ईरान-अमेरिका का झगड़ा थमा। ट्रम्प ने चिल्लाकर दुनिया को बता दिया- ‘इट्स साइन्ड’, यानी ईरान से समझौता हो गया।
.

18 जून को पेरिस में G-7 समिट के लिए पहुंचे ट्रम्प ने वहीं ईरान से डील पर साइन किए और समझौते की घोषणा की।
तो क्या अब दुनिया भर में तेल की सप्लाई चोक किए बैठा ईरान, होर्मुज पूरी तरह खोल देगा? जहाजों की आवाजाही शुरू हो जाएगी? क्या भारत में पेट्रोल-डीजल कब तक सस्ता होगा? जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर अमेरिका-ईरान समझौते में क्या लिखा है? जवाब: अमेरिका और ईरान की 14 पॉइंट वाली डील में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोला जाएगा। इसमें 3 जरूरी बातें कही गई हैं…
- ‘समझौता होते ही ईरान तय करेगा कि अगले 60 दिनों तक होर्मुज से आने-जाने वाले जहाज सुरक्षित तरीके से और बिना किसी शुल्क के गुजरें।
- जहाजों की आवाजाही तुरंत शुरू कर दी जाएगी। हालांकि जंग के चलते पैदा हुई सैन्य रुकावटों को हटाने और समुद्र में बिछी बारूदी सुरंगों को साफ करने में 30 दिन तक लग सकते हैं।
- ईरान, ओमान के साथ मिलकर यह भी तय करेगा कि आगे होर्मुज स्ट्रेट का संचालन कैसे होगा।’
दरअसल, 28 फरवरी को हमले के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉक कर दिया था। जहाजों की आवाजाही लगभग पूरी तरह बंद हो गई। ईरान की रजामंदी से कुछ शिप्स निकल रहे थे, लेकिन 13 अप्रैल से अमेरिकी नेवी ने दोहरी नाकेबंदी कर दी थी।

ईरानी राष्ट्रपति मसूद ने भी डील पर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दस्तखत किए।
सवाल-2: होर्मुज पूरी तरह खुलने में अड़चनें क्या हैं? जवाब: अमेरिका-ईरान की डील में भले होर्मुज तुरंत खोलने की बात है, लेकिन इसमें 4 बड़ी अड़चनें हैं…
1. बारूदी सुरंगें और तकनीकी रुकावटें
- इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल गुजरता है। अपने सबसे संकरे हिस्से में ये सिर्फ 33 किलोमीटर चौड़ा है।
- जंग के दौरान ईरानी सेना ने होर्मुज में बारूदी सुरंगें बिछाई थीं। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनकी सटीक लोकेशन उसे खुद नहीं पता है, क्योंकि ज्यादा समय में ये माइंस अपनी जगह से डिस्प्लेस हो जाती हैं।
- 11 अप्रैल से अमेरिका ने ओमान की खाड़ी में माइन-क्लीयरेंस ऑपरेशन शुरू किया था। अमेरिका का अनुमान है कि इन माइंस को पूरी तरह हटाने में 6 महीने लग सकते हैं। उसके पहले तक कमर्शियल जहाजों के लिए यहां से निकलना खतरे से खाली नहीं है। अभी लगभग 2,000 जहाजों पर 20,000 नाविक होर्मुज से गुजरने के इंतजार में फंसे हुए हैं।
डेनमार्क के जेस्के बैंक के सीनियर एनालिस्ट हैदर अंजुम कहते हैं, ‘होर्मुज खुलने के बावजूद सबसे बड़ा खतरा माइंस का है। माइंस को साफ करके जहाजों के लिए एक सेफ गलियारा बनाने में करीब 2 महीने लग जाएंगे।’
2. सिर्फ 60 दिनों तक मुफ्त आवाजाही, फिर टोल
- जंग के पहले होर्मुज रूट फ्री था। यहां से आने-जाने के लिए कोई ट्रांजिट फीस नहीं देनी पड़ती थी।
- ट्रम्प की डील के तहत जहाजों से 60 दिन तक कोई टोल नहीं वसूला जाएगा। ईरान का कहना है कि वो उसके बाद जहाजों को सुरक्षित गुजारने के लिए फीस वसूलेगा। आगे चलकर होर्मुज के मैनेजमेंट के लिए ईरान, ओमान के साथ एक बड़ा समझौता करेगा।
- दरअसल, ईरान होर्मुज पर वैसा ही कंट्रोल चाहता है जैसा तुर्किये स्ट्रेट पर तुर्किये का है। 1936 के मोंट्रेक्स कन्वेंशन के तहत तुर्किये, बोस्फोरस और डार्डानेल्स स्ट्रेट (तुर्किये स्ट्रेट) पर कंट्रोल करता है और यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल लेता है।
- ईरान का भी कहना है कि होर्मुज अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में नहीं है, इसलिए उसे इसका अधिकार है।
ईरानी-अमेरिकी अर्थशास्त्री नादेर हबीबी कहते हैं, ‘अमेरिका, ईरान को कोई फीस वसूलने की अनुमति नहीं देगा। जो जहाज ईरान को टोल देंगे, वो उन पर बैन लगा सकता है।’

3. जहाजों के बीमे के रेट्स अभी भी ज्यादा
- कमर्शियल जहाजों के साथ हादसे का खतरा रहता है। इसलिए ये तभी ऑपरेट करते हैं, जब इनका इंश्योरेंस हो। इनमें मौजूद करोड़ों के कार्गो का भी बीमा होता है।
- हालांकि कमर्शियल जहाजों का बीमा करने वाली कंपनियां जंग के दौरान कवरेज नहीं देती हैं या फिर इसका प्रीमियम बहुत बढ़ा देती हैं। ऐसा ही ईरान जंग के दौरान होर्मुज में फंसे जहाजों के साथ हुआ है।
नादेर हबीबी कहते हैं कि इलाके में हमले बंद होने के बाद भी शिपिंग कंपनियों के लिए चुनौती है। समझौते के बाद भी प्रीमियम के रेट्स बहुत ज्यादा हैं, जो कई हफ्तों तक बने रह सकते हैं। इंश्योरेंस भी मुश्किल से हो रहा है। इससे जहाजों का कार्गो ले जाने का काम रुका रह सकता है।
4. ईरान-अमेरिका के हमले का डर
- पिछले हफ्ते ही अमेरिकी सेना ने 3 कमर्शियल जहाजों पर हमला किया, जिसमें 3 भारतीय नाविकों की मौत हो गई। ईरान भी ब्लॉकेज प्रभावी बनाने के लिए जहाजों पर हमले करता रहा है।
- समझौते से एक दिन पहले अमेरिकी नाकेबंदी की वजह से 142 जहाजों को अपना रास्ता बदलना पड़ा। 9 जहाजों को रोक दिया गया।
- इसलिए शिपिंग कंपनियों को डर है कि अमेरिका और ईरान के बीच जंग फिर से शुरू हो सकती है और उनके जहाज चपेट में आ जाएंगे।
हैदर अंजुम का कहना है कि सिर्फ राजनीतिक समझौता होने से स्थिति सामान्य नहीं हो जाएगी। जहाज मालिकों को जमीन पर सुरक्षा और स्थिरता दिखाई देनी चाहिए। जब तक कई महीनों तक कोई नई घटना या हमला नहीं होता, तब तक जहाज मालिक और बीमा कंपनियां यह नहीं मानेंगी कि खतरा वास्तव में कम हो गया है। आवाजाही सामान्य होने में 4 महीने से ज्यादा लग सकते हैं।
सवाल-3: भारत में पेट्रोल-डीजल कब तक सस्ता हो जाएगा? जवाब: पेट्रोल-डीजल की कीमत इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमत से सीधे जुड़ी होती हैं। जंग शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरल थी। ट्रम्प के समझौते के बाद वापस उतनी ही होती दिख रही हैं। हालांकि समझौता होने का मतलब ये नहीं है कि तेल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी।
ऐसे इसलिए कि जंग के शुरुआती दो महीने में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए। इससे तेल कंपनियों को रोजाना 1,000 करोड़ का नुकसान हुआ। फिर 15 से 25 मई के बीच देश में पेट्रोल-डीजल के दाम 7.5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़े, फिर भी कंपनियों को रोजाना करीब 600 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी डिजर्व के को-फाउंडर वैभव पोरवाल के मुताबिक, ‘सरकार ने महंगे तेल का भार आम लोगों पर नहीं डाला था। अब तेल सस्ता होने पर भी सरकार तुरंत दाम कम न करके तेल कंपनियों को नुकसान की भरपाई करने देगी।’
आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स के डायरेक्टर थॉमस स्टीफन के मुताबिक, पेट्रोल डीजल की कीमत में गिरावट तब हो सकती है, जब कच्चा तेल करीब 65 डॉलर प्रति बैरल तक आ जाए और फिर इतना ही बना रहे। इसमें कुछ हफ्तों का समय लग सकता है।
JNU में फॉरेन अफेयर्स के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, ‘तेल के दाम पहले जैसे होने में 6-9 महीने लग सकते हैं। बड़ी तेल कंपनियां पहले से तय कॉन्ट्रैक्ट पर तेल खरीदती-बेचती हैं। कई बार 6 महीने पहले ही तय हो जाता है कि कितना तेल किस कीमत पर खरीदना है।’
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने भी कहा है कि कच्चा तेल सस्ता होने के तुरंत बाद पेट्रोल के दाम कम नहीं किए जा सकते। होर्मुज से सस्ता तेल भारत आने में समय लगेगा।

सवाल-4: क्या होर्मुज दोबारा भी बंद हो सकता है? जवाब: एक सीनियर अमेरिकी ऑफिसर ने बताया कि अमेरिकी टीम ईरान के साथ समझौते को लेकर सचेत है। अगर ईरान जो वादे कर रहा है, वो सब करता है, तो ये एक जबरदस्त समझौता होगा। इसे आप आखिरी MoU भी कह सकते हैं, लेकिन जब तक कोई पूरा और बाध्यकारी एग्रीमेंट न हो जाए, तो कोई भी पक्ष किसी भी समय इससे पीछे हट सकता है। इससे होर्मुज को लेकर फिर तनाव पैदा हो सकता है।
दरअसल, समझौता होने के बाद भी अभी 3 बड़े मुद्दे हैं, जिन पर 60 दिन के अंदर फैसला लिया जाना है….
ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े सवाल
- समझौते में ये तो लिखा है कि ईरान कभी परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही खरीदेगा। लेकिन कई बातों पर सहमति बाकी है। जैसे- क्या ईरान अपनी परमाणु सामग्री अपने पास ही रख सकेगा, क्या उसे अपनी न्यूक्लियर लैबोरेट्री बंद करने होंगी, उसे नए परमाणु ईंधन को संवर्धित करने की अनुमति होगी।
- स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट मीर खान कहते हैं, ‘ईरान में कई नेता उसके न्यूक्लियर प्रोग्राम को ईरानी शासन के बने रहने की गारंटी मानते हैं। कट्टरपंथी शासन ने अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह इससे पीछे हटने को तैयार हैं।’ अगर बात बिगड़ी तो होर्मुज वापस बंद होने में वक्त नहीं लगेगा।
डील से दूर इजराइल अड़ंगा डाल सकता है
- ईरान की शर्त के मुताबिक, समझौते में कहा गया है कि लेबनान पर इजराइल के हमले सहित सभी मोर्चों पर जंग रुकेगी।
- इसमें सबसे बड़ी अड़चन ये है कि समझौते में इजराइल शामिल ही नहीं है। उसके रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा है कि उनकी सेना लेबनान में अनिश्चितकाल तक बनी रहेगी।
- इजराइली सेना, यानी IDF के मुताबिक, उसकीतैनाती सीमा से लेकर लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर तक है। उसके जवान तय किए गए इलाकों में मौजूद रहेंगे और इजराइल के उत्तरी हिस्से के लोगों की सुरक्षा के लिए संभावित खतरों को खत्म करने का काम जारी रखेंगे।

IDF ने यह नक्शा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद जारी किया। इससे पता चलता है कि अप्रैल में घोषित ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ के मुकाबले इजराइली सेना अब लेबनान के अंदर और आगे बढ़ चुकी है।
ईरान को कब और कितना पैसा मिलेगा
- समझौते में है कि ईरान पर आर्थिक बैन के चलते उसकी 100 अरब डॉलर की जब्त रकम वापस मिलेगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 300 अरब डॉलर का इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए इन्वेस्टमेंट फंड मिलेगा।
- हालांकि ये साफ नहीं है कि ईरान को ये पैसा कौन देगा। समझौते के मुताबिक, इन्वेस्टमेंट फंड में अमेरिका हिस्सेदारी दे, ये जरूरी नहीं है।
- ट्रम्प ने भी समझौते से पहले 300 अरब डॉलर वाली बात को विपक्षी नेताओं की फैलाई फेक न्यूज कहा था।
- उन्होंने समझौते को ‘परफॉरमेंस बेस्ड’ बताया है। इसका मतलब है कि ईरान को इसके फायदे तभी मिलेंगे, जब वो अपने सारे वादे निभाएगा।
मीर खान कहते हैं कि समझौते में होर्मुज को फौरन खोलने की बात है, लेकिन ईरान इसको ओमान के साथ मिलकर अस्थायी तौर पर खोलने की बात कर रहा हैं। कागज पर तो ये शर्त मानी जा रही लगती है, लेकिन हकीकत में ये समझौता होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल एक हद तक बरकरार रखता है।
—
रिसर्च सहयोग- श्रेया नाकाड़े
—-
अमेरिका-ईरान जंग की पूरी एनालिसिस पढ़ें..
ईरान के सामने ट्रम्प का ‘सरेंडर’:न सत्ता बदली, न परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म; 122 लाख करोड़ रुपए बर्बाद, आखिर जंग से मिला क्या

27 फरवरी 2026; ओमान के विदेश मंत्री अल-बुसैदी ने टीवी पर आकर कहा- ईरान अपना पूरा एनरिच्ड यूरेनियम खत्म करने को राजी है। अल-बुसैदी ही अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील की मध्यस्थता कर रहे थे। वो बोले- अगर कूटनीति को थोड़ी और जगह दें, तो समझौता हमारी पहुंच में है। आगे पढ़ें..















