Thu, 08 Oct 20265:45 PM
Thu, Oct 8, 2026Updated 5:45 PM IST
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गुरदासपुर: पराली जलाने के खिलाफ छात्राओं ने खोला मोर्चा, कृषि विभाग के साथ मिलकर निकाली जागरूकता रैली

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गुरदासपुर। पंजाब में हर वर्ष फसल कटाई के बाद किसानों द्वारा खेतों में पराली जलाए जाने की गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब स्कूली छात्र-छात्राएं भी आगे आ रही हैं। जिले के ब्लॉक कलानौर के गांव खुशीपुर में कृषि विभाग और स्थानीय स्कूल के छात्र-छात्राओं ने संयुक्त रूप से पराली न जलाने को लेकर एक विशेष जागरूकता रैली का आयोजन किया। इस रैली में छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और किसानों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि ‘खेतों में आग न लगाएं बापू’। छात्राओं ने ग्रामीणों को बताया कि पराली जलाने से मिट्टी में पाए जाने वाले मित्र कीट मर जाते हैं और खेतों की उपजाऊ शक्ति भी पूरी तरह से खत्म हो जाती है।

यह जागरूकता अभियान जिला कृषि अधिकारी डॉ. शाहबाज सिंह चीमा के स्पष्ट निर्देशों पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम की देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी एईओ (सहायक कृषि प्रसार अधिकारी) अमृतपाल कौर ने संभाली। एईओ अमृतपाल कौर के मार्गदर्शन में छात्र-छात्राओं ने गांव की गलियों और मुख्य रास्तों पर घूमकर किसानों और ग्रामीणों को पराली जलाने से होने वाले भारी नुकसान के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान छात्राओं ने हाथों में तख्तियां और बैनर पकड़ रखे थे, जिन पर पराली न जलाने और पर्यावरण की रक्षा करने संबंधी नारे लिखे हुए थे।

रैली के दौरान छात्राओं ने किसानों को समझाया कि पराली जलाने से मिट्टी के अंदर मौजूद कई उपयोगी जीवाणु और मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं। ये मित्र कीट फसलों को बीमारियों और हानिकारक कीड़ों से बचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब इनकी संख्या कम हो जाती है, तो किसानों को फसलों पर अधिक मात्रा में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, पराली जलाने से उत्पन्न अत्यधिक गर्मी के कारण मिट्टी की नमी सूख जाती है और उसमें मौजूद कार्बनिक पदार्थ जलकर राख हो जाते हैं। इससे खेत की उपजाऊ शक्ति में तेजी से गिरावट आती है और आने वाले समय में फसल की पैदावार भी प्रभावित होती है।

कृषि विभाग की ओर से इस अभियान का नेतृत्व कर रहीं एईओ अमृतपाल कौर ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि पराली जलाना न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि इससे वायु प्रदूषण भी चरम सीमा पर पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि पराली के धुएं से निकलने वाले जहरीले गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं, जिससे सांस संबंधी गंभीर बीमारियां, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पराली को खेतों में जलाने के बजाय उसके वैकल्पिक और वैज्ञानिक प्रबंधन के तरीकों को अपनाएं।

इस अवसर पर किसानों को पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध आधुनिक कृषि यंत्रों की जानकारी भी दी गई। उन्हें बताया गया कि हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, मल्चर, स्ट्रॉ मैनेजर और श्रेडर जैसी मशीनों का उपयोग करके पराली को खेत में ही मिलाया जा सकता है। इन मशीनों के माध्यम से पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में दबा दिया जाता है, जो सड़कर प्राकृतिक खाद का काम करती है। इससे मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और भविष्य में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होती है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को यह भी बताया कि सरकार द्वारा पराली प्रबंधन वाली मशीनों की खरीद पर अनुदान दिया जाता है, ताकि छोटे और सीमांत किसान भी इनका लाभ उठा सकें।

जिला कृषि अधिकारी डॉ. शाहबाज सिंह चीमा ने इस पूरे अभियान की सराहना करते हुए कहा कि पराली जलाने की कुप्रथा को रोकने के लिए केवल प्रशासनिक कार्रवाई ही काफी नहीं है, बल्कि जन जागरूकता सबसे आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्कूली छात्र-छात्राओं को इस अभियान से जोड़ने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे अपने घरों में जाकर अपने माता-पिता और दादा-दादी को पराली न जलाने के लिए प्रेरित करें। जब घर के बच्चे ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश देंगे, तो किसानों पर इसका गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

गांव खुशीपुर में आयोजित इस रैली में स्थानीय ग्रामीणों और किसानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कई किसानों ने कृषि विभाग की टीम और स्कूली छात्राओं की इस पहल की प्रशंसा की और भविष्य में अपने खेतों में पराली न जलाने का संकल्प लिया। ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि पहले वे परंपरागत तरीके से पराली जला देते थे, लेकिन अब उन्हें इसके दुष्परिणामों की सही जानकारी मिल गई है। ब्लॉक कलानौर के इस गांव से शुरू हुआ यह जागरूकता अभियान आने वाले दिनों में जिले के अन्य क्षेत्रों में भी विस्तारित किए जाने की संभावना है, ताकि पराली मुक्त पंजाब के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोका जा सके।