Sat, 10 Oct 20262:56 PM
Sat, Oct 10, 2026Updated 2:56 PM IST
होम › मध्य प्रदेश

ड्रग तस्करी के मामले में दो साल से जेल में बंद था नाबालिग, इंदौर हाईकोर्ट ने दी जमानत; किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत के आदेश निरस्त

WhatsAppFacebookX

इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें 138 किलोग्राम गांजे की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया व्यक्ति करीब दो साल तक जेल में बंद रहा और बाद में यह तथ्य सामने आया कि वह व्यक्ति वास्तव में नाबालिग है। इस गंभीर मामले में अब इंदौर उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए नाबालिग को जमानत दे दी है। उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड (जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड) और अपीलीय अदालत द्वारा पहले जमानत खारिज करने संबंधी दिए गए आदेशों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। साथ ही, अदालत ने बालक की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसके बाद उसे राहत मिल सकी है।

मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला भारी मात्रा में ड्रग्स यानी मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने 138 किलोग्राम गांजे की जब्ती के सिलसिले में इस व्यक्ति को गिरफ्तार किया था और उसे जेल भेज दिया गया था। हालांकि, लंबी कानूनी प्रक्रिया और जांच के दौरान यह बात स्पष्ट हुई कि जिसे वयस्क समझकर जेल भेजा गया था, वह वास्तव में एक नाबालिग बालक है। इसके बावजूद वह पिछले लगभग दो वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे बंद रहा। जब यह मामला किशोर न्याय बोर्ड के संज्ञान में पहुंचा, तो वहां भी उसे जमानत नहीं मिल सकी। किशोर न्याय बोर्ड ने उसकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद अपीलीय अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन अपीलीय अदालत ने भी किशोर न्याय बोर्ड के फैसले को बरकरार रखते हुए बालक की जमानत अर्जी को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।

निचली अदालतों और बोर्ड से निराशा मिलने के बाद, इस मामले को इंदौर उच्च न्यायालय में ले जाया गया। उच्च न्यायालय में यह मामला न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया। न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलों और कानूनी प्रावधानों का गहनता से अध्ययन करने के बाद अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि बालक को जमानत देने से इनकार करने के लिए कानून में बताए गए आधारों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री सामने नहीं आई है। अदालत ने पाया कि कानून के तहत किसी नाबालिग को जमानत देने से रोकने के लिए जो शर्तें और आधार निर्धारित किए गए हैं, उनका समर्थन करने वाले पर्याप्त और ठोस सबूत इस मामले में प्रस्तुत नहीं किए जा सके।

इसी आधार पर, इंदौर उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत द्वारा पारित उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके तहत बालक की जमानत याचिकाओं को खारिज किया गया था। उच्च न्यायालय ने बालक की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए उसे जमानत पर रिहा करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर किशोर न्याय अधिनियम और नाबालिगों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। कानून के जानकारों का मानना है कि किसी भी नाबालिग को बिना ठोस कानूनी आधार के लंबे समय तक जेल में रखना किशोर न्याय प्रणाली के मूल उद्देश्य के विपरीत है, जिसका मुख्य लक्ष्य सुधार और पुनर्वास होता है, न कि कठोर दंड।

इस मामले ने कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 138 किलोग्राम गांजे जैसे बड़े ड्रग तस्करी मामले में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की आयु का सत्यापन समय पर क्यों नहीं हो सका। यदि वह व्यक्ति वास्तव में नाबालिग था, तो उसे करीब दो साल तक नियमित जेल में अन्य वयस्क आरोपियों के साथ क्यों रखा गया। किशोर न्याय अधिनियम के तहत नाबालिगों को विशेष देखभाल और सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है, और उन्हें वयस्क अपराधियों से अलग रखा जाना चाहिए। इस मामले में व्यवस्था की चूक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिसके कारण एक बालक को अपनी उम्र के सबसे कीमती साल जेल की दीवारों के बीच गुजारने पड़े।

उच्च न्यायालय के इस फैसले ने किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत के पूर्व के रुख को बदलकर रख दिया है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि जब तक कानून में निर्धारित आधारों का ठोस प्रमाण न हो, किसी नाबालिग की स्वतंत्रता को छीनकर उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करना यह दर्शाता है कि उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों और बोर्ड के फैसलों में कानूनी खामियां पाईं, जिन्हें सुधारना आवश्यक था।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर पुलिस और प्रशासन लगातार सख्त कार्रवाई कर रहा है। 138 किलोग्राम गांजे की जब्ती अपने आप में एक बहुत बड़ी कार्रवाई थी, लेकिन इस मामले में आरोपी की नाबालिग होने की स्थिति ने इसे कानूनी और मानवीय दोनों दृष्टिकोणों से बेहद पेचीदा बना दिया। अब उच्च न्यायालय के आदेश के बाद इस नाबालिग को जमानत मिल गई है, लेकिन इस घटनाक्रम ने किशोर न्याय प्रणाली में सुधार और आयु सत्यापन की प्रक्रिया को और अधिक सटीक बनाने की जरूरत को रेखांकित किया है। वंदे भारत न्यूज़ की यह रिपोर्ट इस पूरे घटनाक्रम और उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले पर आधारित है।