डिंडौरी CMHO कार्यालय में 60 लाख से अधिक की वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा, जांच रिपोर्ट के बाद क्लर्क निलंबित और प्रभारी सीएमएचओ को नोटिस

वन्दे भारत न्यूज़। मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं का गंभीर मामला सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2024 तक के बीच इस कार्यालय में कुल 60 लाख 65 हजार 590 रुपये के फर्जी और अवैध भुगतान किए जाने की पुष्टि हुई है। इस पूरे मामले की विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद जिला प्रशासन ने त्वरित और सख्त कार्रवाई करते हुए एक क्लर्क को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इसके अलावा, उस दौरान कार्यरत तत्कालीन प्रभारी सीएमएचओ को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यह घटना जिले के स्वास्थ्य विभाग की वित्तीय व्यवस्था और आंतरिक निगरानी तंत्र पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
जानकारी के मुताबिक, यह पूरी वित्तीय गड़बड़ी लगभग सात साल के लंबे समय तक बिना किसी रोक-टोक के चलती रही। वर्ष 2017 से 2024 के बीच किए गए भुगतानों में भारी अनियमितताएं पाई गई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि इन सात वर्षों में बिलों का उचित सत्यापन या जांच किए बिना ही उन्हें पास कर दिया जाता रहा। सरकारी कार्यालयों में किसी भी भुगतान से पहले बिलों की कई स्तरों पर जांच होना एक अनिवार्य और मानक प्रक्रिया होती है, लेकिन डिंडौरी के सीएमएचओ कार्यालय में इस बुनियादी नियम को ताक पर रखकर लगातार अवैध भुगतान किए जाते रहे। इस लापरवाही के परिणामस्वरूप सरकारी खजाने को 60 लाख 65 हजार 590 रुपये का भारी नुकसान पहुंचा है।
इस मामले में जांच रिपोर्ट में तीन अधिकारियों और कर्मचारियों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि, अभी तक सभी आरोपितों के नामों का सार्वजनिक रूप से पूरा विवरण नहीं दिया गया है, लेकिन जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इंगित किया है कि इस वित्तीय घोटाले में तीन लोगों की संलिप्तता पाई गई है। इनमें अधिकारी और कर्मचारी दोनों शामिल हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि जिस तरह से बिना चेक किए बिल पास किए जा रहे थे, वह किसी व्यक्तिगत चूक से अधिक एक सुनियोजित प्रक्रिया की ओर संकेत करता है। सात साल तक यह क्रम कैसे चलता रहा और इसे रोकने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया, यह अब प्रशासन के लिए भी जांच का एक अहम विषय बन गया है।
जांच रिपोर्ट मिलने के बाद डिंडौरी की कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया के निर्देश पर प्रशासन ने तुरंत दंडात्मक कार्रवाई शुरू की। इसी कार्रवाई के तहत मामले में संलिप्त पाए गए एक क्लर्क को उसके पद से तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। निलंबन की यह कार्रवाई दर्शाती है कि प्रशासन इस प्रकार की वित्तीय अनियमितताओं के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रहा है। क्लर्क के निलंबन के साथ ही, उस अवधि में कार्यरत रहे तत्कालीन प्रभारी मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस में उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया है कि उनके कार्यकाल और निगरानी में इतनी बड़ी राशि का अवैध भुगतान कैसे हो गया और उन्होंने बिलों के सत्यापन की प्रक्रिया को क्यों नजरअंदाज किया।
मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय किसी भी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का केंद्र बिंदु होता है। इस कार्यालय के माध्यम से जिले भर के सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं का संचालन और वित्तीय लेनदेन किया जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण कार्यालय में यदि सात साल तक बिना जांच के बिल पास होते रहें और करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये की हेराफेरी हो जाए, तो यह आम जनता के स्वास्थ्य अधिकारों और सरकारी धन के दुरुपयोग का एक गंभीर उदाहरण है। इस राशि का उपयोग जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने, दवाइयां खरीदने या मरीजों की सेवा में किया जा सकता था, लेकिन वित्तीय गड़बड़ी के कारण यह राशि अनुचित तरीके से खर्च कर दी गई।
फिलहाल, कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया द्वारा की गई इस कार्रवाई को प्रशासनिक स्तर पर एक कड़ा संदेश माना जा रहा है। जांच रिपोर्ट में जिन तीन अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार पाया गया है, उनके खिलाफ आगे क्या विभागीय या कानूनी कार्रवाई होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। कारण बताओ नोटिस का जवाब मिलने के बाद तत्कालीन प्रभारी सीएमएचओ के खिलाफ आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। वहीं, निलंबित क्लर्क के खिलाफ भी नियमानुसार आगे की प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में और भी जांच हो सकती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इस गड़बड़ी में अन्य किसी बाहरी व्यक्ति या ठेकेदार की भी भूमिका थी।
डिंडौरी जिले में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े इस वित्तीय घोटाले ने एक बार फिर सरकारी कार्यालयों में ऑडिट और निगरानी प्रणाली की कमियों को उजागर किया है। सात वर्षों तक यह मामला पकड़ में न आना अपने आप में एक बड़ी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। अब देखना यह होगा कि इस जांच रिपोर्ट और कलेक्टर की कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग अपने आंतरिक वित्तीय नियंत्रण को कैसे मजबूत करता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। वन्दे भारत न्यूज़ इस मामले में होने वाली हर नई कार्रवाई पर अपनी नजर बनाए हुए है।

