CM पद के लिए कांग्रेस में गुटबाजी नहीं: प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत बोले- सभी एक टीम के खिलाड़ी, जल-जंगल-जमीन आदिवासियों की पहचान, भाजपा छीन रही अधिकार

वंदे भारत न्यूज़, जगदलपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत ने राज्य की राजनीति और आदिवासी अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर किसी प्रकार की गुटबाजी नहीं है। सुखदेव भगत ने कहा कि कांग्रेस के सभी नेता और कार्यकर्ता एक ही टीम के खिलाड़ी हैं, जो मिलकर संगठन और जनता के हित में काम कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने और उनसे उनके जल, जंगल और जमीन के अधिकार छीनने का काम कर रही है।
कांग्रेस प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत ने आंतरिक गुटबाजी की अटकलों पर विराम लगाते हुए कहा कि कांग्रेस एक अनुशासित और लोकतांत्रिक पार्टी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी में कोई विवाद या खेमेबंदी नहीं है। उनके अनुसार, पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं। सुखदेव भगत ने इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि सभी नेता एक टीम के खिलाड़ी हैं। जैसे खेल के मैदान पर पूरी टीम एक साथ मिलकर जीत के लिए प्रयास करती है, उसी तरह कांग्रेस के सभी सदस्य संगठन को मजबूत करने और जनता की सेवा करने के लिए एकजुट होकर काम कर रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्य की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन और गुटबाजी को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। प्रदेश प्रभारी के इस स्पष्टीकरण से पार्टी कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश देने का प्रयास किया गया है।
इसके अलावा, सुखदेव भगत ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज के अधिकारों का मुद्दा उठाया, जो छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में हमेशा से एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संसाधन या आर्थिक लाभ का जरिया नहीं हैं। भगत ने गहराई से समझाते हुए कहा कि ये तत्व आदिवासियों की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जिंदगी का अभिन्न हिस्सा हैं। जल, जंगल और जमीन से ही उनकी पहचान जुड़ी हुई है और इन्हीं के आधार पर उनकी जीवनशैली और परंपराएं टिकी हुई हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन संसाधनों पर से आदिवासियों का नियंत्रण समाप्त हो गया, तो उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
सुखदेव भगत ने भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची का विशेष उल्लेख किया, जो आदिवासी क्षेत्रों में शासन और अधिकारों के संरक्षण के लिए बनाई गई है। उन्होंने बताया कि पांचवीं अनुसूची के तहत ग्राम सभाओं को विशेष और महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। ग्राम सभाएं आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने, संसाधनों के प्रबंधन और सामुदायिक विकास में सबसे प्रमुख भूमिका निभाती हैं। संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था इसलिए की थी ताकि आदिवासियों के परंपरागत अधिकारों और उनके स्वायत्त शासन मॉडल की रक्षा की जा सके।
हालांकि, कांग्रेस प्रदेश प्रभारी ने आरोप लगाया कि वर्तमान में भाजपा सरकार द्वारा इन संवैधानिक प्रावधानों को कमजोर किया जा रहा है। सुखदेव भगत ने कहा कि पांचवीं अनुसूची में ग्राम सभा को जो अधिकार प्राप्त हैं, उन्हें भाजपा के शासनकाल में निरंतर कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका सीधा आरोप था कि भाजपा सरकार आदिवासियों के अधिकारों को छीन रही है और उनके संवैधानिक संरक्षण को समाप्त करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं की शक्तियों में कटौती करना वास्तव में आदिवासी समाज की आवाज को दबाने और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करने जैसा है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी अधिकार और जल-जंगल-जमीन का मुद्दा हमेशा से केंद्र में रहा है। राज्य की कुल जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनुसूचित जनजाति वर्ग से आता है, विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा जैसे संभागों में आदिवासियों का बहुमत है। ऐसे में आदिवासी अधिकारों की रक्षा और ग्राम सभाओं के सशक्तिकरण का मुद्दा न केवल सामाजिक न्याय से जुड़ा है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला एक प्रमुख कारक भी है। सुखदेव भगत के इस बयान से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस आगामी समय में आदिवासी अधिकारों और पांचवीं अनुसूची के संरक्षण को अपना प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाने की तैयारी कर रही है।
सुखदेव भगत ने अपनी बात रखते हुए यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस पार्टी आदिवासी समाज के साथ खड़ी है और उनके अधिकारों के हनन का हर स्तर पर विरोध करेगी। उन्होंने भाजपा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक ग्राम सभाएं मजबूत नहीं होंगी और आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन पर पूरा अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी रहेगी। प्रदेश प्रभारी के इस दोहरे बयान—एक तरफ पार्टी की आंतरिक एकता का दावा और दूसरी तरफ भाजपा पर आदिवासी विरोधी होने का आरोप—ने छत्तीसगढ़ के राजनीतिक परिदृश्य में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अब देखना यह होगा कि इस बयान पर भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और राज्य के आदिवासी समाज इन राजनीतिक दावों को किस रूप में स्वीकार करता है।

