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Fri, Oct 9, 2026Updated 7:44 AM IST
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दरभंगा में प्रशांत किशोर का बड़ा बयान: ‘SIR व्यक्ति तक सीमित नहीं, व्यवस्था में सुधार की जरूरत’; चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

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बिहार के दरभंगा से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खबर सामने आई है। जन सुराज के संस्थापक और जाने-माने रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बिहार विधान परिषद के शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को लेकर दरभंगा पहुंचकर कई अहम मुद्दों पर अपनी राय रखी है। इस दौरान उन्होंने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदान प्रक्रिया में हो रही अनियमितताओं पर खुलकर सवाल उठाए हैं। प्रशांत किशोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समस्या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में सुधार की सख्त जरूरत है।

प्रशांत किशोर बिहार विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव के मद्देनजर दरभंगा दौरे पर थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और लोगों से संवाद किया और वर्तमान चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं साझा कीं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर पिछले कई वर्षों से लगातार सवाल उठ रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि एक ऐसी गंभीर समस्या है जिस पर समय रहते ध्यान देने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, जब देश का चुनाव आयोग ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो लोकतंत्र की मजबूती पर स्वाभाविक रूप से प्रश्नचिह्न लगता है।

जन सुराज के संस्थापक ने आगे कहा कि ‘SIR’ यानी सिस्टम (व्यवस्था) में सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मामला किसी एक अधिकारी या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। अगर हम केवल व्यक्तियों को बदलते रहेंगे और मूल व्यवस्था में कोई सुधार नहीं करेंगे, तो समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने और उसकी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए व्यापक और ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल केवल किसी एक राज्य या एक चुनाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन चुका है जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

प्रशांत किशोर ने अपने संबोधन में आम मतदाताओं की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और एक कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर जनता पैसे के बदले वोट देगी, तो फिर व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद करना बेहद मुश्किल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में मतदाता की ताकत सबसे बड़ी होती है, लेकिन जब यह ताकत धन के लेन-देन में बदल जाती है, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो जाता है। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि उन्हें अपने मताधिकार का उपयोग सोच-समझकर और बिना किसी लालच के करना चाहिए। अगर वोटर खुद अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तो कोई भी नेता या कोई भी संस्था उसे न्याय नहीं दिला सकती।

बिहार विधान परिषद के शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव की बात करें तो यह चुनाव राज्य की राजनीति में हमेशा से एक अलग महत्व रखता है। शिक्षकों और स्नातकों को समाज का जागरूक वर्ग माना जाता है। ऐसे में इन वर्गों के मतदान को लेकर प्रशांत किशोर का यह बयान काफी प्रासंगिक माना जा रहा है। उनका मानना है कि यदि शिक्षित वर्ग ही चुनावी प्रक्रिया में शुचिता बनाए रखने में विफल रहता है, तो समाज के अन्य वर्गों से क्या उम्मीद की जा सकती है। इसलिए शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे एक आदर्श प्रस्तुत करें।

जन सुराज अभियान के तहत प्रशांत किशोर लगातार बिहार के विभिन्न जिलों का दौरा कर रहे हैं और लोगों को राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। दरभंगा में दिए गए उनके इस बयान ने एक बार फिर चुनावी सुधारों और चुनाव आयोग की भूमिका पर बहस को हवा दे दी है। उन्होंने अपने संगठन के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की है कि बिहार में वास्तविक बदलाव केवल सरकार बदलने से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए चुनावी प्रणाली और मतदान संस्कृति दोनों में बुनियादी बदलाव करना होगा।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जब तक चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं आएगी और मतदाताओं में पैसे लेकर वोट देने की प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी, तब तक सही मायनों में लोकतंत्र की जीत संभव नहीं है। प्रशांत किशोर ने बिना किसी विशेष राजनीतिक दल का नाम लिए, सीधे तौर पर व्यवस्थागत खामियों को रेखांकित किया है। उनका कहना था कि दोष देने की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर समाधान की दिशा में काम करना होगा।

कुल मिलाकर, दरभंगा में प्रशांत किशोर का यह दौरा और उनके द्वारा दिए गए बयान बिहार की राजनीति में चुनावी सुधारों की मांग को एक नया आयाम देते हैं। शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के बीच उनकी यह बातें कितना असर दिखाती हैं, यह आने वाले चुनावी नतीजों और मतदान के दौरान देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, उनके इस बयान ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और मतदान में पैसे के इस्तेमाल जैसे गंभीर मुद्दों को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।