राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी आजादी की 250वीं सालगिरह पर एक टाइम कैप्सूल दफनाया है। भारत की आजादी के 25 साल बाद भी ऐसा ही टाइम कैप्सूल दफनाया गया था। आज उसी की कहानी…
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15 अगस्त 1973, आजादी की 26वीं सालगिरह। तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सुबह-सुबह लाल किला पहुंचीं। रस्मन तिरंगा फहराया, भाषण दिया और नेता-अधिकारियों के साथ लाहोरी दरवाजे की तरफ चल दीं।
वहां पहले से 32 फीट गहरा एक कुआं खोदा गया था। इंदिरा ने उस कुएं में तांबे और स्टील से बना एक वैक्यूम-सील्ड, भारी-भरकम टाइम कैप्सूल दफना दिया। कहा गया- ‘काल पत्र’ नाम के इस कैप्सूल को 1 हजार साल बाद निकाला जाएगा। हालांकि, सत्ता बदली और 4 साल बाद ही इसे खुदवा लिया गया।

1970 का दशक। देश में कांग्रेस सरकार की कमान संभाल रही थीं इंदिरा गांधी। 1971 की जंग में पाकिस्तान को शिकस्त देकर वो अपने राजनीतिक करियर के चरम पर थीं। उन्हें ख्याल आया कि भविष्य की पीढ़ी को मौजूदा भारत के बारे में बताना चाहिए।
यहीं से तय हुआ कि भारत की आजादी के 25 साल पूरे होने पर एक ‘टाइम कैप्सूल’ दफनाया जाएगा। इसमें देश की आजादी और उसके 25 साल बाद के भारत के बारे में बताने वाले दस्तावेज रखे जाएंगे। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी मिली इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च, यानी ICHR को।
ICHR ने ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार करने का काम मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर एस. कृष्णस्वामी को सौंपा। प्रो. कृष्णस्वामी ने दस्तावेज तो बना दिए, लेकिन उन पर कुछ सलाह चाहते थे। उन्होंने दस्तावेजों की एक कॉपी उस दौर के जाने-माने इतिहासकार और तमिलनाडु के आर्काइव्स कमिश्नर टी. बद्रीनाथ को भेजी।
बद्रीनाथ ने मसौदा पढ़ा, तो भड़क गए। उनका मानना था कि ऐतिहासिक तथ्यों को गलत ढंग से पेश किया गया है। उन्होंने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘आजादी के 25 साल बाद अकाल का खतरा खत्म हो गया है? दावा किया गया है कि भूमि सुधारों को लागू करने से कृषि क्रांति पूरी हो गई है, क्या ये सच है?’
यहीं से इंदिरा गांधी की इस पहल का विरोध शुरू हुआ। आरोप लगा कि वो टाइम कैप्सूल के जरिए खुद की और अपने परिवार की वाहवाही कराने की कोशिश कर रही हैं।
इंदिरा गांधी को कहना पड़ा- मुझे टाइम कैप्सूल से जुड़ी चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं, ICHR ने प्रो. कृष्णस्वामी को नोटिस जारी कर दिया। इसके बावजूद प्रोजेक्ट नहीं रुका।
इस पूरे वाकये का खुलासा इकोनॉमिस्ट वीके रामचंद्रन के आर्टिकल से होता है। 1974 में ‘सोशल साइंटिस्ट’ जर्नल में छपे इस लेख का शीर्षक था- ‘प्रोजेक्ट टाइम कैप्सूल एंड द इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च’।

15 अगस्त 1973 को इंदिरा ने लाल किले के लाहौरी गेट के पास ये टाइम कैप्सूल दफनाया। १ हजार साल तक सुरक्षित रखने के लिए कई इंतजाम किए गए। मसलन- इसे तांबे और स्टील से बनाया गया, जिससे जंग और नमी का असर न पड़े। वैक्यूम-पैक्ड बनाया गया, ताकि हवा, गैस या धूल का असर न हो। उस वक्त इस पूरे प्रोजेक्ट पर 8 हजार रुपए खर्च हुए थे।

15 अगस्त 1973 को लाल किले के लाहौरी गेट के पास पीएम इंदिरा गांधी ने टाइम कैप्सूल ‘काल पत्र’ दफन किया था।
हालांकि, टाइम कैप्सूल को लेकर इंदिरा का विरोध जारी रहा। 2 महीने बाद, यानी 15 अक्टूबर को CPI (M) के पोलित ब्यूरो मेंबर पी. राममूर्ति ने इस दस्तावेज का ड्राफ्ट जारी कर दिया। उन्होंने इसे भारतीयों की बेइज्जती बताते हुए कहा- ‘यह भारत का इतिहास नहीं है, बल्कि सत्ता में मौजूद कांग्रेस पार्टी की तथाकथित उपलब्धियों की जानकारी देने वाली कांग्रेस के महासचिव की रिपोर्ट जैसा दिखता है।’
1975-77 की इमरजेंसी के बाद देश का सियासी माहौल पूरी तरह बदल गया। 1977 में चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सरकार चली गई। उनके धुर विरोधी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उन्होंने चुनावी कैम्पेन में कहा था कि सरकार बनी तो टाइम कैप्सूल निकलवाएंगे और सच सबके सामने लाएंगे।
नवंबर 1977 के आखिर में टाइम कैप्सूल की जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई। इसकी कमान जनता पार्टी के पंजाब से सांसद यज्ञदत्त शर्मा को मिली। शर्मा ने कहा- सच्चाई उजागर करना और इतिहास से लीपापोती को रोकना जरूरी है।
दिसंबर 1977 में कड़ी सुरक्षा के बीच टाइम कैप्सूल की खुदाई शुरू हुई। 8 दिसंबर 1977 को कैप्सूल निकाला गया। इसे निकालने में 58 हजार रुपए खर्च हुए, यानी दफनाने से 7 गुना ज्यादा।

8 दिसंबर 1977 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री पीसी चंदर की मौजूदगी में ‘काल पत्र’ निकाला गया था।
रिपोर्ट्स हैं कि मोरारजी देसाई और उनके कुछ मंत्रियों ने कैप्सूल के दस्तावेज देखे थे। टाइम कैप्सूल समिति के अध्यक्ष यज्ञदत्त शर्मा ने घोषणा की थी कि 20 दिसंबर 1977 को इन्हें संसद में पेश किया जाएगा।
कैप्सूल से निकाले गए दस्तावेजों को संसद की लाइब्रेरी में रखा गया। इस पर कई बार चर्चा भी हुई, लेकिन उसमें क्या लिखा था, ये बात कभी जनता के सामने नहीं आई।

दिसंबर 1973 में इंदिरा गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि टाइम कैप्सूल में संविधान की कई माइक्रोफिल्म्स, इवेंट कैलेंडर और लिखित दस्तावेज हैं। असली विवाद दस्तावेज को लेकर है।
2012 में सीनियर जर्नलिस्ट मधु किश्वर ने टाइम कैप्सूल को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में एक RTI लगाई। PMO ने कहा कि उसके पास इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1973 में दफनाए गए कैप्सूल की चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
बाद में मधु किश्वर ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने ये मुद्दा उठाया। फरवरी 2013 में आयोग ने PMO को निर्देश दिया कि वे इस बारे में जानकारी जुटाएं, लेकिन PMO की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया।
12 साल बाद ये मुद्दा राज्यसभा में भी उठा। 16 दिसंबर 2024 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में कहा कि इसे 5 हजार साल के लिए दफनाया गया और संसद को नहीं बताया गया।
सीतारमण ने कहा कि कैप्सूल के दस्तावेजों में अटल बिहारी वाजपेयी के जनसंघ को सेक्युलर देश का विरोध करने वाली एक उग्रवादी रूढ़िवादी हिंदू पार्टी बताया था। इसमें सी. राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और लाल बहादुर शास्त्री का कोई जिक्र नहीं था।

दिसंबर 2024 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण में 1970 के दशक में दफनाए और निकाले गए टाइम कैप्सूल के खर्च का आंकड़ा भी बताया था।
लेखक कनैलाल बसु अपनी किताब ‘नेताजी: रीडिस्कवर्ड’ में लिखते हैं, ‘इंदिरा गांधी और उनके कुछ करीबी लोगों के अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस टाइम कैप्सूल में क्या-क्या है। यहां तक कि सांसदों को भी कुछ पता नहीं था। जब भी सवाल उठाए गए, सरकार ने मामूली या टालने वाले जवाब देकर चुप करा दिया।’

मार्च 2010 में तब की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने IIT कानपुर के कैंपस में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। कैप्सूल में IIT कानपुर के रिसर्च पेपर और वहां के शिक्षकों से जुड़ी जानकारियां रखी गई थीं, ताकि दुनिया में कोई बड़ी उथल-पुथल हो जाए तब भी संस्थान का इतिहास सुरक्षित रहे।

2010 में IIT कानपुर के कैम्पस में टाइम कैप्सूल दफन करतीं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल।
मई 2010 में तब के गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर में बन रहे महात्मा मंदिर की नींव में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। सरकार का दावा था कि 3 फीट लंबे और ढाई फीट चौड़े स्टील के सिलेंडर में गुजरात के 50 साल के इतिहास को संजोया गया है।
अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक, 90 किलो वजनी कैप्सूल में 14 लिखे दस्तावेज और 29 ऑडिया-वीडियो कॉम्पैक्ट डिस्क रखे हुए हैं, जिसमें 90% चीजें मोदी से जुड़ी हुई हैं।
कांग्रेस ने इसका कड़ा विरोध किया और आरोप लगाया कि मोदी खुद का महिमामंडन करा रहे हैं। कहा कि सत्ता में आते ही कैप्सूल निकलवाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है।

गुजरात के महात्मा मंदिर में दफनाए गए टाइम कैप्सूल की पूजा करते नरेंद्र मोदी।
फिर जनवरी 2019 में 106वीं भारतीय विज्ञान सम्मेलन के दौरान पंजाब के जालंधर की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में भी एक टाइम कैप्सूल गाड़ा गया था। इसमें लैपटॉप, स्मार्टफोन, ड्रोन और वीआर चश्मे समेत 100 चीजें दफनाई गईं, जो 100 साल तक सहेजी जा सकती हैं। इसे 3 जनवरी 2119 को निकाला जाएगा।
पिछले साल सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले 50 साल पूरे होने पर 21 अगस्त 2025 को राजधानी गंगटोक के ताशीलिंग सचिवालय परिसर में मौजूद रुस्तमजी डियर पार्क में सीएम प्रेम सिंह तमांग ने एक टाइम कैप्सूल दफनाया।
32 किलो वजनी गुलाबी-सुनहरे रंग के इस स्टील सिलेंडर में राज्य की 13 आधिकारिक भाषाओं में दस्तावेज, धान और औषधीय पौधों के बीज, पारंपरिक वाद्य यंत्र, नक्शे, मिट्टी, स्मार्टफोन-गैजेट वगैरह रखे गए। इसे 2075 तक के लिए दफनाया गया है।
अब आखिर में- अमेरिका की आजादी की 250वीं सालगिरह पर दफनाए गए टाइम कैप्सूल की कहानी…

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