगे है, जबकि टीएमसी 91 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 2021 के मुकाबले बीजेपी के महज 7% वोट बढ़े, लेकिन सीटें 117 बढ़ती दिख रही हैं। पढ़ें पूरी खबर…















