‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है।
.
सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है; इसी पर आज का एक्सप्लेनर…
सवाल-1: क्या आधार, पैन, जन्म प्रमाणपत्र भी नागरिकता साबित नहीं करते? जवाबः पासपोर्ट की तरह ये सरकारी दस्तावेज भी नागरिकता के सबूत नहीं हैं…
आधार कार्ड: आधार एक्ट, 2016 के सेक्शन 9 में कहा गया है कि आधार नंबर नागरिकता और निवास का सबूत नहीं है। आधार जारी करने वाली यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) ने भी बार-बार कहा है कि आधार सिर्फ पहचान पत्र है। इलेक्शन कमीशन, कलकत्ता और बॉम्बे हाईकोर्ट का भी यही रुख है।
मतदाता पहचानपत्र: जनवरी 2026 में इलेक्शन कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वोटर आईडी नागरिकता साबित नहीं करता, यह सिर्फ वोट देने के लिए है। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा कि वोटर आईडी कार्ड पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता के सबूत।
पैन कार्ड: आयकर अधिनियम, 2025 के तहत कोई भी विदेशी नागरिक या कंपनी, जिनका भारत में कारोबार है या जो यहां टैक्स के दायरे में हैं, वह पैन कार्ड बनवा सकते हैं। यह सिर्फ वित्तीय लेन-देन और टैक्स ट्रैकिंग के लिए है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी साफ किया कि पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है।
राशन कार्ड: 2019 में गुवाहाटी हाईकोर्ट और 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राशन कार्ड को नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ पते और वित्तीय स्थिति का प्रमाण है। जुलाई 2025 में इलेक्शन कमीशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए राशन कार्ड को सबूत नहीं माना जा सकता और नागरिकता साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मांगे।
ड्राइविंग लाइसेंस: ड्राइविंग लाइसेंस केवल पहचान पत्र है, जो वाहन चलाने की इजाजत देता है। मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत, भारत में वीजा पर आए विदेशियों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया जाता है। इसका नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं।
जन्म प्रमाण-पत्र: 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा कि केवल जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं है। ये सिर्फ जन्म की तारीख और जगह का सबूत है। नागरिकता कानून के मुताबिक भी सिर्फ इसे नागरिकता का आखिरी सबूत नहीं माना जा सकता।
हालांकि जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट को लेकर दो विरोधाभासी बातें भी हैं…
- 2019 में केंद्र सरकार ने कहा था कि नागरिकता के लिए जन्म की तारीख और स्थान की पुष्टि करने वाले दस्तावेज दिए जा सकते हैं, जिसमें जन्म प्रमाण पत्र भी है।
- 2025 में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, यानी SIR पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन से कहा- आपके द्वारा बताए 11 दस्तावेजों की लिस्ट में पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र के अलावा नागरिकता का कोई निर्णायक सबूत नहीं है।

24 जून को पासपोर्ट सेवा दिवस पर एक कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों ने कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का दस्तावेज नहीं है। बीते साल से चिप बेस्ड पासपोर्ट की शुरुआत के बाद 1.47 करोड़ ई-पासपोर्ट जारी किए जा चुके हैं।
सवाल-2: तो फिर कैसे साबित होगा कि आप भारत के नागरिक हैं? जवाबः अगस्त 2025 में यही सवाल लोकसभा में CPI (ML) के सांसद सुदामा प्रसाद ने पूछा था। तब गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब दिया कि 1955 के नागरिकता अधिनियम के हिसाब से भारतीय नागरिकता तय होती है।
दरअसल, भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कोई सिंगल यूनिवर्सल डॉक्यूमेंट जारी नहीं किया जाता। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के मुताबिक, जन्मतिथि के हिसाब से नागरिकता अलग-अलग दस्तावेजों से तय होती है…
- 1 जुलाई 1987 से पहले: इस दौरान जन्मे लोग सिर्फ भारत में जन्म लेने के आधार पर भारतीय नागरिक हैं। इनका जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता का पुख्ता सबूत है।
- 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच: इस दौरान जन्मे लोगों की नागरिकता के लिए केवल भारत में जन्म लेना काफी नहीं, बल्कि उनके जन्म के वक्त माता-पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी है।
- 3 दिसंबर 2004 के बाद: इस दौरान जन्मे व्यक्ति के जन्म के वक्त या तो माता-पिता दोनों भारतीय नागरिक हों या माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा ‘अवैध अप्रवासी’ न हो।
हालांकि 1955 के नागरिकता कानून के तहत विदेशी लोगों से जुड़े मामलों में कुछ खास नियमों से नागरिकता दी जाती है…
धारा 5, रजिस्ट्रेशन: उन्हें जिनका भारत से कोई जुड़ाव हो। जैसे- कोई विदेशी महिला या पुरुष जो किसी भारतीय से शादी करे। धारा 6, नेचुरलाइजेशन: विदेशी नागरिकों के लिए, जो तय वक्त तक भारत में रहे हों। जैसे- पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी को भारतीय नागरिकता मिली।
सवाल-3: क्या सरकार नागरिकता का कोई रजिस्टर बनाने वाली है? जवाबः नहीं। फिलहाल ऐसी कोई कवायद शुरू होने की जानकारी नहीं है। हालांकि सरकार काफी समय से पूरे देश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ यानी NRC लागू करना चाहती है, लेकिन ये अभी सिर्फ असम में लागू हुआ है।
इसे समझने के लिए पहले दो चीजें समझिए… पहला, CAA: 2019 में संसद से सिटिजनशिप एमेंडमेंट एक्ट, यानी CAA पास हुआ। इसके तहत 1955 के नागरिकता कानून में ये प्रावधान शामिल हुआ कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक, यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत के नागरिक बन सकते हैं। इसमें मुस्लिम प्रवासी शामिल नहीं थे। 11 मार्च 2024 को ये कानून लागू हो गया है।
दूसरा, NRC: CAA बिल के साथ ही NRC, यानी ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ की चर्चा शुरू हुई थी। यानी एक ऐसा रजिस्टर, जिसमें देश के सारे नागरिकों का लेखा-जोखा हो। केंद्र सरकार का प्लान था कि पहले CAA लागू होगा, उसके बाद पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा।
20 नवंबर 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, ‘मान के चलिए NRC आने वाला है। हम पूरे देश में NRC पेश करेंगे, इस पर सदन में चर्चा कर सकते हैं। नागरिकता बिल को NRC से जोड़ने की कोशिश न करें।’
बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र में भी कहा गया था घुसपैठ से प्रभावित राज्यों और फिर चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा।
हालांकि अब तक ऐसा नहीं हुआ है। 2019 में सिर्फ असम में NRC के तहत नागरिकता रजिस्टर बनाया गया। इसके चलते असम में 31 अगस्त 2019 को जारी हुई नागरिकता की लिस्ट में से 19 लाख लोग बाहर हो गए।
सवाल-4: सरकार ने अभी तक नागरिकता का रजिस्टर क्यों नहीं बनाया? जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं…
1. NRC का विरोध, सरकार ने अपना एजेंडा बदला
- 11 दिसंबर 2019 को CAA बिल पास होने के बाद 2019 में इसे NRC से जोड़कर इसका व्यापक विरोध किया गया। कहा गया कि ये देश के मुसलमानों की नागरिकता छीनने के कानून हैं।
- दिल्ली के शाहीन बाग में 101 दिनों तक विरोध प्रदर्शन चला। तब की पश्चिम बंगाल और केरल जैसी गैर-बीजेपी राज्य सरकारों ने भी इसका विरोध किया और कहा कि अपने यहां इसे लागू नहीं होने देंगे।
- इससे सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा। सरकार ने कई बार कहा कि प्रवासियों की नागरिकता से जुड़े CAA कानून का देश की नागरिकता के रजिस्टर, यानी NRC या देश के अल्पसंख्यकों से कोई लेना-देना नहीं है। ये भी कहा कि पूरे देश में NRC पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है।
- अमित शाह के नेशनवाइड NRC लागू करने वाले बयान के उलट 22 दिसंबर 2019 को पीएम मोदी ने भी कहा, ‘मैं देश के लोगों को बताना चाहता हूं कि 2014 में मेरी सरकार के सत्ता में आने से अब तक NRC पर कोई चर्चा नहीं हुई है। हमें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने के लिए इसे केवल असम में लागू करना पड़ा।’
- कोविड के दौरान विरोध प्रदर्शन रुक गए और ये मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया, लेकिन अभी भी सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता के कानून, असम में NRC से जुड़े मुद्दों को लेकर सैकड़ों याचिकाएं लंबित हैं।
- बीजेपी ने 2024 लोकसभा के घोषणापत्र में भी NRC का जिक्र नहीं किया है।
2. असम की NRC लिस्ट वैध नहीं, कई गलतियां निकलीं
- 2019 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी असम की NRC लिस्ट से जो 19.06 लाख लोग बाहर हुए, उनमें करीब 5.5 लाख हिंदू और 11 लाख से ज्यादा मुसलमान शामिल थे।
- असम की तब की बीजेपी सरकार में सीएम सर्बानंद सोनोवाल जैसे कई बीजेपी नेताओं ने भी लिस्ट में कई गलतियों की बात कही।
- 10 मई 2021 को असम के नए सीएम बने हिमंता बिस्व सरमा ने भी लिस्ट में गलतियों की बात कही और गलतियां दूर करने के लिए दोबारा लिस्ट का वेरिफिकेशन करने की बात कही।
- गलतियों के चलते ही इस NRC को पूरी कानूनी वैधता भी नहीं मिल पाई, क्योंकि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने इसका नोटिफिकेशन जारी नहीं किया।

जुलाई 2018 में असम NRC के ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। इसके विरोध के बाद 31 अगस्त 2019 को आखिरी लिस्ट में 19 लाख लोगों के नाम नहीं थे।
3. नागरिकता के रजिस्टर के लिए जनसंख्या का रजिस्टर बनना जरूरी
- पूरे देश में NRC लागू करने के लिए नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर, NPR, यानी आबादी का नए सिरे से पूरा लेखा-जोखा होना जरूरी है। NPR जनगणना के साथ ही तैयार किया जा सकता है।
- 2019 में केंद्र सरकार ने बजट में NPR के लिए 3,941 करोड़ रुपए और जनगणना के लिए 8,754 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। हालांकि कोविड के चलते जनगणना का काम शुरू नहीं हो पाया।
- फिर 2025 के केंद्रीय बजट में भी जनगणना करवाने के लिए 11,718 करोड़ रुपए आवंटित किए, लेकिन NPR के लिए अलग से कोई बजट नहीं रखा गया।
- अब 2026-27 के बजट में जनगणना 2027 और NPR के लिए कुल 6,000 करोड़ आवंटित किए गए।
- जनगणना के तहत 1 अप्रैल से 1 सितंबर के जनगणना के तहत हाउसलिस्टिंग फेज चल रहा है। हालांकि इसके नोटिफिकेशन में NPR का कोई जिक्र नहीं है।

1 अप्रैल 2026 से जनगणना का पहला फेज शुरू हो चुका है। इसमें घरों की लिस्टिंग की जा रही है। ( तस्वीर- पंजाब में जनगणना ऑफिसर्स की प्रेस कॉन्फ्रेंस)
30 मार्च 2026 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त, मृत्युंजय कुमार नारायण ने साफ कहा है कि जनगणना के दौरान NPR का कोई फैसला नहीं लिया गया है, और न ही आगे जनगणना का NPR से कोई लेना-देना होगा।
सवाल-5: दुनिया के दूसरे देशों में नागरिकता कैसे तय होती है? जवाबः दुनिया में नागरिकता तय करने के दो ही प्रमुख सिद्धांत हैं… 1. Jus Soli यानी मिट्टी का अधिकार: जहां पैदा हुए, उसी देश की नागरिकता। माता-पिता की नागरिकता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे- अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको। 2. Jus Sanguinis यानी खून का अधिकार: माता-पिता की नागरिकता से नागरिकता तय होती है, चाहे जन्म कहीं भी हो। जैसे- सऊदी अरब, जापान और चीन।
हालांकि भारत समेत तमाम देशों में दोनों सिद्धांतों का मिला-जुला सिस्टम अपनाया जाता है, यानी जन्म के साथ-साथ माता-पिता की नागरिकता भी देखी जाती है।
नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज भी दुनिया में अलग-अलग हैं। जैसे-
- अमेरिका का सिस्टम सबसे साफ है। वहां पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, सिजिटेनशिप सर्टिफिकेट जैसा हर दस्तावेज नागरिकता का सबूत है।
- ब्रिटेन में तीन दस्तावेजों में से कोई एक होना नागरिकता का सबूत है- ब्रिटिश पासपोर्ट, यूके बर्थ सर्टिफिकेट या नेचुरलाइजेशन का सर्टिफिकेट।
- जर्मनी में अलग से सर्टिफिकेट ऑफ नेशनैलिटी लेना पड़ता है। इसके लिए जन्म प्रमाण पत्र, मैरिज सर्टिफिकेट और फैमिली रजिस्टर जैसे दस्तावेज देने पड़ते हैं।
- ऑस्ट्रिया और क्रोएशिया जैसे कुछ देश अलग से सिटिजनशिप सर्टिफिकेट जारी करते हैं, जो नागरिकता का एकमात्र आधिकारिक दस्तावेज है।
—-
ये खबर भी पढ़ें…
भास्कर एक्सप्लेनर- 4 साल, 8 एक्सटेंशन बाद CAA लागू:3-4 करोड़ आबादी पर असर; मुसलमान क्यों डरे हैं, क्या फिर विरोध होगा

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने वाला कानून आज से पूरे देश में लागू हो गया। 12 दिसंबर 2019 को राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन कानून को मंजूरी दी थी। पूरी खबर पढ़ें…















