मदुरै से करीब 15 किमी दूर तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी है। इसकी तलहटी में भगवान मुरुगन का मंदिर है और शिखर पर सूफी संत सिकंदर बदुशा की दरगाह। दरगाह के पास दीपम (कांसे से बना बड़ा दीपक) जलाने के विवाद से ये इलाका दक्षिण भारत का ‘अयोध्या’ बन चुका है। बीते 6 मह
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तमिलनाडु में भगवान मुरुगन वैसे ही पूजे जाते हैं, जैसे उत्तर भारत में भगवान राम, महाराष्ट्र में गणपति और बंगाल में मां काली। मान्यता है कि तिरुपरनकुंद्रम उनके छह पवित्र निवासों में पहला है, जहां उन्होंने देवयानी से विवाह किया था। इसीलिए ये मंदिर दक्षिण भारत में शादी से जुड़ी मुरादें पूरी करने के लिए मशहूर है।

तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग हैं। उससे पहले ही तिरुपरनकुंद्रम धार्मिक अधिकारों की लड़ाई का अखाड़ा बन चुका है। तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति पहले कभी नहीं हुई। फिर भी BJP ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की है।
1 दिसबंर को मद्रास हाईकोर्ट ने पहाड़ी के शिखर पर दीपम जलाने की अनुमति दी थी। DMK ने इसे चुनौती दी। पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहे तमिलनाडु BJP अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन और सीनियर लीडर एच. राजा समेत 113 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। 1 मार्च को PM मोदी भी मंदिर में दर्शन के लिए आए थे।

PM मोदी 1 मार्च को पहली बार तिरुपरनकुंद्रम पहुंचे थे। मंदिर के पुजारियों ने उन्हें पूर्ण कुंभम सम्मान दिया था।
छोटा सा कस्बा हिंदुत्व की प्रयोगशाला, 91% हिंदू आबादी 2011 की जनगणना में तिरुपरनकुंद्रम की आबादी 48,810 थी। ये बढ़कर करीब 70 हजार हो गई है। 91.8% आबादी हिंदू है और 3.6% मुस्लिम। मंदिर के आसपास की गलियों में हिंदू-मुस्लिम मिलकर रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि कस्बे में धर्म के आधार पर इलाके बंटे हों, लेकिन मंदिर के पास जाते ही ये बंटवारा दिखने लगता है।
पुलिस ने बैरिकेड लगाकर दरगाह का रास्ता बंद कर दिया है। आने-जाने वालों से पूछताछ होती है। एक पुलिसवाले ने हमें भी सीढ़ियों से पहले रोक लिया। बोला- आगे जाने के लिए ऊपर से परमिशन लेनी होगी। परमिशन के लिए थाना इंचार्ज को फोन किया, तो उन्होंने कहा, ‘आदेश है कि मीडिया और गैर मुस्लिमों को दरगाह तक नहीं जाने देना है।’

ये सीढ़िया दरगाह की तरफ जाती हैं। रास्ते इसी तरह बैरिकेड के जरिए बंद किए गए हैं।
‘विवाद शुरू हुए डेढ़ साल हो गए, मुस्लिमों से रिश्ते नहीं बदले’ दरगाह जाने के रास्ते में जयराजमणि मिले। ऑटो ड्राइवर हैं। कहते हैं, ‘18 महीने से विवाद शुरू हुआ है। माहौल थोड़ा अलग हो गया है। हमेशा मंदिर में ही दीप जलाया गया है। वही परंपरा आज भी है। एक-दो साल से अचानक मांग होने लगी कि दीपम दरगाह के पास जलाया जाना चाहिए। इससे तो माहौल खराब ही होगा न।’
‘मुस्लिमों से हमारे रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया है। BJP और RSS वोट के लिए इसे हवा दे रहे हैं, लेकिन हमारे लिए ये मुद्दा नहीं है। हमारे लिए असली सवाल यह है कि चुनाव कौन जीतेगा, DMK या AIADMK। इस सीट से DMK ने कृथिका थंगपंडियान और AIADMK ने मौजूदा विधायक वीवी राजन चेल्लपा को टिकट दिया है।’

‘दीपम पहाड़ी पर ही जले, दरगाह नाजायज’ मंदिर के सामने 45 साल से मालाएं बेच रहीं प्रसन्नकुमारी ने यहां का माहौल बदलते देखा है। वे कहती हैं, ‘मैं तिरुपरनकुंद्रम में हो रहे अन्याय पर चुप नहीं रह सकती। DMK सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दावा करती है। कार्तिगई (तमिल हिंदुओं का त्योहार, जब घरों और मंदिरों में दीये जलाए जाते हैं) के समय सैकड़ों श्रद्धालुओं को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोक दिया। वे पहाड़ी पर बने दीपस्तंभ पर दीप जलाने जा रहे थे।’

ये प्रसन्नकुमारी है। कहती हैं कि सरकार जिस अव्यवस्था का डर दिखाती है, वह पुलिस ने पैदा की है। सभी रास्ते बंद कर दिए। सिर्फ इसलिए ताकि खास वोट बैंक नाराज न हो जाए।
मंदिर के सामने मिले सुंदरमूर्ति करीब 40 साल से यहां आ रहे हैं। दीपम के मसले पर तेज आवाज में कहते हैं, ‘ये मुद्दा बिल्कुल सही है। दीपम पहाड़ी के शिखर पर ही जलाया जाना चाहिए। ये हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा है। दरगाह नाजायज है।’
पी. मुरुगन की पीढ़ियां मंदिर में रहते आई हैं। उनका नाम भगवान मुरुगन के नाम पर रखा गया। पेशे से टेलर मुरुगन की राय सुंदरमूर्ति से अलग है। वे कहते हैं, ‘यह सिर्फ उन लोगों का मुद्दा है, जो समाज में फूट डालना चाहते हैं। हिंदू हो या मुस्लिम हम हर त्योहार साथ मनाते हैं। मंदिर का उत्सव हो या दरगाह का, हम वहां जाते हैं और वे यहां आते हैं।’
फिर अचानक इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया? मुरुगन जवाब देते हैं, ‘यह चुनाव से जुड़ा मामला है। कुछ लोग धर्म का इस्तेमाल कर वोट लेना चाहते हैं। बाहर से लोगों को लाकर विरोध करवाया जा रहा है, ताकि ऐसा लगे कि हिंदू और मुस्लिम आपस में लड़ रहे हैं।’

मुस्लिम बोले- हमारे दिलों में कोई बैर नहीं, लोग विवाद से थक चुके मुरुगन के पड़ोस में रहने वाले सैयद इब्राहिम मस्जिद से नमाज पढ़कर निकले थे। हमें अपनी कपड़े की दुकान पर ले गए। वे कहते हैं, ‘सदियों से यह पहाड़ी शांति और सौहार्द का प्रतीक रही है। एक तरफ भगवान मुरुगन का मंदिर है और ऊपर पवित्र दरगाह। हमारे दिलों में इस विवाद का कोई असर नहीं पड़ा है। यहां के लोग सच्चाई जानते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में भी यह मामला साफ है।’
जैनुलाबुद्दीन 40 साल पहले तिरुपरनकुंद्रम में आकर बसे थे। वे कहते हैं कि मैंने इस विवाद के बारे में कभी नहीं सुना। यहां हिंदू दरगाह जाते हैं और मुस्लिम मंदिर के रथ उत्सव में शामिल होते हैं। परिवार की तरह साथ रहते हैं।’
क्या इस विवाद का असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ेगा? जैनुलाबुद्दीन जवाब देते हैं, ‘कुछ लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इससे थक चुके हैं। हम चाहते हैं कि चुनाव पानी, सड़क और रोजगार जैसे मुद्दों पर हो, न कि इस बात पर कि दीप कहां जलाया जाए।’

दीपम जलाने की मांग के पीछे हिंदू मुन्नानी संगठन हिंदू मुन्नानी नाम का संगठन दीपम को दरगाह के पास जलाने की मांग उठाता रहा है। वही इस मामले को कोर्ट में ले गया। संगठन के अलगारसामी सेल्वाराज 15 साल से इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं। कई बार दरगाह के पास दीपम जलाने की कोशिश करते हुए हिरासत में लिए गए हैं। उन पर 12 FIR दर्ज हैं।
सेल्वाराज RSS और BJP के समर्थक हैं। वे दावा करते हैं कि PM मोदी 1 मार्च को मंदिर आए थे, तब मैंने उनके स्वागत में 1 लाख रुपए खर्च कर पूरे मदुरै में पोस्टर लगवाए थे।
सेल्वाराज कहते हैं-
ये पहाड़ी भगवान मुरुगन की है। इस पर हिंदुओं का ही हक है। ऊपर बना स्ट्रक्चर गैरकानूनी है और हटकर रहेगा। DMK से जुड़े नेताओं ने तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी को सिकंदर हिल कहकर विवाद पैदा किया।

हमने सेल्वाराज से पूछा कि ये पहाड़ी भगवान मुरुगन की है, इसके समर्थन में आपके पास क्या सबूत हैं? सेल्वाराज कहते हैं, ‘तमिल साहित्य साबित करता है, लंदन से लेकर मद्रास हाईकोर्ट तक अदालतों ने माना है कि यह पहाड़ी भगवान मुरुगन की है। तमिल राजाओं के समय से लेकर आज तक के प्रशासनिक रिकॉर्ड भी यही पुष्टि करते हैं।’

एक्सपर्ट बोले- तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति कभी नहीं चली सीनियर जर्नलिस्ट डी. सुरेश कुमार मंदिर-दरगाह विवाद पर कहते हैं, ‘तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिमों के बीच विवाद की स्थिति नहीं रही। द्रविड़ राजनीति के बड़े किरदारों पेरियार, अन्नादुरै, करुणानिधि, जयललिता जैसे नेताओं ने कभी विवाद की राजनीति को हवा नहीं दी। DMK कहता है- वुन्द्रै कुडम, उर्वदे देवम। मलतब कि हम सब एक हैं और हमारे देवता एक ही हैं। तमिलनाडु के मुसलमान भी तमिल बोलने वाले ही हैं। उर्दू बोलने वाले बहुत कम हैं।’
वहीं, स्थानीय पत्रकार राहुल कहते हैं कि तिरुपरनकुंद्रम मंदिर विवाद का चुनाव में खास असर नहीं होगा। यहां लोग धार्मिक हैं। हर गली-नुक्कड़ पर मंदिर है, लेकिन लोग राजनीति में धार्मिक मुद्दे शामिल करने को पसंद नहीं करते।
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लोग बोले- हिंदी हम पर बोझ, तमिल हमारी मां

भारत के 28 राज्यों में तमिलनाडु इकलौता है, जिसने अपने यहां तीन भाषा फॉर्मूला लागू नहीं किया। इसका असर चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही दिखने लगता है। बिल्डिंग पर तीन भाषाओं तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में बोर्ड लगा है। करीब आधा किमी दूर चेन्नई कॉर्पोरेशन की बिल्डिंग है। इस पर लगे बोर्ड से हिंदी गायब है। यहां के लोग तमिल भाषा को लेकर इमोशनल हैं। चेन्नई में मिलीं 40 साल की विजयलक्ष्मी कहती हैं, ‘तमिल मां की तरह है। हम इसमें स्वाभिमान देखते हैं।’ पढ़िए पूरी खबर…















